अंधश्रद्धा निर्मूलन को समर्पित जीवन: नरेंद्र दाभोलकर

अंधश्रद्धा निर्मूलन को समर्पित जीवन: नरेंद्र दाभोलकर

गुरमीत अंबाला

सामाजिक कार्यों में लगातार सक्रिय रहते हुए,आखिर डाक्टर नरेंद्र दाभोलकर को वो रास्ता मिल ही गया,जहां से अंधश्रद्धा निर्मूलन का एक व्यापक क्षेत्र उनके सामने खुलता था। जिस पर वो जीवन पर्यंत चलते रहे और फिर इसी मिशन के लिए अपनी जान न्योछावर कर गए।

महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति की शुरुआत

अंधश्रद्धा निर्मूलन आंदोलन में डाक्टर अब्राहम थामस कोव्वुर की मृत्यु के बाद बी. प्रेमानंद अस्सी के दशक में देश ही नहीं विश्व में अंधविश्वास विरोधी आंदोलन का एक जाना पहचाना चेहरा बन चुके थे। वे देश भर में विभिन्न संस्थाओं द्वारा बुलाए जाते थे। ऐसे ही संस्थाओं के बुलावे पर उनका महाराष्ट्र आगमन हुआ।ढोंगी बाबा चमत्कार कैसे करते हैं, यह समझने की उत्सुकता लोगों में सदा होती रही है। बी . प्रेमानंद के व्याख्यान जानकारी भरपूर होने के साथ ही मनोरंजक भी होते थे। इस कार्यक्रम को देखते-देखते लोगों को बाबाओं की मक्कारी, आंदोलन की जरूरत और अंधश्रद्धा के पीछे का दार्शनिक विश्लेषण समझने को मिलता था।

कोल्हापुर से नागपुर तक कई शहरों में उनके प्रदर्शन युक्त व्याख्यान हुए। इन व्याख्यानों से प्रेरित होकर कई स्थानों पर कार्यकर्ता एकजुट हुए। उन्होंने जन-जागरूकता के लिए समितियां और संस्थाएं बनाईं। कोल्हापुर में इस समय ‘विज्ञान प्रबोधिनी’ की स्थापना हुई, जिसने गांव-गांव जाकर प्रयोग दिखाए। इन सब से प्रभावित होकर 1981 में डॉ. नरेंद्र दाभोलकर और उनके साथियों ने अखिल भारतीय अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति बनाई। जिसे 1983 में पुनर्गठित करके
‘महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति’ बनी और महाराष्ट्र राज्य को अपना कार्यक्षेत्र बनाया।
अब इस क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए बहुत से कार्यों में निपुणता की जरूरत थी।चमत्कार का प्रदर्शन कैसे करें? भाषणों में कौन से मुख्य बिंदु बताएं? कौन सी बातें टालें? हास्य-व्यंग्य कहां शामिल करें?—इसका एक पूरा शास्त्र तैयार किया गया।यह समझा गया कि यदि नई पीढ़ी में वैज्ञानिक दृष्टिकोण आ जाए तो कड़ी तोड़ने (Break the Chain) के तरीके से अंधश्रद्धा से मुक्ति मिल सकती है। इस सोच के साथ शुरुआत में विभिन्न स्थानों पर छात्रों के लिए कार्यक्रम आयोजित किए गए।

भारत में जब भी अन्धविश्वास विरोधी आंदोलन को याद किया जाएगा ,वह तब तक अधूरा रहेगा जब तक डा. नरेंद्र दाभोलकर का नाम उसमें दर्ज नहीं होगा।
चमत्कारों का पर्दाफाश कार्यक्रम देते नरेंद्र दाभोलकर

साथ ही ढोंगी,पाखण्डी बाबाओं का पर्दाफाश करना भी शुरू किया गया। ‘अंनिस’ ने जासूसों को भी मात देने वाली बाबाओं को पकड़ने की तकनीक विकसित की। आम जनता को भगवान और धर्म का डर दिखाकर, चमत्कार दिखाकर ठगने वाले बाबा जाल में फंसने लगे। पूरे महाराष्ट्र में सैकड़ों ढोंगी बाबाओं का पर्दाफाश हुआ। इनमें सभी जातियों और धर्मों के लफंगे शामिल थे,क्योंकि ढोंगी की कोई जाति या धर्म नहीं होता। वह ठगते समय अपनों और परायों में भेद नहीं करता; बल्कि अपने करीबी रिश्तेदारों, जाति-भाइयों और धर्म-बंधुओं को ही ज्यादा ठगता है। इन सब अभियानों से पोल खुलने के डर से बाबाओं की रक्षा के लिए कुछ ‘बचाव समितियां’ भी बनीं। वे अस्थायी होती थीं और किसी एक बाबा तक ही सीमित रहती थीं। लेकिन एक व्यापक ‘बाबा बचाव समिति’ (ढोंगी बचाओ समिति) ने उन्हें संगठित करने का प्रयास किया। विशेष बात यह थी कि इस समिति ने ठगे गए धर्म-बंधुओं की बिल्कुल परवाह नहीं थी, उन्हें ढोंगी बाबा को बचाना ही धर्म-कार्य लगता था, क्योंकि पैसा वही दे सकता था,लेकिन इन सब के विरोध को झेलते हुए भी डाक्टर नरेंद्र दाभोलकर अनिस के कार्यकर्ताओं के साथ मैदान में डटे रहे और फिर योजनाबद्ध विभिन्न अभियान चला कर इन सब की ठगी की दुकानदारी को तोड़ने में लगे रहे।

अंधश्रद्धा निर्मूलन अभियान

डॉ. नरेंद्र दाभोलकर ने अपने जीवन में बहुत से ऐसे अभियान चलाए जो जन आंदोलन का रूप बन गए। जिसमें से कुछ निम्न रहे:-
* विज्ञान वाहिनी
* युवा एल्गार अभियान
* भानामती (टोना-टोटका) विरोधी अभियान
* भूत की खोज – मन की बोध यात्रा
* भूत दिखाओ – इनाम पाओ
* जादुटोना विरोधी कानून अभियान
* जातिवाद पंचायतों को मिट्टी में मिलाओ अभियान
* जटा (जटाएं हटाना) निर्मूलन अभियान(बहुत सी महिलाएं सूखना सुख लेती है कि अमुक कार्य के सम्पन्न होने तक बालों को धोएंगी नहीं जिस से बड़ी बड़ी बालों की जटाएं बन जाती है)
* अघोरी डाकिन (डायन) विरोधी अभियान
* भूत का साया / ओपरी कसर/देवी देवता का शरीर में प्रवेश – प्रबोधन अभियान
* पर्यावरण संरक्षण
* मेलों,यात्राओं और पूजास्थलों में पशु बलि विरोधी अभियान
* छद्म विज्ञान ( Pseudoscience) के खिलाफ संघर्ष
* युवाओं का विवेक जागरण
* चमत्कार दिखाओ, 21 लाख रुपए का इनाम पाओ चुनौती
* वैज्ञानिक दृष्टिकोण का प्रचार और अंगीकार
* महिलाओं का मंदिर प्रवेश अभियान

आंदोलन की जानकारी जनता तक पहुंचाने के लिए मीडिया का भरपूर उपयोग डाक्टर नरेंद्र दाभोलकर ने किया व्याख्यानों ,चमत्कारों के पर्दाफाश कार्यक्रमों के साथ ही इसे व्यवस्थित और स्थायी रूप देने के लिए ‘प्रकाशन विभाग’ भी शुरू किया गया।

मराठी भाषा में ‘अंधश्रद्धा निर्मूलन वार्तापत्र’ पत्रिका और अंग्रेजी में Thought and Action पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरू की गई और साथ ही पुस्तकों का प्रकाशन भी शुरू किया गया। पूरे राज्य में हजारों कार्यकर्ता आंदोलन में शामिल हुए! किस व्यक्ति का कहां और कैसे उपयोग करना है, यह हुनर नरेंद्र दाभोलकर के पास था। वे एक बेहतरीन आयोजक (Organiser) थे।

 

जादू टोना विरोधी कानून

डाक्टर नरेंद्र दाभोलकर को अपने विभिन्न अभियानों को चलाते रहने से यह अनुभव हुआ कि भारतीय संविधान वैज्ञानिक चेतना के प्रचार प्रसार की बात करता है,लेकिन धरातल पर जनमानस वैज्ञानिक चेतना से कोसों दूर अंधविश्वासों की जकड़न में फंसा हुआ है , बहुत से ढोंगी जनता की इसी अज्ञानता का फायदा उठा कर शारीरिक,आर्थिक और मानसिक शोषण करते हैं। कुछ ढोंगी बकायदा संगठन बना कर लोगों को बेवकूफ बना रहे हैं,इसके लिए जागरूकता अभियानों के साथ ही ऐसे कानूनों की भी आवश्यकता है जिस से ढोंगियो पर शिकंजा कसा जा सके। मौजूदा कानून सीमित मात्रा में ही काम करते थे।

1991 में पुणे जिले के ओतूर में वाघमारे नाम के एक ढोंगी बाबा ने आतंक मचा रखा था। ढोंग रचाकर वह उच्च वर्ग की समृद्ध महिलाओं का खुलेआम यौन शोषण कर रहा था। उसकी करतूतों की पोल ‘अंनिस’ के कार्यकर्ताओं ने खोली। उसने समाज विरोधी काम किए थे, यह साफ था; लेकिन उस पर किस कानून के तहत केस दर्ज किया जाए? यह बड़ा सवाल था।
उस समय भास्करराव मिसर पुणे के पुलिस कमिश्नर थे। ठगी करने वाले बाबाओं को पकड़ने के लिए तत्कालीन कानूनों की वित्तीय धोखाधड़ी, महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार, और मेडिकल प्रैक्टिस एवं दवाओं से संबंधित धाराओं का सहारा लिया जाता था, लेकिन यह बेहद अपर्याप्त था। एक नए कानून की सख्त जरूरत थी।

नरेंद्र दाभोलकर ने पूर्व जजों, कानूनी विशेषज्ञों और वकीलों से संपर्क किया, उनसे कानून का प्रारूप (ड्राफ्ट) तैयार करवाने के बाद वे राजनेताओं के पास पहुंचे। नेताओं को कानून की जरूरत समझाई। लेकिन केवल उन्हें समझा देने से काम नहीं चलता, क्योंकि राजनेता चुनाव पर पड़ने वाले असर को देख कर ही रुख तय करते हैं,


लेकिन अंधश्रद्धा विरोधी कानून की चर्चा छिड़ने से ‘बाबा बचाव समिति’ और अंधश्रद्धा से फायदा उठाने वाले सब एक हो गए। उन्होंने धर्म भीरु जनता को बहकाना शुरू कर दिया कि यह कानून धार्मिक भावनाओं के विरुद्ध होगा।

हमेशा की तरह “धर्म पर हमला” का शोर मचाकर कानून का विरोध किया। झूठे प्रचार का बवंडर खड़ा किया गया और आम जनता में भ्रम फैलाने में सफल रहे, जिसके परिणामस्वरूप कानून अटक गया,लेकिन नरेंद्र दाभोलकर शांत बैठने वाले नहीं थे। उन्होंने धरना, प्रदर्शन के साथ-साथ खून से पत्र लिखना, सरकार उनकी बात सुने इस के लिए खुद के गाल पर थप्पड़ मारना जैसे अभिनव आंदोलन करके विषय को जीवित रखा। गलतफहमी में विरोधियों के साथ चले गए संगठनों से संवाद कायम किया।

विधानसभा के सत्रों के दौरान उन्होंने सचिवालय के चक्कर काटे। लेख लिखकर, पुस्तिकाएं छापकर, भाषण देकर सुप्त जनमत को अपनी ओर मोड़ा। इस कानून को पारित करवाने के लिए उन्होंने अपनी मृत्यु तक, यानी लगातार 18 वर्षों तक बिना थके प्रयास किया। यह भी अपने आप में एक रिकॉर्ड है। इस पूरे दौर में वे कभी चिढ़े नहीं। किसी को भला-बुरा नहीं कहा। कभी निराश नहीं हुए और न ही प्रयास छोड़े! विरोधियों से भी अत्यंत विनम्रता और शांति से चर्चा करने को वे हमेशा तैयार रहते थे। अंधश्रद्धा में फंसे आम इंसान को वे एक मरीज मानते थे। उनका मानना था कि बीमारी ठीक करनी है तो मरीज के साथ करुणा से पेश आना पड़ेगा।

उन्होंने सभी आंदोलन भारतीय संविधान और धर्मनिरपेक्षता के दर्शन के अनुकूल चलाए। वैज्ञानिक, विवेकवादी, सहनशील, दूसरों के विचारों का सम्मान करने वाली, तथा धर्म और ईश्वर का विरोध न करने वाली इस कार्यशैली के कारण वे समाज सुधारकों और संतों की विरासत को आगे बढ़ा सके। ईश्वर और धर्म को लेकर उनका दृष्टिकोण संविधान के अनुकूल ही था।
भारतीय संविधान ने प्रत्येक नागरिक को अपनी आस्था और धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता दी है। आंदोलन इस स्वतंत्रता का सम्मान करता है। धर्म का विरोध नहीं है, बल्कि धर्म का गलत इस्तेमाल करके दंगे भड़काने और नफरत फैलाने वाले धर्मांधों का विरोध है! ईश्वर का विरोध नहीं है, बल्कि ईश्वर और भाग्य का डर दिखाकर आम इंसान को लूटने वाले ढोंगी बाबाओं का विरोध है,यही संगठन का स्टैंड था, लेकिन विरोधियों ने ‘अंनिस’ के बारे में झूठा प्रचार किया कि ये भगवान विरोधी हैं, धर्म-विरोधी हैं, और केवल एक ही धर्म का विरोध करते हैं।

18 वर्षों चले लंबे आंदोलन की प्रणति,असंख्य संशोधनों से गुजरते हुए आखिर डाक्टर नरेंद्र दाभोलकर के बलिदान के बाद बढ़ते देश व्यापी जन उभार से सरकार को तत्काल अध्यादेश के जरिए यह कानून लागू करना पड़ा ,जो बाद में विधायिका से पारित होकर कानून की शक्ल में सामने आया,नरेंद्र दाभोलकर ने अपने खून से सींच कर इसे समाज के लिए अर्पित किया ।

सामाजिक कृतज्ञता कोष की स्थापना

अपने समाज में विचरते रहने से नरेंद्र दाभोलकर ने महसूस किया किआदर्शवाद से प्रेरित बहुत से सामाजिक कार्यकर्ताओं को अक्सर आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ता है। वे भावात्मक रूप से संगठन के प्रति इतने समर्पित हो जाते हैं कि अपनी सीमित दैनिक जरूरतें भी पूरी नहीं कर पाते,कुछ कार्यकर्ताओं के पास आय के कोई साधन नहीं होते हुए भी पूर्णकालिक समाज सेवा करते हैं।इसी आवश्यता को देखते हुए उन्होंने 1985 में
सामाजिक कृतज्ञता कोष की स्थापना की जिसे ‘सामाजिक कृतज्ञता निधि’ नाम दिया गया। एक अभिभावक के रूप में अपने दायित्व को समझते हुए नरेंद्र दाभोलकर ने स्वीकार किया कि ऐसे कार्यकर्ताओं के लिए इस कोष से नियमित आर्थिक सहायता का प्रावधान होगा। पूरे महाराष्ट्र में घूमते वे ऐसे लोगों को साथ जोड़ने में सफल रहे जो संगठन की लगातार आर्थिक मदद कर सकते थे और उन के सहयोग से इस कोष को संपन्न किया, लेकिन अपने कार्यकर्ताओं से उनका सदा यही कहना रहता था कि वे पहले अपनी नौकरी, व्यवसाय और परिवार संभालें, फिर आंदोलन में भाग लें। कार्यकर्ताओं का भविष्य अधर में न लटके, इसके लिए वे हमेशा प्रयासरत रहते थे।

साहित्यिक सफर

सामाजिक कार्यों में व्यस्त रहते हुए भी उन्होंने लेखन जारी रखा। समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, अंनिस के मुखपत्र और ‘साधना’ साप्ताहिक में लिखने के अलावा उन्होंने 12 पुस्तकें भी लिखीं।
* ‘भ्रम आणि निरास’ (भ्रम और निवारण): उनकी इस पहली पुस्तक की प्रस्तावना प्रसिद्ध समाजवादी विचारक ना. ग. गोरे ने लिखी थी। इसमें अंधश्रद्धा से जुड़े विभिन्न विषयों का विश्लेषण है।
* ‘अंधश्रद्धा : प्रश्नचिन्ह आणि पूर्णविराम’: इस पुस्तक में विभिन्न प्रश्नों के उत्तर दिए गए हैं। शिविरों और भाषणों में श्रोता जो सवाल पूछते थे, उनका वर्गीकरण करके यह किताब तैयार की गई। इसके सह-लेखक ‘वार्तापत्र’ के पूर्व संपादक प्रो. आरडे हैं। इस पुस्तक को महाराष्ट्र सरकार के साहित्य एवं संस्कृति विभाग द्वारा उत्कृष्ट साहित्य पुरस्कार भी मिला है।
* ‘अंधश्रद्धा विनाशाय’ और ‘लढे अंधश्रद्धेचे’: इन दोनों किताबों में विभिन्न ढोंगी बाबाओं का पर्दाफाश करने की कहानियां हैं।
* ‘विचार तर कराल’ (विचार तो करेंगे): इस पुस्तक में प्लानचेट (आत्माओं को बुलाना) जैसी अंधश्रद्धाओं के पीछे की मानसिकता की पड़ताल की गई है।
इस पुस्तक में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और विवेकवाद को रेखांकित किया गया है।
* ‘श्रद्धा अंधश्रद्धा’: इसमें श्रद्धा और अंधश्रद्धा का बारीक विश्लेषण किया गया है। ईश्वर की अवधारणा और नीति-विचारों पर भी मंथन किया गया है।
* ‘विवेकाची पताका घेऊ खांद्यावरी’: यह समाचार पत्रों में लिखे गए उनके वैचारिक लेखों का संग्रह है। इसमें धर्मनिरपेक्षता, धर्म-समीक्षा और विवेकवाद की आवश्यकता को स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया गया है।
* ‘ठरलं डोळस व्हायचंय’ (तय किया है, विचारशील बनना है): यह ‘सकाल’ पत्र में पत्राचार के रूप में दिए गए उत्तरों का संकलन है। इसमें वे कहते हैं— “विचारशील बनने का मतलब है जाति और धर्म से ऊपर उठकर इंसान बनना!”
* ‘ऐसे कैसे झाले भोंदू’: इसमें उन्होंने ढोंगबाजी का पूरा कच्चा चिट्ठा खोला है। संत तुकाराम, महात्मा फुले, राजर्षि शाहू महाराज, डॉ. अंबेडकर और प्रबोधनकार ठाकरे जैसे महान विचारकों की परंपरा वाले महाराष्ट्र में ढोंगबाजी का धंधा कैसे फल-फूल रहा है, इसका विश्लेषण है।
* ‘तिमिरातून तेजाकडे’ (अंधकार से प्रकाश की ओर): इसमें एक हिस्सा अंधश्रद्धा निर्मूलन के सिद्धांत पर, दूसरा अंनिस के व्यावहारिक संघर्षों पर और तीसरा सैद्धांतिक पक्षों पर है। इस पुस्तक को ‘अंनिस’ का ज्ञानकोश (एनसाइक्लोपीडिया) कहा जा सकता है।
* ‘प्रश्न मनाचे’ (मन के प्रश्न): यह पुस्तक उन्होंने पुत्र डॉ. हमीद दाभोलकर के साथ मिलकर लिखी है, जिसमें मानसिक बीमारियों के बारे में जानकारी दी गई है।
* ‘मती भानामती’: माधव बावगे के साथ लिखी गई इस किताब में टोने-टोटके (भानामती) के बारे में विस्तृत जानकारी और घटनाओं का वैज्ञानिक विश्लेषण है।
उनकी पुस्तकों के अब तक १० से १५ से अधिक संस्करण निकल चुके हैं। उनकी किताबें ‘राजहंस प्रकाशन’ द्वारा प्रकाशित की गईं।

प्रकाशन विभाग

स्कूली बच्चों तक इन विचारों को पहुंचाने के लिए अन्य कार्यकर्ताओं ने भी लेखन किया। इसके लिए ‘अंनिस’ ने प्रकाशन विभाग शुरू किया। ‘अंनिस’ की ओर से ‘चमत्कारों का विज्ञान’, ‘ढोंगबाजी: भ्रम के क्षेत्र में’, ‘किशोरावस्था की ओर’, ‘सर्प विज्ञान’, ‘व्यसनमुक्ति और एड्स’ जैसी छोटी-छोटी पुस्तिकाएं प्रकाशित की गईं। इन्हें कम कीमत पर छात्रों को उपलब्ध कराया गया। इसकी जिम्मेदारी शुरुआत में मारोतराव पांगे और बाद में प्रो. मच्छिंद्रनाथ मुंडे ने संभाली। इसके जरिए दूर-दराज के गांवों तक प्रबोधन पहुंचाया गया।

वार्तापत्र (मुखपत्र)

आंदोलन के प्रसार के लिए एक मुखपत्र भी निकाला गया ।समिति के विभिन्न केंद्रों द्वारा कई गतिविधियां और आंदोलन चलाए जाते हैं। उनकी नियमित और प्रामाणिक जानकारी कार्यकर्ताओं और पाठकों तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण काम यह वार्तापत्र करता है।
‘जल प्रदूषण रोकें’, ‘पूजा सामग्री (निर्माल्य) पानी में न फेंकें’, ‘विसर्जित गणेश मूर्तियों को दान करें’, ‘होलिका दहन छोटा करें – पोली और उपले दान करें’, ‘पटाखा-मुक्त दिवाली’ जैसे अभियान चलाए गए।कार्यकर्ताओं द्वारा पकड़े गए बाबाओं की जानकारी, विरोध-प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सामाजिक कार्यकर्ताओं के जीवन चरित्र और विचार, धार्मिक स्थलों पर ढोंगबाजी और ठगी, त्योहारों-समारोहों की रचनात्मक समीक्षा आदि । पर्यावरण-अनुकूल पहल, विरोधियों के आपत्तियों के जवाब, वैचारिक रूप से समान संगठन और कार्यकर्ता, अंधश्रद्धा से जुड़ी किताबों की समीक्षा, भाषणों की रिपोर्टिंग और आगामी कार्यक्रमों की योजना—ऐसी विविध सामग्री वार्तापत्र में होती है; इसीलिए यह पाठकों में बेहद लोकप्रिय बना।

कुछ खास विषयों पर इसके विशेषांक निकलते हैं। साल में एक बार दिवाली अंक की तर्ज पर संयुक्त अंक निकलता है। वार्तापत्र चंदा और विज्ञापनों से धन जुटाता है। इससे पत्रिका का खर्च निकलता है और आंदोलन के लिए कोष भी जमा होता है। यह पूरी व्यवस्था सहयोगियों की मदद से डॉ. दाभोलकर ने बनाई। उसी समय उन पर साप्ताहिक पत्रिका ‘साधना’ की भी जिम्मेदारी आ पड़ी।

साधना (साप्ताहिक)

दिसंबर 2013 में अंधविश्वास विरोधी कानून को एक अध्यादेश के जरिए लागू करने की घोषणा कर दी, जिस के लिए पिछले अठारह वर्षों से नरेंद्र दाभोलकर संघर्ष कर रहे थे। वे अपने भाषणों में अक्सर कहा भी करते थे कि यह कानून उनकी मौत के बाद ही बनेगा।
डॉ नरेंद्र दाभोलकर अंध श्रद्धा निर्मूलन समिति, साधना पत्रिका के संपादक

समाजवादी विचारों से चलने वाली ‘साधना’ साप्ताहिक की स्थापना साने गुरुजी ने की थी। इसका एक पारिवारिक स्वरूप था। साधना के 50 साल पूरे हो चुके थे। देश में उदारीकरण का दौर आ गया था। इंटरनेट, टीवी चैनल और बड़े समाचार पत्रों के सामने छोटी पत्रिकाओं का टिकना मुश्किल हो रहा था। ऐसी चर्चा शुरू हो गई थी कि साधना अब बंद हो जाएगी और इसका ऐतिहासिक कार्य समाप्त हो चुका है।

ऐसे कठिन समय में ‘साधना’ के संपादन की जिम्मेदारी भी डॉ. नरेंद्र दाभोलकर को मिली। बंद होने के कगार पर खड़ी साधना का उन्होंने कायाकल्प कर दिया। उन्होंने ऐसे प्रयास किए जिससे सभी प्रगतिशील विचारकों को यह अपनी पत्रिका लगे। पत्रिका में विविधता ले कर आए।

राजनीति और समाजशास्त्र के साथ-साथ दलित साहित्य, बाल साहित्य, विज्ञान, कला, संस्कृति, नाटक और महिलाओं के मुद्दों को इसमें शामिल किया। गणमान्य हस्तियों को संपादकीय बोर्ड में लिया। विशेषांकों के लिए अतिथि संपादक नियुक्त किए।इससे ‘साधना’ की बिक्री बढ़ गई। यह विभिन्न क्षेत्रों की घटनाओं और विचारों का एक बड़ा मंच बन गई।

25 वर्षों तक वे ‘साधना’ के संपादक रहे। साधना में लिखे गए उनके चुनिंदा संपादकीय लेखों का संग्रह “समता संगर” नाम से प्रकाशित हुआ है।

विभिन्न क्षेत्रों के गणमान्य लोगों के सम्मेलन

विभिन्न क्षेत्रों के गणमान्य लोगों को एक मंच पर लाकर विचार-मंथन करना और समाज हित के निष्कर्ष निकालना—इसमें भी नरेंद्र दाभोलकर माहिर थे। शिक्षा के माध्यम से वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने के लिए उन्होंने राज्य भर के शिक्षाविदों और विचारकों को इकट्ठा किया और ‘शिक्षा परिषद’ का आयोजन किया। कई संस्थापकों से अपने शिक्षण संस्थानों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने की अपील की।

शुरुआत में पुणे के ‘एस. एम. जोशी फाउंडेशन हॉल’ में ‘वैज्ञानिक चेतना एवं अंधश्रद्धा निर्मूलन शैक्षणिक घोषणापत्र परिषद’ आयोजित की गई। यह पहला चरण था। इस सम्मेलन में वाई. डी. फड़के, तर्कतीर्थ लक्ष्मण शास्त्री जोशी, प्रो. एन. डी. पाटिल, डॉ. श्रीराम लागू जैसे महान विचारकों ने शिरकत की। दूसरा चरण जलगांव में संपन्न हुआ।
इससे पहले सातारा में भी ‘रयत शिक्षण संस्था’ की पहल पर ऐसा सम्मेलन हुआ था। उसमें “बच्चों में कौन-कौन सी अंधश्रद्धाएं होती हैं”, इस विषय पर संगठन की कार्यकर्ता प्रो. प्रमोदिनी मंडपे ने एक शोध पत्र प्रस्तुत किया था। इससे शिक्षा क्षेत्र के संचालकों और शिक्षकों के दृष्टिकोण का महत्व रेखांकित हुआ।
जलगांव सम्मेलन का धर्म-आधारित राजनीति करने वाले दलों ने विरोध किया, इसलिए सरकार को भारी पुलिसकर्मियों की सुरक्षा देनी पड़ी। ऐसी ही एक ‘वैज्ञानिक चेतना कार्य परिषद’, विवेक वाहिनी के अध्यक्ष व राज्यमंत्री किसनराव देशमुख की पहल पर लातूर के कार्यकर्ताओं ने आयोजित की।
15 फरवरी 1997 को सातारा में “अंधरूढ़ियों की बेड़ियां तोड़ो” सम्मेलन हुआ। इस विषय पर कुमार मंडपे ने राज्य स्तर पर निबंध प्रतियोगिता आयोजित करके छात्रों और शिक्षकों की राय जानी।
नंदुरबार और धुले में ‘डायन प्रथा विरोधी सम्मेलन’ आयोजित किया गया। इन आदिवासी इलाकों में महिलाओं को ‘डाकिन’ (डायन) घोषित कर उन पर जादू-टोना करने का आरोप लगाकर मार दिया जाता था। इसके खिलाफ कार्यकर्ताओं ने जन-जागरूकता फैलाई।

एडवोकेट वडगांवकर और खुद ‘पोतराज’ रह चुके बनसोडे (उस्मानबाद के कार्यकर्ता) की पहल पर, पोतराज प्रथा से होने वाले शोषण को रोकने के लिए उस्मानाबाद में ‘पोतराज परिषद’ आयोजित की गई। इचलकरंजी (कोल्हापुर) में तीन दिवसीय ‘ढोंगबाजी संघर्ष परिषद’ और राज्यव्यापी सम्मेलन हुआ। इस दौर में प्राथमिक शिक्षकों को अनुदान न मिलने के कारण आंदोलन करने पड़ रहे थे, लेकिन उसी समय मानव संसाधन केंद्रीय मंत्री ने ज्योतिष का कोर्स शुरू करने वाले कॉलेजों को तुरंत अनुदान देने का फरमान जारी किया था।

सोलापुर की महिला कार्यकर्ता शालिनीताई ओक की पहल पर ‘महिला सम्मेलन’ का आयोजन किया गया।

जाति पंचायतों की कार्यवाही पर रोक और जाति तोड़क विवाह

जाति-उन्मूलन के लिए अंतरजातीय विवाह” अभियान ‘अंनिस’ द्वारा कई सालों से चलाया जा रहा है। महाराष्ट्र में ऐसे सैकड़ों विवाह करवाकर, जाति तोड़कर शादी करने के कारण होने वाली आत्महत्याओं और ऑनर किलिंग (हत्याओं) को रोका गया है
‘जात-पंचायत’ के जुल्मों के विरुद्ध भी अनिस ने अभियान चलाए हैं कबीलाई समाज के दौर में सामाजिक व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए कबीले के भीतर नियम बनाए गए थे। आगे चलकर इन्ही कबीलों ने जातियों का रूप ले लिया और नियमों का सख्ती से पालन करवाने के लिए पंचायतें बैठने लगीं। जबकि समाज सामंतवाद से होता हुआ पूंजीवादी व्यवस्था तक पहुंच चुका है लेकिन जात पंचायतें अभी तक कनिलयुग की तरह व्यवहार कर रही हैं इन जात-पंचायतों ने हजारों साल तक समाज पर नियंत्रण रखा, वंश-शुद्धता और सदस्यों के आपसी व्यवहार को संचालित किया।
भारतीय संविधान लागू होने के बाद जात-पंचायतें और उनके नियम अप्रासंगिक हो गए हैं ,लेकिन जात-पंचायतें समाज में बनी रहती हैं।’ जिसका ‘सामाजिक बहिष्कार’ एक असामाजिक कृत्य है।

जात-पंचायत की मनमानी पर लगाम कसने के लिए ‘अंनिस’ आगे बढ़ी कई मामलों की गुत्थी सुलझाई गई, सम्मेलन आयोजित किए गए। डॉ. दाभोलकर की हत्या के बाद भी कार्यकर्ताओं ने लड़ाई जारी रखी और ‘महाराष्ट्र सामाजिक बहिष्कार विरोधी कानून 2026″ बनवाकर ही दम लिया।

‘जादू-टोना विरोधी कानून’ और ‘सामाजिक बहिष्कार विरोधी कानून’—ये दोनों कानून डॉक्टर नरेंद्र दाभोलकर की शहादत के बाद कार्यकर्ताओं के अथक परिश्रम से हकीकत रूप में सामने आए हैं।
महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति डाक्टर नरेंद्र दाभोलकर की शहादत के बाद भी उनके द्वारा शुरू किए गए आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए जी जान से लगी है और महाराष्ट्र राज्य में अपना व्यापक प्रभाव रखती है साथ ही देश भर में काम करती तर्कशील(Rationalist) संस्थाओं से तालमेल रखते हुए राष्ट्रीय स्तर के आयोजनों में भी अपनी भागीदारी करतीहैं।

महाराष्ट्र राज्य में समिति के कार्यों से प्रभावित होकर साथ लगते राज्यों छत्तीसगढ़,कर्नाटक,गोवा, तेलंगना में भी प्रगतिशील लोगों ने संगठित होकर ऐसी संस्थाओं को बनाया है और उत्तरोतर अंधविश्वास,रूढ़ियों के उन्मूलन में सक्रिय हैं ।इन सब संस्थाओं में डाक्टर नरेंद्र दाभोलकर एक प्रेरणा स्त्रोत हैं और सदा रहेंगे।

डॉक्टर नरेंद्र दाभोलकर का जीवन और संघर्ष

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