कविता
मन
कुलभूषण उपमन्यु
उसी ने समझा, उसी ने जाना;
जिसने उसका, कहना माना.
चाहे जितनी, रात घनी हो;
फिर से सूरज, का उग आना.
पतझड़ झड़े, जो पत्ते सारे;
बासंती बन, कर लौटाना.
कोमल-कोमल, हरीतिमा में;
सकल उदासी, का खो जाना.
छिटपुट बातों में, बह कर भी;
गहराई में, गोते खाना.
माँ के कोमल, हाथों सौंपा;
और पिता की, ऊँगली पाना.
बहती जाती, नदियों का फिर;
बादली बन, कर लौट आना.
पक्के तेरे, इंतजाम हैं;
बिरथा मन, तेरा घबराना.
