लघु कथा
चिराग और तीलियां
डॉ रीटा अरोड़ा
“माँ, अब किसी का फोन नहीं आता।”
“पहले आता था?”
“हाँ… काम पड़ता था तो।”
“और अब?”
“अब शायद काम नहीं रहा।”
माँ ने उसे देखा।
“बुरा लगता है?”
“हाँ… थोड़ा।”
माँ ने दीपक जलाया और तीली बुझाकर उसकी हथेली पर रख दी।
“ये देख।”
“क्या?”
“चिराग जल गया… और तीली बुझ गई।”
वह चुप रहा।
“माँ, लोग ऐसे ही होते हैं क्या?”
“सब नहीं।”
“फिर?”
“कुछ लोग तुम्हें याद करते हैं… कुछ तुम्हारे काम को।”
“पहचानूँ कैसे?”
माँ मुस्कुराई।
“जब कोई बिना काम के फोन करे, समझ लेना… वो अपना है।”
“और जो सिर्फ काम से याद करे?”
“उससे नाराज़ मत होना।”
“क्यों?”
“उसने रिश्ता नहीं निभाया… बस जरूरत निभाई।”
वह कुछ देर बुझी तीली को देखता रहा।
फिर बोला-
“तो माँ, मैं लोगों के काम आना छोड़ दूँ?”
माँ ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“नहीं बेटा। बस उम्मीद थोड़ी कम रखना।”
वह मुस्कुराया।
माँ ने धीरे से कहा-
“चिराग जलते ही तीलियां बुझा दी जाती है… मगर उसका जलाया उजाला बेकार नहीं जाता।”
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