पीयूष मिश्रा की कहानी

फिल्म जगत

पीयूष मिश्रा की कहानी

राहुल मिश्रा

 

मुंबई का एक फुटपाथ। सुबह एक नौजवान की आंख खुली। रात वो जिस आदमी के कंबल में घुसकर सोया था, वो आदमी रात में ही दुनिया छोड़ चुका था। नौजवान उठा, और भाग गया।
जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के मंच से उसने ये किस्सा खुद सुनाया। कहा कि आज भी मुंबई में उस इलाके से गुजरता है, तो उस सड़क की तरफ नजर नहीं उठाता।
इस आदमी ने पंद्रह बरस की उम्र में अदालत में हलफनामा देकर अपना नाम खुद बदलवाया था। अपने लिए जो नाम चुना, उसका मतलब होता है… अमृत।
और फिर करीब बीस बरस वो एक गिलास से हारता रहा।
नाम… पीयूष मिश्रा।
पीयूष यानी अमृत।
गुलाल वाले पृथ्वी। गैंग्स ऑफ वासेपुर वाले नासिर। आरंभ है प्रचंड वाले।
आज साठ पार की उम्र में यही आदमी चौदह लोगों के एक बैंड के साथ दो-दो घंटे मंच पर गाता है। उस बैंड के बारे में कहता है, ये बैंड नहीं, परिवार है।
फुटपाथ से उस मंच तक का रास्ता आसान नहीं था। और उस रास्ते में जो सबसे बड़ी बात है, वो मैं आखिर में बताऊंगा। क्योंकि वो बात आधी सुनी जाए, तो गलत समझ आती है।
मन की सेहत पर जो सिलसिला मैंने शुरू किया है, उसमें आज बात उन्हीं की। गाने तो सबने सुने हैं। आज बात उस लड़ाई की, जो वो बरसों खुद से लड़े।
ग्वालियर। 13 जनवरी 1963।
घर में पैसे की तंगी थी। खर्च हल्का करने के लिए पूरा परिवार पिता की सबसे बड़ी बहन के घर जाकर रहने लगा। बुआ का नाम था तारादेवी मिश्रा। अपनी कोई औलाद नहीं थी, तो उन्होंने इस बच्चे को गोद ले लिया।


घर बुआ का था, हुक्म भी बुआ का चलता था। बचपन के बारे में पीयूष मिश्रा ने एक इंटरव्यू में बस इतना कहा कि वो बहुत चुप और शर्मीले बच्चे थे, स्कूल में भी दबाए गए, घर में भी, और अच्छा बचपन उन्हें मिला ही नहीं।
पढ़ने भेजा गया कॉन्वेंट में, कि लड़का पढ़-लिखकर कुछ बन जाए। फिजिक्स-केमिस्ट्री पल्ले नहीं पड़ती थी, तो नंदन और चंपक पढ़ते रहते। इसी जनवरी भोपाल के साहित्य उत्सव में उन्होंने किस्सा सुनाया कि विज्ञान की टीचर से साफ कह दिया था, मैं मेंढक नहीं चीरूंगा, उसे दर्द होगा।
जो बच्चा मेंढक के दर्द की फिक्र कर रहा था, उसके अपने दर्द के लिए उस घर में जगह कम थी।


आठवीं में पहली कविता लिखी। दसवीं में वो हलफनामा। द बेटर इंडिया से बातचीत में दर्ज है कि नाम उन्होंने बुआ के खिलाफ बगावत में बदला था। और यहीं एक बात अटकती है। नया सरनेम भी वही रखा, मिश्रा… जो बुआ का था।
उस घर में एक चोट और थी, जो किसी को नहीं दिखी।
सातवीं में पढ़ते थे, जब एक दूर की रिश्तेदार ने उनका यौन शोषण किया। ये बात उन्होंने करीब पचास बरस बाद, 2023 में अपनी किताब में लिखी, और फिर समाचार एजेंसी पीटीआई से बातचीत में खुद कही। कहा कि उस घटना ने उम्र भर उलझन दी, और बाहर आने में बहुत लंबा वक्त लगा। किताब में नाम बदल दिए, क्योंकि किसी से बदला लेना मकसद नहीं था।
हम मानकर चलते हैं कि ये खतरा सिर्फ बेटियों पर है। पीयूष मिश्रा की कहानी बताती है कि बेटे भी ये बोझ चुपचाप ढोते हैं। और बच्चा जो बात कह नहीं पाता, वो कहीं जाती नहीं। बरसों बाद किसी और शक्ल में लौटती है।
उनके मामले में वो शक्ल गुस्से की थी।
उन्होंने कहा है कि उस बचपन के बाद दो ही रास्ते थे। या तो मर-खप जाते, जो लोग कहते वही करते रहते। या सारा गुस्सा समेटते, और उससे कुछ बनाते। उन्होंने दूसरा चुना।
1983 में दिल्ली के नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा का इम्तिहान दिया। पढ़ाई की ललक में नहीं, बस ग्वालियर से निकलने के लिए। दूसरे साल जर्मनी से आए निर्देशक फ्रिट्ज बेनेविट्ज ने उन्हें हैमलेट बनाया। शेक्सपियर का वो राजकुमार, जो बाप की मौत के बाद भीतर ही भीतर सुलगता रहता है। उसके बाद एनएसडी में उनका नाम ही पड़ गया… हैमलेट।
फिर दिल्ली का थिएटर। एक्ट वन नाम का ग्रुप बना, साथ में मनोज बाजपेयी जैसे लोग थे। भगत सिंह पर उनका नाटक गगन दमामा बाज्यो खूब चला।


1992 में दिल्ली के स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर में नाटक कराने गए। वहां एक लड़की पढ़ती थी, प्रिया नारायणन। पिछले साल नवंबर में उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया कि देखते ही तय कर लिया था, शादी इसी से करनी है।
प्रिया के पिता फौज में कर्नल थे। एक थिएटर वाले से, जिसकी जेब में पैसे नहीं, बेटी ब्याहने को राजी नहीं थे। प्रिया चेन्नई का घर छोड़कर दिल्ली आ गईं। हाथ में कोई सरकारी कागज नहीं था, एक वकील दोस्त ने मदद की, और शादी हो गई। साल भर में उनके घरवाले भी मान गए।
और वो साल था 1995।
इसी साल, कारवां पत्रिका के एक लंबे लेख के मुताबिक, वो एक्ट वन से अलग हुए। और इसी साल की एक तारीख उस लेख में दर्ज है, जिस पर मैं ठहरा रहा।
13 सितंबर 1995।
उस दिन दो आदमी दुनिया से गए। एक, फ्रिट्ज बेनेविट्ज, जिन्होंने उन्हें हैमलेट बनाया था। दूसरे, उनके अपने पिता।
जो लड़का मंच पर बाप की मौत का गम निभा चुका था, उसके सामने अब वही गम असल में खड़ा था।
उसी लेख में एक और बात है। शराब थिएटर के दिनों में शौक की तरह आई थी, और 1995 के आसपास वो शौक समस्या बन गया। फिर अकेले बैठकर पीने का दौर आया। रोज रात।
इस साल एक पॉडकास्ट में उन्होंने इसे जिस तरह समझाया, वो मुझे किसी मेडिकल किताब से ज्यादा साफ लगा। कहा कि एक वक्त आता है जब लगने लगता है कि पीना जरूरी है। फिर आप चाहें या न चाहें, शरीर मांगता है। और सबसे खतरनाक बात ये कि शराबी को खुद पता ही नहीं चलता कि वो शराबी है।


हम सब यहीं गलती करते हैं। घर में कोई रोज पीने लगे, तो कहते हैं इसकी आदत खराब है, इरादा कमजोर है। पर जो आदमी चाहकर भी रुक नहीं पा रहा, उसका मामला इरादे का नहीं, बीमारी का है। और बीमारी ताने से नहीं, इलाज से जाती है।
2019 में एम्स के नेशनल ड्रग डिपेंडेंस ट्रीटमेंट सेंटर ने सरकार के लिए देशभर का सर्वे किया था। उसमें निकला कि शराब पीने वाला हर तीसरा आदमी ऐसी हालत में है कि उसे मदद चाहिए। और जिन्हें लत लग चुकी है, उनमें से अड़तीस में से करीब एक ही किसी इलाज तक पहुंचता है।
बाकी सैंतीस?
वो वहीं हैं, जहां कभी पीयूष मिश्रा थे।
उन्होंने बताया है कि शराब पीकर कभी एक्टिंग नहीं की, कभी नशे में सेट पर नहीं गए। पर दिमाग में शराब हर वक्त छाई रहती थी। नशे में ऐसी हरकतें कीं, जिनके बारे में बाद में लगता था कि ये मैं नहीं हूं। अगली सुबह कई बातें याद भी नहीं रहती थीं।
मां से रिश्ते पहले से बिगड़े थे। नशे में उन्होंने मां को ऐसी कड़वी बातें कहीं जो दिल दुखाती हैं। काम की दुनिया में लोग उनसे डरने लगे, कहने लगे, इस आदमी के साथ काम करना मुश्किल है। वो खुद मानते हैं कि पूरी तरह एंटी-सोशल हो गए थे।
कारवां वाले लेख में उनकी एक बात दर्ज है, जो इस पूरी कहानी का सार है। कि जो कुछ बना, उसी गुस्से से बना, और जो कुछ बिगड़ा, उसकी जड़ में भी वही गुस्सा था।
वही गुस्सा, जो ग्वालियर से साथ चला था।
मैं डॉक्टर नहीं हूं। पर इस कहानी में एक धागा साफ दिखता है। दबाया हुआ बचपन, भीतर जमा गुस्सा, और फिर उस गुस्से को सुन्न करने वाली बोतल। हर लत के पीछे यही कहानी हो, जरूरी नहीं। पर किसी अपने की लत पर गुस्सा आए, तो एक बार ये पूछ लेना बनता है कि वो पी क्या रहा है, और भुला क्या रहा है।
1999 में एनएसडी के मंच पर उन्होंने एक अकेले का शो किया। करीब बीस गाने, बिना किसी तय स्क्रिप्ट के। नाम था… हैमलेट कभी बंबई नहीं गया।
तीन साल बाद हैमलेट बंबई चला गया।
कारवां के मुताबिक दिल्ली में वो अटक गए थे, और एक बार और कोशिश के लिए प्रिया ने जोर दिया। वो मान गए।
और फुटपाथ वाली वो रात, जिससे मैंने बात शुरू की थी? वो मुंबई के शुरुआती संघर्ष के दिनों की है। किस साल की, ये उन्होंने नहीं बताया, और मैं अंदाजे से लिखूंगा नहीं।
2005 के आसपास उन्हें समझ आने लगा कि मामला हाथ से निकल रहा है, और उन्होंने मदद ली। ये उन्होंने हिंदुस्तान टाइम्स से बातचीत में बताया है।
फिर आया 2009।
ये वो साल था जब गुलाल आई। फिल्म में एक्टिंग उनकी, गाने उनके, संगीत भी उनका। आरंभ है प्रचंड उसी फिल्म का गाना है।
और उसी गुलाल का जश्न मनाने जब वो अमेरिका जा रहे थे, शरीर का एक हिस्सा काम करना बंद कर गया। ब्रेन स्ट्रोक था, दाहिनी तरफ असर हुआ। ये किस्सा उन्होंने इसी जनवरी भोपाल में सुनाया।
जिस साल लोग उनका आरंभ गुनगुना रहे थे, उस साल उनका अपना शरीर अंत की तरफ इशारा कर रहा था।
उन्होंने कहा है कि इसी झटके ने उन्हें अपनी लत से आंख मिलाने पर मजबूर किया। 2024 के एक इंटरव्यू में बोले कि वो तबाही की कगार से लौटे हैं, और उन्हें पता था कि ऐसे ही चलता रहा तो जिंदगी खत्म हो जाएगी।
महाराष्ट्र का इगतपुरी। 2010।
यहां उन्होंने विपश्यना का कोर्स किया, जिसमें कई दिन बिना बोले, अपने भीतर देखते हुए बैठना होता है। उनके मुताबिक वहीं से क्रेविंग धीरे-धीरे काबू में आने लगी, और जिंदगी बदलती चली गई।
ये उनका अपना रास्ता था, मैं इसे किसी के लिए इलाज की तरह नहीं लिख रहा। लत का इलाज डॉक्टर और नशा-मुक्ति केंद्र में होता है। जो बरसों से रोज पी रहा हो, उसके लिए अचानक अपने दम पर सब बंद कर देना भी खतरनाक हो सकता है, इसलिए छोड़ने का रास्ता डॉक्टर के साथ बनता है।
अब वो हिस्सा, जो इस कहानी में सबसे कम लिखा गया।
लौटना।
इसी अप्रैल में उन्होंने बताया कि शादी के बाद उन्हें ये समझने में दस-पंद्रह बरस लग गए कि प्रिया उनकी पत्नी हैं। उस दौर की अपनी कई गलतियां उन्होंने एक दिन प्रिया के सामने खुद कबूल कीं। कहा, हम दोनों रो रहे थे, और एक-दूसरे के गले लग गए।
प्रिया ने जो कहा, वो किसी भी घर के लिए सबक है। कि गलतियां तुमने भी कीं, मैंने भी कीं, तुमने ज्यादा कीं, मैंने कम। अब ये बातें यहीं खत्म करते हैं।
तलाक का रास्ता खुला था। प्रिया ने नहीं चुना। पीयूष इसे उनका बड़प्पन कहते हैं, और खुद को खुशकिस्मत। और आज अपने बारे में कहते हैं कि अब वो एक अच्छे पति हैं।
वही लड़की, जो चेन्नई का घर छोड़कर एक बेफिक्र थिएटर वाले के साथ आई थी। वही, जिसने उन्हें बंबई भेजा। अपनी कामयाबी का पूरा क्रेडिट वो आज भी उन्हीं को देते हैं।
मुंबई के घर में आज प्रिया चेट्टीनाड वाला खाना बनाती हैं, ये पीयूष ने पिछले साल बताया। दो बेटे हैं, दोनों ने अपनी-अपनी राह खुद चुनी, और उनमें से कोई कला की तरफ नहीं गया।
इस पर पीयूष ने जो कहा, वो मुझे इस पूरी कहानी की सबसे बड़ी जीत लगती है। कि उन्हें कला पसंद नहीं, तो क्यों जाएं। मेरे पिता को कला पसंद नहीं थी, पर मुझे थी।
जिस आदमी का बचपन दूसरों की मर्जी में दबा, उसने अपने बच्चों पर अपनी मर्जी नहीं लादी।
दबाव की जो जंजीर ग्वालियर से चली थी, वो उस घर में आकर टूट गई।
मां-बाप के नाम उन्होंने एक बात कही थी, जो हर उस घर के लिए है जहां बच्चे पर उम्मीदों का बोझ है। कि हर बच्चा आइंस्टाइन नहीं बन सकता, हर कोई लाखों नहीं कमा सकता, बच्चा एक अलग इंसान है।
और काम?
नवंबर 2024 में उनका बैंड बल्लीमारान कोलकाता से एक देशव्यापी टूर पर निकला। उड़नखटोला नाम का टूर, करीब पंद्रह शहर, और आखिर में इसी नाम से उनका पहला एल्बम। उस वक्त उन्होंने हंसते हुए कहा था कि इस उम्र में कौन एल्बम निकालता है, शायद मैं पहला हूं।
उसके बाद इसे अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन तक ले जाने की योजना बताई गई थी। इसी साल जनवरी में फिल्म राहु केतु आई। और भोपाल में बताया कि घर को ही थिएटर का मंच बना लेते हैं, वहीं रिहर्सल करते हैं। सबसे ज्यादा सुकून तब मिलता है, जब अकेले होते हैं और खुद से बात कर रहे होते हैं।
जो बच्चा ग्वालियर में सबसे चुप था, आज उसका सबसे अच्छा वक्त वही है, जब वो खुद से बोलता है।
और 2023 में आई उनकी किताब, तुम्हारी औकात क्या है पीयूष मिश्रा। उपन्यास की शक्ल में लिखी आत्मकथा, जिसमें घटनाएं सच हैं, बस नाम बदले हैं। नायक का नाम रखा, संताप त्रिवेदी।
संताप यानी भीतर की जलन।
पंद्रह बरस की उम्र में जिस लड़के ने अपने लिए अमृत चुना था, साठ की उम्र में उसने अपनी ही कहानी के नायक को संताप कहा। और फिर उस संताप को पूरे देश के सामने खोलकर रख दिया।
अब वो बात, जो मैंने शुरू में आखिर के लिए रख छोड़ी थी।
इसी साल एक पॉडकास्ट में इतना सब पा लेने के बाद पीयूष मिश्रा ने अपने बारे में एक लाइन कही।
मैं अभी भी शराब कभी कभी ले लेता हूं।
कहा कि ये लत कभी जड़ से नहीं जाती। आप रोज की मोहलत ले सकते हैं, पर इसे खत्म नहीं कर सकते।
कोई इसे सुनकर सोचेगा, जब वो ही नहीं छूट पाए, तो मैं क्या छोड़ूंगा, बाद में देखेंगे।
वो आधी बात सुन रहा है।
पूरी बात उन्होंने पिछले साल दिसंबर में हिंदुस्तान टाइम्स से कही थी। पूछा गया, जिंदगी का सबसे बड़ा पछतावा क्या है? बिना रुके बोले, शराब। कहा कि शुरू में ही काबू रखता, तो जिंदगी में कहीं बड़े काम करता। नशा रचनात्मकता को मार देता है। ये मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी गलती थी।
यानी जिस आदमी ने बीस बरस की लड़ाई लड़ी, ब्रेन स्ट्रोक झेला, मां को कड़वी बातें कहीं, पत्नी के सामने रोया, वो आज बताने लायक जो सबसे पहली बात बताता है, वो ये है कि काश शुरुआत ही न होती।
मैं उनके इस कबूलनामे को हार की तरह नहीं पढ़ता। ये चेतावनी है, जो सिर्फ वही दे सकता है जो उस आग से होकर निकला हो। इसका मतलब ये नहीं कि वो नहीं छोड़ पाए तो कोई और भी न छोड़े। इसका मतलब ये है कि ये बीमारी इतनी जिद्दी है कि एक बार घर कर ले, तो जिंदगी भर पहरा देना पड़ता है। इसीलिए इसकी सबसे सस्ती दवा है इसे घुसने ही न देना, और घुस चुकी हो, तो आज ही किसी का हाथ थाम लेना।
लत का सबसे पसंदीदा शब्द है… बाद में।
पीयूष मिश्रा की पूरी जिंदगी उसी एक शब्द की कीमत है।
लत से जीत एक दिन में नहीं होती। पर हार अक्सर एक ही शब्द से शुरू होती है, बाद में।
पीयूष मिश्रा ने जो किया, वो तीन बातों में…
पहली, बीमारी को उसके नाम से पुकारा। अपने लिए शराबी शब्द खुद कहा।
दूसरी, मदद ली। पहले 2005 के आसपास, फिर स्ट्रोक के बाद पूरी गंभीरता से।
तीसरी, सच बोला। किताब में, इंटरव्यू में, पत्नी के सामने। और घर बच गया।

राहुल मिश्रा के फेसबुक वॉल से साभार

लेखक – राहुल मिश्रा

Comments

Your email address will not be published.

0