भोपाल में भगवत रावत से मिलने के बाद
सेवानिवृत्त अध्यापकों के होली-मिलन समारोह में
रमेश जोशी
अभी लौटा हूँ भोपाल से
उस आदमी से
मिलकर जो सत्तर छूती देह में भी
जी रहा है एक किशोर को
जो आज भी चूम सकता है बाँहों में भरकर
अपने हमउम्र शिष्य को
बिना किसी तथाकथित उत्सव के भी
लगा सकता है ठहाके |
और एक हम हैं जिन्हें
वरिष्ठ नागरिक बनने और
सभी बच्चों के व्यवस्थित हो जाने पर भी
नहीं मिल रही है फुर्सत
दो घड़ी मिल-बैठने की
इतने व्यस्त तो हम
तब भी नहीं थे जब
पूरी नहीं पड़ती थी तनख्वाह
तीस दिनों के लिए
तब भी निकाल ही लेते थे समय
किसी चाय या पान की दुकान पर
घंटों बतियाने का
और भूल जाते थे कि घर पर
पत्नी सब्जी का इंतज़ार कर रही होगी |
अब फुर्सत नहीं मिलती
किसी को पाँच-सात हजार की मास्टरी करने से,
किसी को घर के
बरामदे में कोई फोटोस्टेट या
पी.सी.ओ. की दुकान चलाने से या
किसी कोचिंग इंस्टीट्यूट में पढ़ाने से |
अब भी हिसाब लगा रहे हैं
पे कमीशन के बाद मिलने वाले एरियर का |
बहुत देर न हो जाए
इससे पहले जो कह न सके
उसे कह लें|
यहाँ से लौटकर,
सारी झिझक छोड़कर
शब्दों को खदेड़कर
लाएँ जुबान पर
और पत्नी से कह ही दें
कि मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ,
बड़े हो चुके बच्चों को
चूम लें बाँहों में भरकर,
फोन के बिल का हिसाब लगाए बिना
बतियालें पुराने दोस्तों से,
पढ़ लें पुरानी चिट्ठियाँ अगर कहीं
किताबों में दबी मिल जाएँ तो |
कोई तुम्हारी हरकतों को
बचकाना कहे तो परवाह
मत करना उसकी |
उस पिघलते, छलकते आदमी से
मिलकर लौटने के बाद
अपने को व्यक्त करने का इतना साहस तो
जुटा ही सकते हैं हम |
सच,
बहुत अच्छा लगेगा उसे
अपनी कविता को यूँ जीवन में घुलते-बहते देखकर |
इससे अधिक
कभी कुछ चाहा भी तो नहीं
उसने अपनी कविता से
अपने जीवन से |
१७-४-२००८
