फ्रांस की सड़कों से भारत तक: आखिर दुनिया भर में जनता आक्रोशित क्यों?

समसामयिक

फ्रांस की सड़कों से भारत तक: आखिर दुनिया भर में जनता आक्रोशित क्यों?

धर्मेन्द्र आज़ाद

 

आज सिर्फ भारत की सड़कें ही जन आंदोलनों से नहीं गूँज रहीं, बल्कि दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी जनता का गुस्सा खुलकर सड़कों पर आ रहा है।

आजकल फ्रांस में छात्र और शिक्षक बेहतर शिक्षा, स्कूलों में पर्याप्त स्टाफ और मजबूत शिक्षण व्यवस्था की मांग को लेकर सड़कों पर हैं। कई जगहों पर प्रदर्शनकारियों और प्रशासन के बीच तीखा टकराव भी देखा गया है।

हैरानी की बात यह है कि यह विरोध ऐसे समय में हो रहा है जब एक तरफ फ्रांस सरकार आर्थिक तंगी का रोना रोकर जनहित से जुड़ी योजनाओं का बजट लगातार काट रही है। लेकिन दूसरी तरफ, सरकार अपनी सैन्य ताकत बढ़ाने, रक्षा बजट को मोटा करने और परमाणु-सक्षम मिसाइलों के परीक्षणों पर पानी की तरह पैसा बहा रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद से यूरोप के तमाम देश इसी होड़ में लगे हैं।

सवाल बिल्कुल सीधा है—जब जनता के बुनियादी कामों के लिए पैसा न होने का दावा किया जाता है, तो हथियारों और युद्ध के लिए यह खजाना कहाँ से निकल आता है?

यही सवाल आज फ्रांस की सड़कों से उठकर पूरी दुनिया के सामने खड़ा हो गया है: आपकी प्राथमिकता जनता है या हथियार?

आज दुनिया भर के लोग महंगाई, बेरोजगारी, बढ़ती असमानता और महंगी होती शिक्षा-स्वास्थ्य से त्रस्त हैं। एक तरफ सरकारें बाजार, संसाधनों और वैश्विक प्रभाव के लिए एक-दूसरे से गला-काट प्रतिस्पर्धा कर रही हैं, तो दूसरी तरफ युद्ध और हथियारों पर खर्च दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है।

पैसा कम नहीं है—असली सवाल प्राथमिकता का है। और यही सवाल सीधे तौर पर भारत से भी जुड़ता है।

भारत सरकार दावा करती है कि देश की अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है और दुनिया में हमारा डंका बज रहा है। लेकिन देश के आम नागरिक और युवा के सामने आज भी वही पुराने और बुनियादी सवाल खड़े हैं:

हमारा रोजगार कहाँ है?
हमारे सरकारी स्कूलों की इमारतें जर्जर क्यों हैं?
हमारे अस्पतालों में इलाज के लिए दर-दर क्यों भटकना पड़ता है?

महंगी होती शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं की लंबी और थका देने वाली प्रक्रिया, पेपर लीक, और महीनों-सालों तक भर्ती के नतीजों का इंतजार—यह आज देश के लाखों परिवारों का रोज का दर्द है।

हाल के युवा आंदोलनों ने सिर्फ नौकरियों या पेपर लीक के खिलाफ ही आवाज नहीं उठाई, बल्कि अब चुनाव की पारदर्शिता और लोकतांत्रिक अधिकारों के सवाल को भी मजबूती से सामने रख दिया है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि देश की रक्षा और अर्थव्यवस्था की मजबूती महत्वपूर्ण है। लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा का दायरा सिर्फ टैंक, मिसाइल या सीमा पर तैनात फौज तक सीमित होना, या मजबूत अर्थव्यवस्था का मतलब सिर्फ जीडीपी के आंकड़ों का बढ़ना और चंद लोगों का मालामाल होना नहीं है।

जिस युवा के हाथ में रोजगार नहीं है, जिस परिवार के लिए अस्पताल का खर्च उठाना नामुमकिन हो गया है, उससे यह कह देना कि “देश की अर्थव्यवस्था तरक्की कर रही है” या “सीमाएँ सुरक्षित हैं”, उसके जख्मों पर मरहम नहीं लगा सकता।

आज अमेरिका-चीन की तनातनी, रूस-यूक्रेन का युद्ध, पश्चिम एशिया का संघर्ष और यूरोप का बढ़ता सैन्य बजट एक बड़े वैश्विक संकट की ओर इशारा करता है।

जब ताकतवर देशों के बीच आपसी खींचतान या लड़ाई होती है, तो इसका असली नुकसान आम जनता को उठाना पड़ता है। जनता को महंगाई, बेरोजगारी, घर-बार छोड़ने की मजबूरी और युद्ध जैसी बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, साथ ही जन कल्याणकारी योजनाओं के पैसों में भी कटौती कर दी जाती है।

ऐसे में दुनिया भर में लोगों का रंग-रूप, भाषा-संस्कृति, खान-पान भले ही अलग हो, पर विरोध के सुर एक जैसे हैं—

फ्रांस का छात्र पूछता है— “मेरे स्कूल के लिए बजट क्यों नहीं?”
भारत का युवा पूछता है— “मेरा रोजगार कहाँ है?”
कारखाने का मजदूर पूछता है— “मेरी मेहनत की सही कीमत क्यों नहीं?”
पसीना पोंछता हुआ किसान पूछता है— “मेरी आय लगातार घटती क्यों जा रही है?”
और आम नागरिक पूछता है— “देश की दौलत और नीतियां आखिर किसके लिए हैं?”

आज दुनिया भर में सबसे बड़ा सवाल यही है—सत्ता और अर्थव्यवस्था की दिशा आम जनता की बुनियादी जरूरतों की तरफ होने के बजाय चंद लोगों के मुनाफे और ताकत की अंधी होड़ की तरफ क्यों है?

यही वह सवाल है जो आज फ्रांस की सड़कों से लेकर भारत के गाँवों और शहरों तक गूँज रहा है।

यही सवाल इस मुनाफाखोर पूँजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था को खत्म कर एक जनवादी व्यवस्था कायम करने की जरूरत को लगातार केंद्र में ला रहा है।

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