ओमप्रकाश वाल्मीकि (30. 06.1950 – 17. 11. 2013) की स्मृति को उनके जन्मदिन पर नमन।
उन पर कभी दो हिस्सों में संस्मरण लिखा था। पहला हिस्सा तो नहीं मिला लेकिन दूसरा हिस्सा मिल गया। पढ़ें और उनके साहित्य के अध्येता बनें। बजरंग बिहारी तिवारी
ओमप्रकाश वाल्मीकि : एक संस्मरण
बजरंग बिहारी तिवारी
2008 की बात होगी, ओमप्रकाश वाल्मीकि जी पहली बार गुजरात आमंत्रित किए गए थे। आयोजन शायद गुजराती दलित साहित्य अकादमी का था। अहमदाबाद/ गांधीनगर की यात्रा से लौटे थे और दिल्ली आए हुए थे। बड़े खिन्न
मालूम हुआ कि वे गुजरात के दलित साहित्यकारों से नाराज़ थे। जैसी आक्रामकता मराठी और हिंदी के दलित साहित्यकारों में दिखती है वह गुजराती के दलित लेखकों में उन्हें नहीं दिखी थी। महात्मा गाँधी और गांधीवाद को लेकर भी गुजराती के दलित लेखक नरमी बरतते दिखे थे।
यह बात वाल्मीकि जी को चुभ गई थी। वे ऐसे नरम रवैये को दलित आंदोलन के लिए नुकसानदायक मान रहे थे। बाद में उन्होंने अन्य प्रान्तों की यात्राएँ भी कीं। उन्हें व्यापक पैमाने पर आमंत्रित किया जाने लगा।
ज़्यादातर उन्हें दलित संगठनों, दलित लेखकों अथवा दलित-बहुजन कार्यकर्ताओं ने ही बुलाया। देश भ्रमण करते हुए वाल्मीकि जी अवश्य ही समझे होंगे कि हर प्रान्त की अपनी परंपराएं हैं, अपने नायक हैं। सबके तेवर में एकरूपता कैसे हो सकती है।
आज वाल्मीकि जी होते तो उनकी पीड़ा बड़ी गहरा गई होती। तब जो लोग उनके साथ नज़र आते थे, उनमें से कई आज उलटी दिशा में हैं और बहुत खुशी-खुशी हैं। उनकी वैचारिक पोजीशन शिफ्ट हो चुकी है। परिवर्तन का चक्र वापस घूम चुका है।
एक विचार-सभा में वाल्मीकि जी ने भावावेश में कहा कि अगर अयोध्या में मंदिर की नींव किसी दलित से रखवाई जाती है तो वे भी मंदिर आंदोलन के समर्थक हो जाएंगे। वे शायद इस बात को नहीं समझ रहे थे कि मंदिर आंदोलन वालों की निष्ठा किसी धर्म में नहीं, सत्ता में है, संपत्ति में है।
वे ऑक्सीटोसिन का इंजेक्शन देकर धर्म दुहे जा रहे हैं। उस गोष्ठी में जब मेरी बोलने की बारी आई तो मैंने यही अर्ज किया कि मोहरों की कमी नहीं, बहुतेरे मिल जाएँगे। बिजूके को देखकर आपको लगेगा कि आपके समुदाय का प्रतिनिधित्व हो गया है और आप ठगी के शिकार हो जाएँगे।
ओमप्रकाश वाल्मीकि से ईर्ष्या करने वाले उनके प्रशंसकों की तुलना में कम रहे। जो दलित विमर्श से बाहर थे उनमें उनके चाहने वाले, उनकी लिखी एक-एक चीज़ पढ़ने, संजोकर रखने वाले अच्छी संख्या में थे।
जिनका दलित विमर्श से कुछ खास लेना-देना नहीं रहा वे भी वाल्मीकि जी के पाठक रहे और हैं। उनकी आलमारियों में वाल्मीकि जी की किताबें लगी हुई मिल जाएंगी। एक जातिवादी समाज में यह मेरे लिए सुकून देने वाला अनुभव रहा है।
यद्यपि वाल्मीकि जी की उपेक्षा करने, निंदा करने वाले लेखक और विमर्शकार अल्प होते हुए भी बड़े मुखर रहे हैं। जब ‘इंडिया टुडे’ के 22 जुलाई 1998 अंक में उनकी ‘शवयात्रा’ कहानी छपी तो जैसे आलोचनाओं की बाढ़ आ गई। अधिकांश आलोचनाएँ निंदा की शक्ल में थीं।
हड़बड़ी में वाल्मीकि जी को एक जाति-विशेष का विरोधी बताया जाने लगा। यह भुला दिया गया कि वे महाराष्ट्र के आंबेडकरी आंदोलन से प्रेरित और प्रशिक्षित दलित एकता के दृढ़ समर्थक थे। उनकी किसी अन्य कविता या कहानी में दलित एकता में फूट डालने की मंशा अब तक नहीं खोजी जा सकी थी।
स्वयं ‘शवयात्रा’ कहानी ध्यान से पढ़ी गई होती ज्ञात हो जाता कि बल्हार का मकान बनने से रोकने वाला ग्रामप्रधान बलराम सिंह है। आंतरिक भेदभाव पर हिंदी दलित विमर्श में सघन, ईमानदार और खुली बहस अब तक प्रतीक्षित है।
इससे यह क़यास मज़बूत होता है कि यहाँ जाति-विशेष की दबंगई है। वस्तुस्थिति यह है कि दलितों की सभी जातियाँ उत्पीड़ित हैं और उनका उत्पीड़न कम होने के स्थान पर बढ़ा ही है। इन दिनों आरक्षण को लेकर उपवर्गीकरण का जो विवाद चल रहा है वह आंतरिक विभाजन को और चौड़ा करने में सफल हो रहा है।
देश की संपत्तियों का राष्ट्रीयकरण, निजी हाथों में सौंपे गए सरकारी उपक्रमों की वापसी और संवैधानिक ढाँचे की रक्षा ही विषमता की समस्या का समाधान कर सकते हैं। इसके लिए जिस संगठित वैचारिक राजनीतिक आंदोलन की दरकार है वह दूर तक कहीं नज़र नहीं आ रहा।
‘शवयात्रा’ के हवाले से आज भी वाल्मीकि जी पर प्रतिकूल टिप्पणियाँ सुनने को मिल जाती हैं। इस प्रवृत्ति पर वाल्मीकि जी व्यथित अवश्य थे लेकिन उन्होंने विवाद को अपनी तरफ़ से बढ़ाया नहीं था। उन्हें यक़ीन था कि आने वाली पीढ़ियाँ मुक्त मन से इस प्रश्न पर विचार करेंगी और इसे छिपाने या लेखक पर हमला करने की बजाए समस्या के हल की दिशा में आगे बढ़ेंगी।
इस कहानी को ज़ेरे बहस समझकर रमणिका गुप्ता ने अपनी पत्रिका ‘युद्धरत आम आदमी’ में पुनर्प्रकाशित किया था। कहानी का अंत बड़ा मार्मिक है। सुरजा के घर के चारों लोग दो पुरुष और दो स्त्रियाँ दस वर्षीया सलोनी का शव लिए जा रहे हैं।
छत पर चढ़ी अन्य (जाटव समुदाय की) दलित स्त्रियाँ यह शवयात्रा देख रही हैं। “उनकी आँखों के कोर भीगे हुए थे। लेकिन बेबस थीं, अपने-अपने दायरे में क़ैद। बल्हार तो आखिर बल्हार ही थे।” वाल्मीकि जी संदेश देते है कि जिस दिन जाति के दायरे से वे स्त्रियाँ बाहर निकलीं, उनमें व्यापक एकता बनेगी।
अभी वे बेबस हैं। इसी तरह का बेबस पात्र साबिर मिस्त्री है। जब इलाके के अन्य राजगीर मिस्त्री सुरजा बल्हार के यहाँ काम करने से इनकार कर देते हैं, साबिर तैयार हो जाता है। यह दूसरी बात है कि उसे आने से रोक दिया जाता है।
रोका तो ‘छतरी’ कहानी के शौकत चाचा को भी गया था लेकिन उन्होंने रास्ता निकाल लिया था और गाँव की रवायत के विरुद्ध दलित बालक के स्कूल के लिए छतरी तैयार कर दी थी। ‘सलाम’ कहानी का अंत याद कीजिए।
सांप्रदायिक भावना से विषाक्त दलित बालक मुसलमान कारीगर के हाथ की बनी रोटी खाने से इनकार कर देता है। कहानी का परिवर्तनकामी नायक हरीश इस स्थिति से निराश-सा हो जाता है। सांप्रदायिक पूर्वग्रहों को पहचानना और उन्हें दूर करने का संदेश देना वाल्मीकि जी के लेखन का एक प्रमुख सरोकार रहा है।
डॉ. तेज सिंह (-15.07.2014) दलित लेखक संघ (दलेस) के शुरुआती अध्यक्षों में से थे। दलेस की योजनानुसार ‘अपेक्षा’ नामक पत्रिका निकाली गई थी। यह संगठन का मुखपत्र थी। बाद में जब तेज सिंह जी दलेस के अध्यक्ष नहीं रहे तब भी वही पत्रिका का संपादन करते रहे।
अब यह अंबेडकरवादी चिंतन का मुखपत्र हो गई। ‘शवयात्रा’ कहानी के प्रकाशन के बाद से डॉ. तेज सिंह वाल्मीकि जी के कटु आलोचक हो गए थे। उन्होंने ‘अपेक्षा’ का दलित आत्मकथा पर केंद्रित विशेषांक (जुलाई-सितंबर 2010) निकाला था।
इस अंक के लिए उन्होंने मुझसे विशेष रूप से लिखवाया था। इन दिनों मैं आत्मकथा की ‘प्रामाणिकता’ को लेकर संदेहग्रस्त हो गया था। इससे पहले भी मैं ‘अपेक्षा’ के लिए ‘दलित आत्मकथा लेखन की परंपरा’ (जुलाई-सितंबर, 2003) शीर्षक विस्तृत लेख लिख चुका था।
हमारी मुलाक़ात दिल्ली विश्वविद्यालय की सेंट्रल लाइब्रेरी में ऊपर रिसर्च फ्लोर पर हुआ करती थी। वहाँ कई शिक्षक और शोधार्थी नियमित रूप से आते थे और चाय पीते हुए विचार-विमर्श किया करते थे।
बाद में प्रशासन द्वारा चाय की दुकान बंद करवाई गई और बहसबाजों का आना रोका गया। थोड़े विराम के बाद फिर ऐसी बहसें लाइब्रेरी के बगल कैंटीन के साथ लगी किताब की दुकान पर होने लगीं।
लोग यहाँ नई पत्रिकाएं और किताबें लेने आते थे, बैठते थे, नई आमद पर चर्चा करते थे। इसे बंद करवाने में स्वनामधन्य पचौरी जी की अग्रणी भूमिका थी। वे इसे वामपंथियों का अड्डा कहते थे।
लाइब्रेरी से भी ‘बहसबाजों’ के सफाए में उनका महत्त्वपूर्ण रोल था। घोर दक्षिणपंथी और जातिवादी भी ‘प्रगतिशीलों’ से इतनी नफ़रत नहीं करेगा जितनी नकारात्मकता उनमें कूट-कूट कर भरी है।
बहरहाल, डॉ. तेज सिंह से मैंने अपनी मुश्किल बताई और पूछा कि क्या दलित आत्मकथाओं की प्रामाणिकता पर चर्चा करना उचित होगा। उन्होंने इसे ज़रूरी बताते हुए लेख लिखने का आग्रह किया। विशेषांक में मेरा लेख शामिल हुआ।
आत्मकथा विधा के महत्त्व को रेखांकित करते हुए मैंने पूछा था कि ‘क्या आत्मवृत्तों की प्रामाणिकता जाँची जा सकती है?’ इस प्रश्न को वाल्मीकि जी ने निजी तौर पर लिया।
हमारे बीच असहमतियाँ पहले भी रही हैं और हम उस पर बहस करते रहे हैं लेकिन इस बार मामला संवेदनशील था। वे संपादक के रवैये से परिचित थे और ‘शवयात्रा’ पर हुई घेरेबंदी से आहत भी। यह दुःख उन्होंने मुझसे शेयर कर रहा था।
मैं ही डॉ. तेज सिंह के ‘पाले’ में जाकर आत्मकथा विधा को प्रश्नांकित करने वाला लेख लिखूँगा, वे ऐसी उम्मीद नहीं कर रहे थे। लेख छपने के बाद वाल्मीकि जी से कोई बात नहीं हुई।
मैं उम्मीद कर रहा था कि वे जब मिलेंगे यह सवाल ज़रूर उठेगा। यह सवाल उठा किंतु निजी बातचीत में नहीं, एक दैनिक अखबार ‘जनसत्ता’ में। ‘जनसत्ता’ (18 दिसंबर, 2011) में ओमप्रकाश वाल्मीकि का लेख छपा था। शीर्षक था- ‘दलित साहित्य के पुरोहित’।
लेख में उन्होंने ‘अपेक्षा’ पत्रिका में छपे मेरे लेख का थोड़ी तल्खी के साथ खंडन किया था। उनका आरोप था कि मैं आत्मकथा विधा को सवालों के घेरे में लाकर दलित साहित्य को कमज़ोर कर रहा हूँ। ज्ञान का प्रदर्शन करता हूँ। पुरोहित हूँ।
पहले सोचा कि इस मुद्दे पर चुप रह जाऊँ। जवाब दूँगा तो निजी संबंध खराब होंगे। ऊहापोह से निकलते हुए लगा कि सैद्धांतिक बहस में व्यक्तिगत संबंध बाधा क्यों बने। एक आत्मकथा जिसके तीन ड्राफ्ट मैंने देखे थे, थोड़ी-थोड़ी बदलती गई थी।
घटनाओं का रंग परिवर्तित हो गया था। किरदारों के शेड्स कुछ के कुछ हो गए थे। कौन-सा ड्राफ्ट प्रामाणिक है, क्या इसे जाँचा जा सकता है? आखिरकार वाल्मीकि जी के लेख का जवाब देना तय किया।
अगले किसी रविवार को मेरा प्रत्युत्तर भी उसी अखबार में छपा- ‘पुरोहित कौन’ (1 जनवरी, 2012)। आत्मकथा विधा पर जैसी बहस की उम्मीद थी, ज़रूरत थी वह अब तक नहीं हुई है। आत्मकथा विशेषांक के संपादक डॉ. तेज सिंह से अपेक्षा थी लेकिन वे इस बहस में नहीं उतरे।
हाँ, उनके भीतर कुछ पकता रहा। ‘अपेक्षा’ के संयुक्तकांक जन.-जून, 2014 के सुदीर्घ संपादकीय को उन्होंने वाल्मीकि जी की ‘रचना-प्रक्रिया’ पर केंद्रित किया। 17 नवंबर 2013 को वाल्मीकि जी का देहावसान हो गया था। ‘अपेक्षा’ का यह संपादकीय वाल्मीकि जी को श्रद्धांजलि देने से आरंभ होता है।
डॉ. रामविलास शर्मा की मृत्यु के पश्चात नामवर सिंह जी ने ‘आलोचना’ पत्रिका का जैसा श्रद्धांजलि अंक निकाला था और जैसा संपादकीय लिखा था कुछ वैसा ही डॉ. तेज सिंह ने वाल्मीकि जी पर लिखा।
यह बहुत तकलीफ़देह रहा कि ‘अपेक्षा’ का यह अंक डॉ. तेज सिंह जी का आख़िरी अंक साबित हुआ। वे 15 जुलाई 2014 को स्मृतिशेष हो गए। ‘अपेक्षा’ का संपादकीय घोर नकारात्मक है और वाल्मीकि जी की छवि को धूमिल करने का भरपूर प्रयास करता है।
अंक आने के बाद संपादक की मृत्यु हो जाने के कारण इस संपादकीय पर कोई खास चर्चा नहीं हुई। मेरी जानकारी में मुसाफिर बैठा ने इसका संज्ञान लेते हुए एक लेख लिखा था और डॉ. तेज सिंह के मूल्यांकन से स्पष्ट असहमति जताई थी। यह लेख गूगल आर्काइव पर मौज़ूद है।
डॉ. रामविलास शर्मा को संदिग्ध बनाने और उनके योगदान पर धूल डालने के लिए उन्हें हिंदुत्व से जोड़ने का प्रयास हुआ था यही तरकीब वाल्मीकि जी के संबंध में अपनाई गई।
डॉ. तेज सिंह ने लिखा, “वाल्मीकि भाजपा या आर.एस.एस. से अपने राजनीतिक संबंधों को जीवन भर छुपाते रहे लेकिन उनकी मृत्यु के बाद हुए कर्मकांड ने जाहिर कर दिया है।”
मृत्यु के बाद कुटुंब के लोग शव का क्या करेंगे इस पर मृतक का कोई वश नहीं रह जाता। संपादक की यह आरोप कुतर्क की श्रेणी में आता है।
अंतिम संस्कार या जीवन का कोई भी संस्कार अगर पारंपरिक तरीके, धार्मिक रिवाजों का ध्यान रखते हुए किया जाता है तो उसे एक राजनीतिक संगठन से क्यों जोड़ा जाए! यह पहले ही लिखा गया है कि वाल्मीकि जी की जीवनसंगिनी नास्तिक नहीं थीं और वाल्मीकि जी ने कभी उनकी आस्था पर प्रतिबंध नहीं लगाया था।
अखबार में मेरे प्रत्युत्तर के प्रकाशन के बाद वाल्मीकि जी से बोलचाल बंद-सी हो गई। उन्होंने मेरी आलोचना को व्यक्तिगत हमला मान लिया था। उन्हें लगा था कि जैसे मैं ‘जूठन’ का महत्त्व कम कर रहा हूँ।
आत्मकथा की प्रामाणिकता पर विचार करना उन्हें न केवल ग़ैरज़रूरी बल्कि अस्मिता विरुद्ध कार्य लगा था। मेरे और उनके बीच कटुता पनपाने वाले कुछ ‘साझे मित्र’ प्रयासरत थे। उनका प्रयास रंग ला रहा था।
एक-दो गोष्ठियों में उनसे मुलाक़ात हुई। मैंने उन्हें अभिवादन किया। उन्होंने अनदेखा किया। मुझे लगने लगा कि जब तक संबंध सहज नहीं होते, दूरी बरतना ही ठीक है।
इस बीच वाल्मीकि जी की कोई कहानी भी छपी। कुछ लोगों ने बताया कि कहानी मुझे लक्षित करके लिखी गई है। मैंने न कहानी पढ़ी और न उसकी बाबत कुछ कहा।
अनबोला बना रहा। वर्ष 2013 में सूचना मिली कि वाल्मीकि जी को लीवर कैंसर हो गया है। वे दिल्ली के गंगाराम अस्पताल में भरती हुए। मैं इस आशंका से उनसे मिलने न गया कि यदि कोई बात चली और वाल्मीकि जी उत्तेजित हो गए तो यह उनकी सेहत के लिए अच्छा नहीं होगा।
सर्जरी हुई किंतु वाल्मीकि जी की हालत न सुधरी। उन्हें देहरादून ले जाया गया जहाँ उन्होंने अंतिम साँस ली। देहरादून में जब वे गंभीर हालत में थे तब मुझे जाना चाहिए था। नहीं गया।
भाभी जी का मुझ पर स्नेह था। उससे पहले भी देहरादून जाकर उनके घर पर ठहर चुका था। फिर भी नहीं गया। मैंने नानकचंद रत्तू का लिखा पढ़ लिया था। उन्होंने बाबासाहेब आंबेडकर की मृत्यु पर जिस तरह अपना मनोगत/संस्मरण लिखा है वह माईसाहब सविता आंबेडकर को कटघरे में खड़ा कर देता है।
माईसाहब पूरी उम्र (मृत्यु 2003) रत्तू जी के लांछनों से व्यथित होती रहीं थीं। उन्हें लगातार स्पष्टीकरण देना पड़ा था। जाति व्यवस्था ने इतना कलुष बटोर रखा है कि उससे निज़ात पाना आसान नहीं।
मुझे अफ़सोस तो रहेगा ही कि अंतिम दिनों में अपने प्रिय रचनाकार और हितैषी वरिष्ठ साथी से मिल नहीं पाया।
वाल्मीकि जी के बड़प्पन का तीव्र अनुभव तब हुआ जब मैंने उनकी अंतिम पुस्तक (जो उनके जीवित रहते प्रकाशित हुई थी) का समर्पण पृष्ठ देखा। ‘दलित साहित्य : अनुभव, संघर्ष और यथार्थ’ (2013, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली) नामक इस पुस्तक में उन्होंने (डॉ. रामचंद्र समेत) मुझे ‘संघर्ष-यात्रा में हमेशा साथ’ रहने वाला बताया है।
उनके देहावसान पर मैंने ‘कथादेश’ सहित कुछ पत्रिकाओं के लिए जो श्रद्धांजलि लेख लिखे उनमं. उनके कृतित्व का मूल्यांकन तो था लेकिन अपने साथ उतार-चढ़ाव भरे संबंधों का कोई ज़िक्र न था। यह सब पहली बार यहाँ लिख रहा हूँ।
वे चाहते तो इस किताब में ‘दलित साहित्य के पुरोहित’ लेख शामिल कर सकते थे। किताब के कई लेख पत्रिकाओं, अखबारों में पूर्व प्रकाशित हैं। यह लेख उन्होंने शामिल क्यों नहीं किया, यह समझना किंचित मुश्किल है।
मैंने उन्हें सभा-संगोष्ठियों में जल्दी उत्तेजित होते देखा था लेकिन अपनी सहज प्रकृति में वे विशाल हृदय वाले उदारमना व्यक्ति थे। उनकी लोक स्वीकृति का यह बड़ा कारण है।
भारतीय दलित अध्ययन संस्थान (आइआइडीएस) ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया तो उसमें मुझे भी अपनी बात रखने का मौका मिला।
प्रो. विमल थोरात देहरादून से होकर आई थीं और बता रही थीं कि वाल्मीकि जी का अंतिम संस्कार पारंपरिक हिंदू रीति से हुआ है।
वे सामाजिक वास्तविकता को समझती हैं और उन्होंने सचेत रूप से इसे मुद्दा नहीं बनने दिया। न श्रद्धांजलि सभा में और न उसके पहले या बाद में।
वे जानती थीं कि वाल्मीकिद्वेषी कुंठित लोग इसके आधार पर कीचड़ उछालेंगे और उनके समग्र योगदान को इस एक घटना से नकारने का प्रयास करेंगे।
अपनी बारी आने पर मैंने कहा कि वाल्मीकि जी के अप्रकाशित लेखन, उनके लिखे और उन्हें मिले पत्र, अधूरी रचनाएँ आदि संजोकर रखने की ज़रूरत है। यह काम उनकी जीवनसंगिनी (चंदा जी) के भरोसे छोड़ देना ठीक नहीं होगा।
वे भारतीय साहित्य के सम्मानित और हिंदी दलित साहित्य के सबसे कद्दावर व्यक्तियों में से थे। यदि एक दलित साहित्य अकादमी बने और उसके साथ बड़ा आर्काइव व पुस्तकालय रहे तो ऐसी सामग्रियों को आने वाले दिनों के लिए बचाया जा सकता है।
अव्वल तो यह काम केंद्र सरकार को करना चाहिए लेकिन वह न करे तो दिल्ली सरकार को यह दायित्व संभालना चाहिए। वहाँ उपस्थित जनसमुदाय ने मेरी बात का समर्थन किया। मैंने यह मांग अन्य अवसरों पर भी दोहराई।
पहली पीढ़ी के दलित लेखकों का लिखा एक-एक शब्द हमारे लिए महत्त्वपूर्ण है। उनके साहित्य की रक्षा मात्र उनके परिवार का दायित्व नहीं है। दलित जनता भी करदाता है।
सरकार इसी कर-संग्रह के बूते चलती है। जो रचनाकार उनके अधिकारों के लिए लिखते हैं, समाज को संवेदनशील बनाने में ताउम्र प्रयत्नशील रहते हैं, दलित साहित्य अकादमी उनके लिए काम करेगी।
ऐसी अकादमी आज की स्थिति में बननी मुश्किल है। जब शिक्षा का बजट निरंतर घट रहा हो तब साहित्य के लिए और वह भी प्रतिरोधी दलित साहित्य के लिए सरकार द्वारा राशि आवंटित की जाएगी, ऐसा संभव नहीं लगता। तब, दलित जनता की जागृति ही एकमात्र रास्ता है।
‘जूठन’ के दूसरे भाग का प्रकाशन वाल्मीकि जी के देहावसान के दो वर्ष बाद 2015 में हुआ। विश्व पुस्तक मेला के राजकमल प्रकाशन मंच पर इसका लोकार्पण हुआ। इसमें शामिल होने के लिए चंदा भाभी देहरादून से आई हुई थीं।
कार्यक्रम समाप्त होने के बाद कुछ देर उनसे घर-परिवार की बातें होती रहीं। 1973 में जब वाल्मीकि जी से उनकी शादी हुई, वे इंटरमीडियट की छात्रा थीं। दोनों में अच्छी निभी। वाल्मीकि जी जिस भी सभा-संगोष्ठी में जाते थे, चंदा जी साथ रहती थीं।
शायद ही कोई यात्रा उन्होंने अकेले की हो। वाल्मीकि जी कहा भी करते थे कि इन्हें मैं घर पर नहीं छोड़ सकता। समय-समय पर इनको (चंदा जी को) दवाइयाँ कौन देगा। ये मेरे बगैर नहीं रह सकतीं।
वाल्मीकि जी के इसी बार-बार दुहराए गए कथन को याद करते हुए थोड़े व्यंग्यात्मक लहज़े में चंदा भाभी ने कहा कि वे मुझ पर, मेरी सामर्थ्य पर भरोसा ही नहीं करते थे।
कहते थे कि यह मेरे बगैर कहीं आ जा नहीं सकती, अकेले रह नहीं सकती। आज देखो अकेले रह रही हूँ। अकेले यात्रा करती हूँ। देहरादून से अकेले आई हूँ। अकेले वापस जाऊँगी।
परम मितभाषी चंदा भाभी इस तेवर में, इतनी मुखरता से बोलेंगी; मुझे यक़ीन नहीं हो रहा था। यह कोई नई बनती हुई दलित स्त्री थी। इस स्त्री से वाल्मीकि जी का परिचय नहीं था।
वे ‘सलाम’ के हरीश को बनता देख पा रहे थे लेकिन उस लड़की को नहीं जो हाईस्कूल पास करने वाली इस गाँव की पहली दलित युवती थी। वे तो इस लड़की का नाम भी नहीं जानते थे या उन्होंने नाम देने की ज़रूरत नहीं समझी।
रेणु को देखिए जिन्होंने परानपुर (‘परती परिकथा’) की मैट्रिक पास पहली दलित युवती मलारी का पूरा प्रोफाइल प्रस्तुत कर दिया है।
वाल्मीकि जी का संपूर्ण लेखन बताता है कि उच्च शिक्षा में जाने वाली, खुदमुख्त्यार, अपने दम पर संघर्षरत, एक्टिविस्ट दलित युवती से अभी उनका परिचय नहीं है। अगर वे इतनी जल्दी न गए होते तो अवश्य ही अपने को अपडेट करते। तब चंदा भाभी का लहज़ा भिन्न होता।
