लघु कथा
रिश्तों का नमक
डॉ रीटा अरोड़ा
“पापा, फिर शर्मा अंकल के घर? उनके अपने बेटे हैं, हमारी ज़िम्मेदारी क्यों?”
पिता ने चुपचाप अपनी थाली से एक रोटी अलग रख दी।
“कब तक दूसरों के लिए जीते रहेंगे?”
पिता ने कुछ नहीं कहा। बस रोटी ढककर बाहर चले गए।
कुछ महीने बाद पिता को लकवा मार गया।
अमित अस्पताल पहुँचा। शर्मा अंकल उनके सिरहाने बैठे थे।
“अंकल, आप रातभर यहीं थे?”
“बेटा, मेरी पत्नी के जाने के बाद मैं घंटों रोता था। तेरे पापा कुछ नहीं बोलते थे, बस पास बैठे रहते। कहते थे, शर्मा, तेरा दुख बाँट नहीं सकता, पर तुझे अकेला भी नहीं छोड़ सकता।”
अमित का गला भर आया।
उसने पिता के काँपते हाथ पकड़ लिए।
“पापा, मैं तो आपके होते हुए भी कभी आपके पास नहीं बैठा…”
पिता की आँखों से आँसू बह निकले। उन्होंने धीरे से अमित का हाथ शर्मा अंकल के हाथ पर रख दिया।
अगली सुबह पिता नहीं रहे।
तेरहवीं के बाद शर्मा अंकल लौटने लगे।
अमित ने उन्हें रोक लिया।
“अंकल, पापा कहते थे, नमक के बिना भोजन और इंसानियत के बिना रिश्ते फीके होते हैं।”
फिर रुंधे गले से बोला-
“मैंने सारी उम्र पापा को दूसरों पर समय बरबाद करने से रोका… आज समझा, वो समय नहीं, अपना दिल बाँटते थे।”
उसने शर्मा अंकल को गले लगा लिया।
“अंकल, अब कभी अकेले मत खाना।”
उस रात अमित ने पिता की खाली कुर्सी के पास शर्मा अंकल की थाली लगाई।
और पहली बार उसे समझ आया-पिता ने विरासत में मकान नहीं, किसी का अपना बनना सिखाया था।
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