राजकुमार कुम्भज की दो कविताऍं
1.मेरा होना संभावना है अब भी.
मेरा होना संभावना है अब भी
क्या-कुछ होना था,क्या कुछ हुआ
बहुत ही कमज़ोर है गणित नागरिकों का
सुबह से करते हैं शुरू हो जाती है रात
फिर रात के अंधेरे में सिर्फ़ अंधेरा ही
और अंधेरे में तमाम घने संदर्भ अंधेरे के
बढ़ते ही जाते हैं और बार-बार हर कहीं
जो होना नहीं था,हो रहा है वह और वही
मुझे भी होना था कुछ,हुआ नहीं
जारी हैं उत्पात और उपद्रव जारी हैं ढ़ेरों
इधर-उधर उछलकूद कर रहे हैं बंदर
मुझे कुछ बोलना था उछलकूद-विरूद्ध
मैं देखता रहा,मैं देखता रहता हूॅं तमाशा
और शामिल भी हो रहता हूॅं कभी-कभी
मुझे कुछ होना था,कुछ खोना था ख़ुद को
बचना नहीं,कुछ रचना था जैसेकि हवन
एक कॅंकर तो फेंकना ही था ठहरे जल में
मुश्किल हुआ कितना एक कॅंकर उठाना
बहुत ही कमज़ोर है गणित नागरिकों का
मेरा होना संभावना है अब भी.
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2.क्राॅंतिकारी तलाश रहे हैं कंबल.
तोप-तलवारें तनीं हैं सामने
बच्चों से छीनी जा रही हैं पाठशालाऍं
ढ़ेरों घृणाऍं चिपकाई जा रही हैं पुस्तकों में
फ़ैसले हैं कि बस थमते जाते हैं फ़सलों के
फिसलपट्टी पर चढ़-उतर रहे हैं अख़बार
भाषा ने तय करली है हुक्केदारी की लय
हाॅं और ना के बीच झूल रहे हैं चमत्कार
जैसेकि हर दूसरे पर इल्ज़ाम है चोरी का
ठगी में लिप्त मिलता है हर तीसरा
हर चौथे पर शक़ है सरकारी-जासूस का
वर्तुल ही वर्तुल हैं जीवन की राह में
अंधेरे में काल की काली बिल्ली के पाॅंव
धीरे से यहीं-कहीं,आते-जाते देखता हूॅं मैं
पता नहीं क्या वक़्त हुआ है घड़ी में
घंटाघर में दिन हैं फिर हड़ताल के पूर्ववत
और सकुशल गुज़र रही हैं शोभायात्राऍं
क्राॅंतिकारी तलाश रहे हैं कंबल.
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