जसवीर त्यागी की पांच कविताएं
सूखा
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शिक्षा की सर्वोच्च डिग्री लिए
एक बेरोजगार युवा मुझसे मिलने आया
आने से पूर्व मिलने का समय मांगा
औपचारिक दुआ-सलाम के बाद
मैंने पूछा-खाना खाओगे?
वह बोला-गुरुजी आप क्यों परेशान होते हैं?
उसका कथन मेरे सवाल का उत्तर न था
मैंने भोजन की थाली मंगवायी
भोजन करने के बाद
उसमें अपने दुःख को कहने की कुछ हिम्मत आयी
संसार में,न जाने कितने काबिल युवा हैं?
जो लंबे समय से बेरोजगारी की बीमारी से ग्रस्त हैं
बेरोजगारी महामारी की तरह
दिन-प्रति-दिन फैलती जा रही है
युवाओं के स्वप्न
झरनों की तरह सूखते जा रहे हैं
इस दुर्दांत समय में
सिर्फ़ संवेदनाओं के सरोवर ही नहीं सूख रहे हैं
इंसान की आँखों का पानी भी सूखता जा रहा है।
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बेरोज़गार की नींद
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बेरोज़गार को
देर से आती है नींद
संवेदनाओं की सड़क पर
विचारों के वाहन
देर रात तक
आते-जाते रहते हैं।
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प्रतिभा का प्रभाकर
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लंबे समय से बेरोजगार
शिष्य ने कहा-
गुरुजी नौकरी कैसे मिलेगी?
हर जगह तो सिफारिश का राज है
योग्यता से पहले ही
आसन पर विराजमान मिलती है वही
क्या हुनर का हरसिंगार सूखा ही रहेगा?
उसके सच्चाई भरे स्वरों को
मैं सुन सकता था
कुछ पल विचारकर शिष्य को समझाया-
सिफारिश का दीया
खुद प्रज्वलित नहीं होता
दूसरों को जलाना पड़ता है
प्रतिभा का प्रभाकर
स्वयं आलोकित होता है
और परिवेश का अंधकार हरता है।
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कागज़-कलम
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दुनिया के
सबसे सुंदर कागज़-कलम हैं वे
जो किसी बेरोजगार को
रोजगार मिलने की खबर देते हैं।
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बेरोजगार
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बेरोजगार लड़का
रात को दबे पाँव घर में घुसता है
यह सोचकर
कि बूढ़े पिता सो चुके होंगे
पिता हकीकत जानते हैं
नींद की मुद्रा बना
मुँह फेरकर लेटे रहते हैं
पिता और पुत्र
दोनों को सच्चाई पता है
कोई अनभिज्ञ है
तो वह रोजगार है।
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