आम जनता के दुख सुख, हंसी मजाक को अपने किरदारों के जरिये जीने वाले अभिनेता नाना पाटेकर का कल रात निधन हो गया। नाना ने आम आदमी का सिर्फ किरदार ही नहीं निभाया बल्कि उस पीड़ित आम आदमी के कष्ट को कैसे कम किया जा सकता है, उस तरफ भी ध्यान दिया और उनके दुख सुख में शरीक हुए। उनके निधन पर श्रद्धांजलि स्वरूप प्रतिबिम्ब मीडिया में नाना पाटेकर के अभिनेता से इतर जीवन पर रोशनी डाल रहे हैं कुमार सौवीर। संपादक
आत्महत्या पीड़ित 4,940 घरों की कराह और नाना पाटेकर
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पर्दे का अभिनेता मगर जिंदगी का आदमी किया कमाल
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किसानों की मौत ने खुरदुरा वाले नाना को सोने नहीं दिया
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नाना ने गरीब को किरदार नहीं, इंसान समझा दोस्त के साथ
कुमार सौवीर
किसी किसान की मौत की खबर अखबार में छपती है, टीवी पर कुछ मिनट चलती है, सोशल मीडिया पर कुछ घंटे बहस होती है और फिर हम सब अपनी-अपनी जिंदगी में लौट जाते हैं। लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनके लिए किसी अनजान आदमी की मौत भी खबर बनकर नहीं आती, वह भीतर जाकर चोट करती है। नाना पाटेकर शायद इसी चोट से निकले हुए आदमी हैं। जिस देश में किसान की आत्महत्या धीरे-धीरे एक आंकड़ा बनती गयी, वहां नाना ने उस आंकड़े के पीछे छिपे चेहरे को देखने की कोशिश की। वह चेहरा किसी फिल्म का एक्स्ट्रा नहीं था, वह एक परिवार का पिता था, किसी बच्चे का सहारा था, किसी स्त्री का पति था और सबसे बढ़कर वह आदमी था जिसके हाथों से देश का अन्न निकलता था।
नाना ने किसान आत्महत्याओं को देखकर केवल दुख व्यक्त नहीं किया। वह गांवों तक गये। परिवारों से मिले। मकरंद अनासपुरे के साथ नाम फाउंडेशन खड़ा किया। शुरुआत संकट में पड़े किसान परिवारों की मदद से हुई, लेकिन बात वहीं नहीं रुकी। पानी, सिंचाई, खेती, गांव, शिक्षा, स्वास्थ्य और आत्मनिर्भरता तक पहुंच गयी। यही वह बिंदु है जहां नाना अभिनेता से आगे निकलकर नागरिक दिखाई देते हैं। अभिनेता अपनी भूमिका खत्म करके घर लौट जाता है, लेकिन नाना ने जैसे भूमिका खत्म करने से इनकार कर दिया। यह वह नाना पाटेकर था जो 13 साल की उम्र में सड़क की जेब्रा लाइन पर पेंटिंग कर पेट पालता था।
नाना और मराठी अभिनेता मकरंद अनासपुरे ने सितंबर 2015 में नाम फाउंडेशन शुरू की। इसकी शुरुआत महाराष्ट्र में सूखे, किसान आत्महत्याओं और गांवों की बदहाली को देखकर हुई थी। शुरुआत में आत्महत्या करने वाले किसानों के परिवारों को सीधे आर्थिक सहायता दी गयी, लेकिन बाद में संस्था ने पानी संरक्षण, खेती, शिक्षा, स्वास्थ्य, विधवा सहायता, गांवों के विकास और आपदा राहत जैसे कामों को अपना लिया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि नाम फाउंडेशन की अपनी रिपोर्ट के अनुसार अब तक 4,940 किसान आत्महत्या प्रभावित परिवारों को आर्थिक सहायता दी गयी है और 1,900 ऐसी महिलाओं की सहायता की गयी जो किसान आत्महत्या के बाद विधवा हुईं। यानी यह एक फोटो खिंचवाकर चेक देने वाली गतिविधि नहीं रही।
और यहीं उनके साथ आमिर खान खड़े दिखाई देते हैं। दोनों का रास्ता एक नहीं है, लेकिन मंजिल में एक अद्भुत समानता है। आमिर ने पानी को पकड़ा, नाना ने किसान के दुख को। आमिर ने जल-संरक्षण और गांवों की सामूहिक शक्ति को अपना माध्यम बनाया, नाना ने किसान परिवारों के दर्द से शुरुआत की। आमिर के पास योजनाबद्ध संस्था है, नाना के पास भीतर तक चुभा हुआ अनुभव। दोनों ने यह समझने की कोशिश की कि किसान को केवल सहानुभूति नहीं चाहिए, उसे ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें वह अपने खेत में जिंदा रह सके। हालांकि अमिताभ बच्चन, शाहरूख, सूद और अक्षय आदि कई अभिनेताओं ने आपदाओं से पीडित लोगों की मदद की, लेकिन उनकी मदद केवल चेक आदि तक ही सीमित रही, जबकि नाना तो दुख और आत्महत्या कर चुके किसान के परिवार को स्थाई राहत दिलाने में जुटे थे।
नाना की कहानी इसलिए ज्यादा भावुक करती है कि उन्होंने किसान को दया का पात्र नहीं बनाया। उन्होंने यह नहीं कहा कि बेचारे किसान को कुछ पैसे दे दो और मामला खत्म। उन्होंने उस सवाल को पकड़ा जो ज्यादा कठिन था। आखिर किसान मर क्यों रहा है? खेत क्यों नहीं बच रहा? पानी क्यों नहीं है? परिवार कर्ज में क्यों डूब रहा है? गांव में उम्मीद क्यों खत्म हो रही है? किसी मृत किसान की विधवा के हाथ में सहायता रखना जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी है कि अगली विधवा पैदा न हो। नाना की यात्रा इसी फर्क को समझने की यात्रा है।
उनकी अपनी जिंदगी भी कोई राजसी कहानी नहीं रही। संघर्ष से निकलकर वह उस मुकाम तक पहुंचे जहां एक अभिनेता करोड़ों कमा सकता है, बड़े घर में रह सकता है, अपनी दुनिया में सीमित हो सकता है। लेकिन नाना ने अपने लिए दूसरी राह चुनी। वह राह चमकदार नहीं थी। वहां लाल कालीन नहीं था, कैमरे नहीं थे, पुरस्कार नहीं थे। वहां सूखे खेत थे, किसान के घर का सन्नाटा था और ऐसी औरतें थीं जिनके पति वापस कभी नहीं आने वाले थे।
यही वजह है कि नाना पाटेकर की सामाजिक भूमिका को केवल “दान देने वाले अभिनेता” की तरह देखना उनके व्यक्तित्व को छोटा कर देना होगा। असली बात यह है कि उन्होंने अपनी प्रसिद्धि को किसी विज्ञापन की तरह इस्तेमाल नहीं किया। उन्होंने उसे गांव तक पहुंचाने की कोशिश की। आमिर खान उनके साथ इस रास्ते पर खड़े हैं, अपने अलग तरीके और अलग संस्था के साथ। लेकिन नाना के चरित्र की सबसे तीखी रेखा यही है कि वह किसी किसान की मौत को केवल किसान की मौत नहीं मानते।
शायद नाना की पूरी कहानी को एक ही वाक्य में कहा जा सकता है कि उन्होंने पर्दे पर गरीब आदमी का किरदार बहुत निभाया, लेकिन असली जिंदगी में गरीब आदमी को कभी किरदार नहीं बनने दिया।
