सुरेंद्र कंवल की एक ग़ज़ल

सुरेंद्र कंवल की एक ग़ज़ल

 

इस कदर ढ़लने लगी है जिंदगी।

बर्फ सी गलने लगी है जिंदगी।

 

अब नही लोरी रही मां की कहीं,

फ़ोन से पलने लगी है जिंदगी।

 

प्यार के अब आवरण को ओढ़ कर,

हर घड़ी छलने लगी है जिंदगी।

 

मस अले ही मस अले देखा जिधर,

किस तरह चलने लगी है जिंदगी।

 

अब शिकायत भी करें किस से भला,

खुद को जब खलने लगी है जिंदगी।

 

आंसुओ की इस नई तासीर से,

आग सी जलने लगी है जिंदगी।

 

अब मुझे महसूस सा होने लगा,

सांझ सी ढ़लने लगी है जिंदगी।

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