भगत सिंह: जेल नोटबुक (जेल डायरी 12.9.1929—23 मार्च 1931)– एक क्रांतिकारी के बौद्धिक निर्माण की यात्रा

भगत सिंह: जेल नोटबुक (जेल डायरी 12.9.1929—23 मार्च 1931)– एक क्रांतिकारी के बौद्धिक निर्माण की यात्रा

डॉ. रामजीलाल

 

भगत सिंह (1907–1931) भारत के औपनिवेशिक-विरोधी संघर्ष के इतिहास में एक विशिष्ट स्थान रखते हैं। वे केवल ब्रिटिश साम्राज्यवाद को चुनौती देने वाले क्रांतिकारी ही नहीं थे, बल्कि राजनीतिक चिंतक, पत्रकार, संगठनकर्ता और अत्यंत व्यापक अध्ययन करने वाले पाठक भी थे। उनका बौद्धिक विकास प्रारंभिक क्रांतिकारी राष्ट्रवाद से आगे बढ़कर समाजवाद, मार्क्सवाद, तर्कवाद, धर्मनिरपेक्षता, साम्राज्यवाद-विरोध तथा सामाजिक और आर्थिक समानता के प्रश्नों तक पहुंचा।

उनकी जेल डायरी इस बौद्धिक परिवर्तन को समझने वाले सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेजों में से एक है। यह बताती है कि जेल में रहते हुए और मृत्यु की संभावना सामने होने के बावजूद भगत सिंह निरंतर अध्ययन, विचारों की तुलना और समाज के आलोचनात्मक विश्लेषण में लगे रहे। इसलिए जेल डायरी को केवल एक ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में नहीं, बल्कि आधुनिक भारत के बौद्धिक इतिहास के एक महत्वपूर्ण स्रोत के रूप में भी पढ़ा जाना चाहिए।

एक शब्दावली संबंधी स्पष्टीकरण:

यहां एक शब्दावली संबंधी स्पष्टीकरण आवश्यक है। आज यह कृति लोकप्रिय रूप से “भगत सिंह की जेल डायरी” के नाम से जानी जाती है, विशेषकर हिंदी में प्रकाशित शहीद-ए-आज़म भगत सिंह की जेल डायरी के कारण। लेकिन भूपेंद्र हूजा, चमन लाल और जे. डेनियल एलम जैसे विद्वानों ने प्रायः इसे “जेल नोटबुक” कहा है, क्योंकि उपलब्ध मूल सामग्री पारंपरिक अर्थों में दिन-प्रतिदिन की डायरी नहीं है। इसमें मुख्यतः पुस्तकों से लिए गए उद्धरण, अंश, टिप्पणियां और अध्ययन-नोट्स हैं। इसलिए लोकप्रिय संदर्भ में “जेल डायरी” और अकादमिक संदर्भ में “जेल नोटबुक”—दोनों शब्दों का उपयोग उचित है।

बौद्धिक क्रांतिकारी का निर्माण:

भगत सिंह का बौद्धिक निर्माण जेल जाने से बहुत पहले शुरू हो चुका था। पंजाब का राजनीतिक वातावरण, जलियांवाला बाग हत्याकांड, असहयोग आंदोलन, क्रांतिकारी परंपरा तथा राष्ट्रवादी और समाजवादी लेखकों के साहित्य ने उनके राजनीतिक चेतना-विकास को प्रभावित किया।

लेकिन उनके बाद के लेखन में प्रारंभिक राष्ट्रवादी भावनाओं से आगे बढ़ने की प्रक्रिया स्पष्ट दिखाई देती है। 1920 के दशक के अंतिम वर्षों तक वे साम्राज्यवाद और शोषण की संरचनात्मक बुनियादों को समझने की ओर बढ़ रहे थे। उनके राजनीतिक शब्दकोश में वर्ग, पूंजीवाद, श्रम, समाजवाद, क्रांति, धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक समानता जैसे प्रश्न अधिक महत्वपूर्ण होते गए।

इस प्रकार क्रांतिकारी उद्देश्य केवल ब्रिटिश शासन को समाप्त करने तक सीमित नहीं रहा। राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन भी उनके चिंतन का हिस्सा बनता गया। जेल डायरी इस बौद्धिक विकास के पीछे मौजूद अध्ययन-सामग्री का महत्वपूर्ण प्रत्यक्ष प्रमाण है।

जेल डायरी—अध्ययन और चिंतन का दस्तावेज:

उपलब्ध पांडुलिपि लगभग 404 पृष्ठों की है, हालांकि इनमें लगभग 75 पृष्ठों पर ही पर्याप्त हस्तलिखित सामग्री मिलती है। इसमें “Sociology” (समाजशास्त्र) नाम से एक अलग खंड भी है।

इसकी संरचना अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह जेल में प्रतिदिन घटित घटनाओं का विवरण नहीं देती, बल्कि यह बताती है कि भगत सिंह क्या पढ़ रहे थे और किन प्रश्नों पर विचार कर रहे थे। इसलिए इसे एक बौद्धिक कार्य-पुस्तिका के रूप में देखना अधिक उचित है।

108 पुस्तकें और 44 लेखक—एक व्यापक बौद्धिक संसार:

इन 108 पुस्तकों का महत्व केवल उनकी संख्या में नहीं, बल्कि उनके विषयगत और वैचारिक विस्तार में है। भगत सिंह का अध्ययन दर्शन, राजनीतिक सिद्धांत, समाजवाद, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, इतिहास, साहित्य और कविता तक फैला हुआ था।

डायरी से जुड़े बौद्धिक संसार में कार्ल मार्क्स, फ्रेडरिक एंगेल्स, व्लादिमीर लेनिन, लियोन ट्रॉट्स्की, निकोलाई बुख़ारिन, कार्ल काउत्स्की, बर्ट्रेंड रसेल, ज्यां-जाक रूसो, जॉन लॉक, थॉमस पेन, थॉमस जेफरसन, एडमंड बर्क, हर्बर्ट स्पेंसर, विक्टर ह्यूगो, फ्योदोर दोस्तोयेव्स्की, मैक्सिम गोर्की, रवींद्रनाथ टैगोर, वॉल्ट व्हिटमैन, एमा गोल्डमैन, यूजीन डेब्स, जैक लंदन और अप्टन सिंक्लेयर जैसे लेखक और चिंतक शामिल हैं।

यह विविधता विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। भगत सिंह ने अपने अध्ययन को किसी एक विचारधारा तक सीमित नहीं किया। वे विभिन्न देशों, परंपराओं और वैचारिक धाराओं के लेखकों को पढ़ रहे थे। उनका अध्ययन तुलनात्मक और आलोचनात्मक था।

विशेष रूप से अप्टन सिंक्लेयर की The Cry for Justice उल्लेखनीय है। यह गरीबी, श्रम, शोषण, असमानता, युद्ध और सामाजिक संघर्ष से संबंधित साहित्य का व्यापक संकलन था। इसका अध्ययन यह समझने में मदद करता है कि भगत सिंह के लिए स्वतंत्रता का प्रश्न केवल ब्रिटिश शासन से मुक्ति का प्रश्न नहीं था; उसके भीतर सामाजिक और आर्थिक न्याय की समस्या भी शामिल थी।

“समाजशास्त्र” खंड:

जेल डायरी का अलग “समाजशास्त्र” खंड विशेष ध्यान देने योग्य है। इससे पता चलता है कि भगत सिंह समाज को केवल भावनात्मक या राजनीतिक दृष्टि से नहीं, बल्कि व्यवस्थित रूप से समझने का प्रयास कर रहे थे।

राज्य की उत्पत्ति और प्रकृति, संपत्ति, पूंजीवाद, वर्ग-संबंध, श्रम और सामाजिक संगठन जैसे प्रश्न उनके अध्ययन में दिखाई देते हैं। मार्क्स, एंगेल्स और लेनिन इस बौद्धिक ढांचे में महत्वपूर्ण थे, लेकिन उनके साथ विभिन्न दार्शनिकों और समाज-चिंतकों को भी पढ़ा गया।

यह सामग्री इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पता चलता है कि भगत सिंह केवल ब्रिटिश शासन का विरोध नहीं कर रहे थे। वे यह समझने का प्रयास कर रहे थे कि समाज में शोषण और असमानता क्यों उत्पन्न होती है और सामाजिक व्यवस्था किस प्रकार बदल सकती है।

मार्क्स, लेनिन और समाजवादी दिशा:

भगत सिंह के मार्क्सवाद को ऐतिहासिक संदर्भ में समझना चाहिए। उन्हें केवल किसी तैयार और स्थिर मार्क्सवादी सिद्धांत का अनुयायी मानना उनके बौद्धिक विकास को सरल बना देना होगा। उनके लेखन और अध्ययन में मार्क्सवादी तथा समाजवादी विचार लगातार अधिक केंद्रीय होते गए।

मार्क्स और एंगेल्स ने उन्हें वर्ग और पूंजीवाद को समझने के उपकरण दिए; लेनिन ने साम्राज्यवाद और क्रांतिकारी संगठन की समझ को प्रभावित किया; जबकि अन्य समाजवादी और क्रांतिकारी चिंतकों ने राजनीतिक परिवर्तन के विभिन्न रूपों से परिचित कराया।

उनकी समाजवादी दिशा विशेष रूप से “To Young Political Workers” में दिखाई देती है, जहां वे राजनीतिक शिक्षा और सामाजिक-आर्थिक संरचनाओं की समझ पर जोर देते हैं। उनके लिए क्रांति केवल शासन परिवर्तन नहीं बल्कि समाज के व्यापक परिवर्तन की प्रक्रिया बनती जा रही थी।

एल. वी. मित्रोखिन और भगत सिंह के अध्ययन का इतिहास:

हिस्टोरियोग्राफी के एक ज़रूरी हिस्से को कभी-कभी भारतीय चर्चाओं में नजरअंदाज कर दिया गया है: सोवियत स्कॉलरशिप ने भगत सिंह के दिमागी विकास का अध्ययन भारत में नोटबुक के आसानी से उपलब्ध होने से बहुत पहले किया था।

रूसी/सोवियत इंडोलॉजिस्ट एल. वी. मित्रोखिन खास तौर पर ज़रूरी थे। एल. वी. मित्रोखिन डॉ. देवेंद्र कौशिक (कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी में इतिहास डिपार्टमेंट और मॉस्को यूनिवर्सिटी में विज़िटिंग प्रोफ़ेसर) के करीबी दोस्त थे, और वह उनसे मिलने कुरूक्षेत्र आते थे। इस आर्टिकल के लेखक को सन्1967-1969) के दौरान डॉ. कौशिक के निवास स्थान और पिछली सदी के 70 के दशक के पहले हिस्से में दिल्ली में मित्रोखिन से मिलने का मौका भी मिला। वह एक बहुत अच्छे स्कॉलर और शानदार पर्सनैलिटी वाले थे। सन् 1971 के वॉल्यूम इंडिया ऑन लेनिन में छपे उनके एस्से “द बुक्स रीड बाय भगत सिंह” ने क्रांतिकारी की पढ़ाई और दिमागी विकास की ओर ध्यान खींचा। बाद में मित्रोखिन ने लेनिन एंड इंडिया (सन् 1981) में भगत सिंह पर विस्तार से चर्चा की, जिसमें “भगत सिंह के आखिरी दिन” नाम का एक चैप्टर भी शामिल था। उनके काम में ए. वी. रायकोव की पहले की स्टडी, “भगत सिंह एंड हिज़ आइडियोलॉजिकल लिगेसी” (सन्1971) का भी ज़िक्र था।

हिस्टोरियोग्राफिकल परंपरा इसलिए ज़रूरी है क्योंकि यह भगत सिंह को सिर्फ़ एक युवा राष्ट्रवादी शहीद के तौर पर दिखाने की सोच को चुनौती देती है। मित्रोखिन की व्याख्या ने मार्क्सवादी सोच की ओर उनके मूवमेंट पर काफ़ी ज़ोर दिया। चमन लाल ने भी भगत सिंह के आइडियोलॉजिकल डेवलपमेंट को फिर से बनाने में इन सोवियत स्टडीज़ के महत्व पर ध्यान दिलाया है।इसी दौर में ए. वी. रायकोव (A. V. Raikov) ने भी भगत सिंह की वैचारिक विरासत पर लिखा। बाद में भारत और विदेश के विद्वानों—भूपेंद्र हूजा, चमन लाल, एस. इरफान हबीब, जे. डेनियल एलम और क्रिस मोफाट—ने भगत सिंह को केवल शहीद के रूप में नहीं बल्कि एक गंभीर राजनीतिक चिंतक के रूप में समझने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

इस इतिहास लेखन ने भगत सिंह के अध्ययन को केवल लाहौर षड्यंत्र केस और फांसी की घटनाओं तक सीमित रहने से बाहर निकाला और उनके पढ़ने, लिखने तथा राजनीतिक शिक्षा के महत्व को सामने रखा।

भूपेंद्र हूजा और प्रारंभिक प्रकाशन:

जेल डायरी के प्रकाशन के इतिहास में भूपेंद्र हूजा की भूमिका अग्रणी थी। उन्होंने पहले Indian Book Chronicle में जेल डायरी की सामग्री को प्रकाशित किया और बाद में A Martyr’s Notebook: Notes and Extracts from Books Read by Shaheed Bhagat Singh during His Prison Days (1929–31) नाम से पुस्तक प्रकाशित की, जो 1994 में सामने आई।

यह प्रकाशन इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे व्यापक पाठक समुदाय के सामने यह तथ्य आया कि भगत सिंह के जेल जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा गंभीर अध्ययन और बौद्धिक श्रम से जुड़ा था।

इसके बाद चमन लाल द्वारा संपादित The Jail Notebook and Other Writings (2007) एक महत्वपूर्ण विद्वतापूर्ण संस्करण बना। इसमें जेल डायरी को भगत सिंह के अन्य जेल-लेखन और दस्तावेजों के संदर्भ में प्रस्तुत किया गया।

हिंदी में शहीद-ए-आज़म भगत सिंह की जेल डायरी, 2011 में Unistar Publications/Kulbir Singh Memorial Foundation से प्रकाशित हुई। इस संस्करण ने हिंदी पाठकों के बीच जेल डायरी को व्यापक रूप से पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इस प्रकार जेल डायरी का आधुनिक प्रकाशन इतिहास संरक्षण, संपादन, पुनर्प्रकाशन और निरंतर नए इतिहास लेखन की प्रक्रिया है।

जेल डायरी और अन्य जेल-लेखन:

जेल डायरी को भगत सिंह के अन्य लेखन से अलग करके नहीं पढ़ा जाना चाहिए। इसके साथ “मैं नास्तिक क्यों हूं” (Why I Am an Atheist), “युवा राजनीतिक कार्यकर्ताओं के नाम” (To Young Political Workers), न्यायालय में दिए गए वक्तव्य, “बहरों को सुनाने के लिए” (To Make the Deaf Hear), परिवार और साथियों को लिखे पत्र तथा भूख हड़ताल और राजनीतिक बंदियों से संबंधित दस्तावेज भी पढ़े जाने चाहिए।

“मैं नास्तिक क्यों हूं” उनके तर्कवाद और बौद्धिक स्वतंत्रता को सामने लाता है। “युवा राजनीतिक कार्यकर्ताओं के नाम” राजनीतिक शिक्षा, संगठन और भविष्य की क्रांतिकारी राजनीति के बारे में उनकी चिंता को स्पष्ट करता है।न्यायालय को उन्होंने केवल कानूनी बचाव का स्थान नहीं माना; उसे राजनीतिक विचारों को जनता तक पहुंचाने के मंच के रूप में भी इस्तेमाल किया।इस प्रकार जेल डायरी उनके व्यापक बौद्धिक और राजनीतिक लेखन का एक अभिन्न हिस्सा है।

अंतिम अध्ययन—फांसी से पहले लेनिन:

जेल डायरी से जुड़ा सबसे मार्मिक और महत्वपूर्ण प्रसंग उनके अंतिम अध्ययन का है।बाद के शोध में क्लारा जेटकिन की Reminiscences of Lenin को उस पुस्तक के रूप में पहचाना गया है जिसे भगत सिंह फांसी से ठीक पहले पढ़ रहे थे। यह प्रसंग 23 मार्च 1931, उनके, राजगुरु और सुखदेव के फांसी दिए जाने वाले दिन से जुड़ा है।

इस तथ्य का महत्व केवल भावनात्मक या प्रतीकात्मक नहीं है। इसका वास्तविक ऐतिहासिक महत्व यह है कि यह उनके पूरे बौद्धिक विकास के साथ निरंतरता स्थापित करता है। जिस क्रांतिकारी ने जेल में मार्क्स, लेनिन और अनेक राजनीतिक, दार्शनिक तथा साहित्यिक लेखकों का अध्ययन किया था, वह मृत्यु के अंतिम क्षणों तक पढ़ रहा था।

इसलिए फांसी से पहले लेनिन पर पुस्तक पढ़ते हुए भगत सिंह की छवि केवल वीरता की कथा नहीं है; यह उनके ज्ञान, अध्ययन और वैचारिक प्रतिबद्धता की अंतिम अभिव्यक्ति भी है।

शहादत से बौद्धिक विरासत तक:

जेल डायरी भगत सिंह की विरासत को समझने का हमारा दृष्टिकोण बदल देती है। निस्संदेह, निर्भीक युवा शहीद की छवि उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन वह उनके व्यक्तित्व की पूरी तस्वीर नहीं है।

डायरी एक दूसरे भगत सिंह को सामने लाती है—एक ऐसे युवा बुद्धिजीवी को जो व्यापक अध्ययन करता था, महत्वपूर्ण अंशों को लिखता था, तर्कों की तुलना करता था और उन ऐतिहासिक शक्तियों को समझने का प्रयास करता था जो समाज को संचालित करती हैं।

उनकी क्रांतिकारी सोच में साम्राज्यवाद-विरोध के साथ उभरती हुई समाजवादी सामाजिक दृष्टि जुड़ती गई। इसका अर्थ यह नहीं कि उनके प्रत्येक विचार को रूढ़िबद्ध मार्क्सवाद में समेट दिया जाए। बल्कि उनकी डायरी एक ऐसे सक्रिय बौद्धिक विकास को दिखाती है जिसमें मार्क्सवादी और समाजवादी विचार लगातार अधिक महत्वपूर्ण होते गए।

आज जेल डायरी की प्रासंगिकता:

भगत सिंह की जेल डायरी की आज की प्रासंगिकता केवल एक शहीद को याद करने में नहीं, बल्कि पढ़ने, आलोचनात्मक चिंतन और सामाजिक जिम्मेदारी के महत्व को समझने में है। ऐसे समय में जब सार्वजनिक बहस अक्सर ध्रुवीकरण, भ्रामक सूचनाओं और बिना आलोचनात्मक परीक्षण के स्थापित धारणाओं से प्रभावित होती है, भगत सिंह का व्यापक अध्ययन और विभिन्न विचारधाराओं के बीच संवाद की पद्धति विशेष महत्व रखती है। उन्होंने मार्क्स, एंगेल्स और लेनिन के साथ रूसो, पेन, लॉक, ह्यूगो, दोस्तोयेव्स्की, गोर्की, टैगोर और अनेक अन्य लेखकों को पढ़ा। उनका बौद्धिक विकास बताता है कि देशभक्ति का अर्थ आलोचनात्मक प्रश्नों को छोड़ देना नहीं है और सामाजिक परिवर्तन के लिए ज्ञान तथा संगठित प्रयास दोनों आवश्यक हैं। श्रमिकों, किसानों, आर्थिक असमानता, सांप्रदायिक सद्भाव, धर्मनिरपेक्षता, तर्कवाद और सामाजिक न्याय के प्रति उनकी चिंता आज भी प्रासंगिक है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उनकी जेल डायरी हमें याद दिलाती है कि स्वतंत्रता केवल विदेशी शासन से राजनीतिक मुक्ति नहीं है; उसके भीतर समाज के प्रत्येक व्यक्ति की समानता, गरिमा और न्याय का प्रश्न भी शामिल है। इसलिए भगत सिंह की सबसे स्थायी विरासत केवल उनकी शहादत में नहीं, बल्कि उस जिज्ञासा, तर्क शीलता, अध्ययन शीलता, साहस और सामाजिक न्याय की प्रतिबद्धता में है, जिसके साथ उन्होंने उस दुनिया को समझने का प्रयास किया जिसे वे बदलना चाहते थे।

डॉ. रामजीलाल, सामाजिक वैज्ञानिक, पूर्व प्रिंसिपल, दयाल सिंह कॉलेज, करनाल (हरियाणा, भारत)

लेखक – डॉ. रामजीलाल

 

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