बदलाव की आहट के बीच एक विश्लेषण मेरा भी

बदलाव की आहट के बीच एक विश्लेषण मेरा भी

  • 2047 का सपना या सत्ता की स्थायी सल्तनत की तैयारी?

रत्ना भदौरिया

मेरे मन में एक सवाल है, और सवाल भी ऐसा जिसे केवल राजनीतिक विरोध कहकर खारिज नहीं किया जा सकता—क्या 2047 तक विकसित भारत का सपना दिखाने वाली भाजपा की राजनीति के भीतर 2029 के बाद सत्ता को स्थायी बनाने की कोई महत्वाकांक्षा आकार ले रही है? क्या हम एक ऐसे दौर की दहलीज पर खड़े हैं, जहां चुनाव तो होंगे, लेकिन सत्ता बदलने की संभावना धीरे-धीरे बेमानी बना दी जाएगी?
मैं किसी गुप्त योजना का दावा नहीं कर रही लेकिन सत्ता के इरादों को लेकर सवाल उठाना नागरिक का अधिकार है। आखिर सत्ता पर आंख मूंदकर भरोसा करने की सीख इतिहास ने कब दी है? इतिहास तो यही बताता है कि जब सत्ता को अपनी ताकत का नशा चढ़ता है, तब सबसे पहले उसे सवाल चुभने लगते हैं, फिर आलोचक खटकने लगते हैं और अंततः असहमति ही अपराध जैसी दिखाई जाने लगती है। तो क्या 2047 के भारत की कल्पना में सत्ता का चेहरा भी हमेशा वही रखने की कोई अदृश्य आकांक्षा शामिल है? क्या विकसित भारत का सपना जनता के विकास के लिए है या सत्ता के वर्चस्व को लंबी उम्र देने वाला राजनीतिक आख्यान भी बन सकता है?

ये सवाल इसलिए उठते हैं क्योंकि लोकतंत्र केवल चुनाव की तारीख घोषित कर देने का नाम नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या विपक्ष बिना भय और असमान बाधाओं के सत्ता को चुनौती दे सकेगा? क्या पत्रकार बिना दबाव के सवाल पूछ सकेंगे? क्या संवैधानिक संस्थाएं सत्ता की इच्छा से स्वतंत्र होकर काम कर सकेंगी? क्या नागरिक सरकार की आलोचना करते हुए स्वयं को राष्ट्र का दुश्मन कहलाने के भय से मुक्त रख पाएगा?

और सबसे बड़ा सवाल—यदि सत्ता को हराने की संभावना ही धीरे-धीरे कमजोर कर दी जाए, तो चुनाव में जनता की भागीदारी का लोकतांत्रिक अर्थ आखिर कितना बचा रहेगा?

भाजपा से यह सवाल पूछना जरूरी है कि 2047 के विकसित भारत में सत्ता की जवाबदेही का स्थान क्या होगा। क्या सत्ता अपने विरोध को लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा मानेगी, या हर असहमति को अपनी प्रतिष्ठा पर हमला समझेगी?
क्या सरकार यह स्वीकार करेगी कि राष्ट्र उससे बड़ा है, संविधान उसकी महत्वाकांक्षाओं से बड़ा है और जनता का अधिकार किसी भी राजनीतिक दल की इच्छा से बड़ा है?
तानाशाही का खतरा केवल तब नहीं पैदा होता, जब कोई शासक खुलेआम कहे कि अब चुनाव नहीं होंगे। खतरा तब भी पैदा हो सकता है, जब सत्ता के सारे रास्ते एक तरफ झुकने लगें, संस्थागत संतुलन कमजोर पड़े और जनता के सामने विकल्प कागज पर तो मौजूद हों, लेकिन उन्हें प्रभावी ढंग से इस्तेमाल करने की परिस्थितियां लगातार कठिन होती जाएं।
क्या हमें उस दिन का इंतजार करना चाहिए, जब लोकतंत्र पर संकट का प्रमाण हमारे सामने खड़ा हो, या आज ही यह पूछना चाहिए कि सत्ता को निरंकुश होने से रोकने वाली व्यवस्थाएं कितनी मजबूत हैं?
मुझे 2029 के बाद की किसी अनहोनी का निश्चित दावा नहीं करना। मगर यह मान लेना भी आत्मघाती आत्मसंतोष होगा कि कोई खतरा कभी पैदा ही नहीं हो सकता। किसी भी सरकार की नीयत का अंतिम फैसला आरोपों से नहीं, उसके आचरण और प्रमाणों से होगा। लेकिन जनता का सवाल पूछने का अधिकार किसी प्रमाणपत्र का मोहताज नहीं होना चाहिए।
सत्ता चाहे जितनी लोकप्रिय हो, उसे अपनी सीमाओं में रहना होगा। बहुमत चाहे जितना बड़ा हो, वह संविधान से बड़ा नहीं हो सकता। और कोई नेता चाहे जितने लंबे भविष्य की बात करे, वह भविष्य जनता की स्वतंत्रता की कीमत पर नहीं लिखा जा सकता।
आखिर 2047 में भारत विकसित होगा, लेकिन क्या भारतीय नागरिक भी सत्ता के सामने निर्भीक रहेगा? 2029 के बाद सरकार कौन चलाएगा, यह चुनाव तय करेगा—लेकिन क्या चुनाव को स्वतंत्र, निष्पक्ष और वास्तविक विकल्पों वाला बनाए रखने की गारंटी भी उतनी ही मजबूत होगी?
मेरे लिए यही बदलाव की आहट के बीच सबसे गंभीर सवाल है। क्योंकि मुझे किसी दल के भविष्य से अधिक भारत के लोकतांत्रिक भविष्य की चिंता है।

रत्ना भदौरिया के फेसबुक वॉल से साभार

Comments

Your email address will not be published.

0