दिल्ली की घटनाओं पर साहित्यकारों की चुप्पी

दिल्ली की घटनाओं पर साहित्यकारों की चुप्पी

रत्ना भदौरिया

 

कुछ लोग मुझसे नाराज़ होंगे—अव्वल तो इसलिए कि मुझे छपने-छपाने, पुरस्कारों और मंचों का कोई मोह नहीं। इसलिए सवाल करने में मुझे अपनी कुर्सी खिसकने का डर भी नहीं है।

दिल्ली में इतना कुछ घट रहा है और हमारे बीच के कुछ गंभीर लेखन करने वाले, पुरस्कारों से अलंकृत साहित्यकार लगभग मौन हैं। उनकी आवाज़ अक्सर उन्हीं मंचों पर सुनाई देती है, जहाँ उनके शब्द सुरक्षित रहते हैं—न पुरस्कारों की संभावना पर आँच आती है, न पत्रिकाओं के दरवाज़े बंद होने का भय होता है। वे बोलते भी हैं तो उतना ही, जितना उनके शब्दों की पहुँच अगली पत्रिका, अगले मंच या अगले सम्मान तक बनी रहे।

मुझे सोशल मीडिया के लेखन से भी शिकायतें सुनने को मिलती हैं—वहाँ बहुत-सा सतही लेखन है, भाषा की कमज़ोरियाँ हैं, जल्दबाज़ी है, आत्मप्रदर्शन है। मानती हूँ, सब कुछ साहित्य नहीं है। लेकिन इसी भीड़ में कुछ ऐसे लोग भी हैं जिनकी भाषा शायद उतनी तराशी हुई नहीं, मगर उनके भीतर सच कहने का साहस अब भी बचा है। वे किसी निर्णायक मंडल की ओर देखकर शब्द नहीं चुनते। वे पुरस्कार की संभावना तौलकर वाक्य नहीं बनाते। उनकी भाषा भले असंपूर्ण हो, पर उनका सच कई बार उन सुघड़ वाक्यों से अधिक जीवित दिखाई देता है, जिन्हें बरसों से साहित्यिक प्रतिष्ठानों की मुहर मिलती रही है।

तब सवाल यह नहीं रह जाता कि किसकी भाषा कितनी उत्कृष्ट है। असली सवाल यह है कि हम साहित्य में भाषा की चमक बचा रहे हैं या सच की आग?
यदि सच बोलना हमें ‘फ़ालतू लेखन’ लगने लगा है, तो गंभीर साहित्य के लिए विषय, संवेदना और प्रतिरोध आएगा कहाँ से? समाज की धूल से बचकर, सत्ता की छाया से निकलकर और अपने सुरक्षित साहित्यिक दायरों में बैठे-बैठे क्या कोई जीवित साहित्य रचा जा सकता है?
क्या साहित्य का काम केवल फूल-पत्तियों के बीच अपनी सौंदर्यबोध की पांडुलिपि सँभालना है? क्या सड़क पर पसरा हुआ भय, मनुष्य की बेचैनी, व्यवस्था की विडंबना और समय की क्रूरता साहित्य के विषय नहीं हैं?
मुझे लगता है, साहित्य की सबसे बड़ी परीक्षा उसकी भाषा में नहीं, उसकी जोखिम उठाने की क्षमता में होती है। जिस शब्द को बोलने से लेखक का कोई लाभ छिन सकता हो, वही शब्द जब फिर भी कागज़ पर उतरता है, तब साहित्य अपनी असली नैतिकता में दिखाई देता है।
बाकी तो सुंदर वाक्य बहुत हैं—
सवाल यह है कि उनमें समय की धड़कन कितनी है और डर की खामोशी कितनी।

रत्ना भदौरिया के फेसबुक वॉल से साभार

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