विश्व-व्यवस्था के स्थायित्व के एक नए आधार की तलाश की कोशिश 

ट्रंप-शी शिखर वार्ता

विश्व-व्यवस्था के स्थायित्व के एक नए आधार की तलाश की कोशिश

अरुण माहेश्वरी

 

राष्ट्रपति ट्रंप की चीन यात्रा और उसके समापन का पूरा दृश्य आज की बदलती हुई विश्व-व्यवस्था के सबसे महत्त्वपूर्ण संकेतों में से एक के रूप में देखा जाना चाहिए। यह केवल दो महाशक्तियों के बीच की एक नियमित शिखर वार्ता नहीं थी। जिस समय अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक युद्ध, तकनीकी प्रतिबंध, सेमीकंडक्टर नियंत्रण, मुद्रा-प्रतिस्पर्धा, इंडो-पैसिफिक रणनीति और ताइवान को लेकर तीव्र तनाव मौजूद है, उसी समय ट्रंप का अमेरिकी कॉरपोरेट जगत की सबसे बड़ी हस्तियों के साथ चीन पहुँचना स्वयं इस बात का संकेत है कि पूँजी, तकनीक और विश्व-बाज़ार की वास्तविक संरचना अब केवल वैचारिक शत्रुता की भाषा में संचालित नहीं हो सकती।

यहाँ सबसे उल्लेखनीय बात यह रही कि पूरी वार्ता में दोनों पक्षों ने अपने-अपने मूलभूत मतभेदों को छिपाने की कोशिश नहीं की। चीन ने ताइवान, ईरान, होर्मुज जलडमरूमध्य और ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर अपनी पुरानी स्थिति को दोहराया। उसने यह भी स्पष्ट कहा कि अमेरिका को “Thucydides Trap” की मानसिकता से बाहर निकलना होगा—अर्थात् यह मानना होगा कि उभरती हुई शक्ति को केवल इसलिए युद्ध या दमन के द्वारा नहीं रोका जा सकता कि वह वर्तमान प्रभुत्वशाली शक्ति के लिए चुनौती बन रही है। यह कथन केवल सामरिक चेतावनी नहीं, बल्कि विश्व-व्यवस्था के पुनर्गठन का दार्शनिक वक्तव्य था।

और उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण यह रहा कि ट्रंप ने इस पूरी प्रक्रिया में ऐसा कोई रुख नहीं अपनाया जिससे लगे कि अमेरिका अब भी चीन को “अधीनस्थ शक्ति” की तरह देखना चाहता है। यह वही अमेरिका है जिसने पिछले वर्षों में चीन को रोकने के लिए क्वाड, एयूकेयूएस(आस्ट्रेलिया, यूनाईटेड किंगडम, यूनाईटेड स्टेट्स), तकनीकी नाकेबंदी, आपूर्ति शृंखला पुनर्गठन और इंडो-पैसिफिक सैन्य संरचना जैसी अनेक व्यवस्थाएँ खड़ी की थीं। लेकिन इस वार्ता का अंत जिस भाषा में हुआ—“प्रतिद्वंद्विता नहीं, भागीदारी”—वह इस बात का संकेत है कि स्वयं अमेरिकी सत्ता-प्रतिष्ठान के भीतर यह बोध गहराने लगा है कि चीन को अलग-थलग करके विश्व-व्यवस्था को स्थिर नहीं रखा जा सकता।

यहीं इस पूरे घटनाक्रम का गहरा मनोविश्लेषणात्मक पक्ष सामने आता है। ऐसा लगता है मानो आज की विश्व-राजनीति स्वयं जुएसॉंस की अतिरेकपूर्ण संरचना से थक चुकी है। निरंतर टकराव, प्रतिबंध, व्यापारिक युद्ध, सैन्य गठबंधनों और शक्ति-प्रदर्शन की राजनीति ने विश्व-अर्थव्यवस्था को एक ऐसे अस्थिर बिंदु पर पहुँचा दिया था जहाँ हर संकट अपने भीतर एक और बड़े संकट की संभावना छिपाए बैठा था।

इस संदर्भ में इस शिखर वार्ता को “जुएसॉंस को इच्छा के स्तर तक सीमित रखने” की विश्व-व्यवस्था की एक कोशिश के रूप में पढ़ा जा सकता है। लकानियन अर्थ में जुएसॉंस वह बिंदु है जहाँ शक्ति अपनी ही अति में स्वयं को नष्ट करने लगती है। इच्छा (desire) सीमाओं को स्वीकारती है; जुएसॉंस सीमाओं को तोड़ती है। यदि विश्व-व्यवस्था को स्थिर रखना है तो शक्ति को फिर से प्रतीकात्मकता—नियमों, संस्थाओं, पारस्परिक मान्यता और सह-अस्तित्व—के अधीन लौटना ही होगा।

इस दृष्टि से ट्रंप-शी वार्ता का सबसे महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष कोई लिखित संयुक्त बयान नहीं, बल्कि वह अनकहा संकेत है कि दोनों पक्ष अब “पूर्ण निर्णायक संघर्ष” की भाषा से थोड़ा पीछे हट रहे हैं। यह स्वयं में एक ऐतिहासिक परिवर्तन है।

और शायद इसी कारण यह वार्ता बहुस्तरीय बहुराष्ट्रीय संस्थाओं की संभावित वापसी का संकेत भी देती है। पिछले एक दशक में संयुक्त राष्ट्र, WTO, WHO जैसी संस्थाओं का गौरव लगातार घटा था क्योंकि विश्व-व्यवस्था एकध्रुवीय शक्ति-प्रदर्शन के अधीन सिमटती जा रही थी। लेकिन यदि अमेरिका स्वयं चीन के साथ सह-अस्तित्व की भाषा बोलने को बाध्य हो रहा है, तो इसका अर्थ है कि अब वैश्विक संरचना को फिर से मध्यस्थ संस्थाओं, बहुपक्षीय व्यवस्थाओं और साझा नियमों की आवश्यकता महसूस हो रही है।

इसी संदर्भ में क्वाड जैसी संस्थाओं का प्रश्न भी नया अर्थ ग्रहण करता है। क्वाड मूलतः उस दौर की उपज था जब अमेरिका एशिया में चीन को घेरने की रणनीति के तहत “लोकतांत्रिक सुरक्षा गठबंधन” की भाषा बना रहा था। पर यदि अमेरिका और चीन स्वयं “प्रतिस्पर्धी साझेदारी” की ओर बढ़ते हैं, तो ऐसी संस्थाओं की केंद्रीयता स्वाभाविक रूप से कम हो जाएगी। वे पूरी तरह समाप्त हों या नहीं, लेकिन उनका मूल वैचारिक औचित्य अवश्य कमजोर पड़ेगा। क्योंकि जिस क्षण प्रमुख शक्ति स्वयं सह-अस्तित्व की अनिवार्यता को स्वीकारने लगे, उस क्षण शीतयुद्धीय ध्रुवीकरण की संरचनाएँ धीरे-धीरे अपना अर्थ खोने लगती हैं।

इसलिए इस शिखर वार्ता पर कोई अंतिम निर्णय देना अभी जल्दबाज़ी होगी। विश्व-राजनीति में बहुत कुछ अभी भी अस्थिर है—ताइवान, पश्चिम एशिया, डॉलर-व्यवस्था, तकनीकी प्रतिस्पर्धा, ऊर्जा-सुरक्षा—सब अपनी जगह मौजूद हैं। फिर भी यह वार्ता एक ऐसी प्रक्रिया का संकेत अवश्य देती है जिसमें विश्व-व्यवस्था शायद पहली बार खुले रूप में यह स्वीकार रही है कि इक्कीसवीं सदी को स्थिर रखने के लिए पूर्ण प्रभुत्व की राजनीति पर्याप्त नहीं होगी।

यदि ऐसा है, तो यह केवल चीन की कूटनीतिक जीत नहीं, बल्कि प्रतीकात्मकता की वापसी की शुरुआत है—एक ऐसी वापसी जिसमें विश्व-राजनीति फिर से यह सीखने की कोशिश कर रही है कि शक्ति का स्थायित्व उसकी असीम जुएसॉंस में नहीं, बल्कि अपनी सीमाओं को स्वीकारने की क्षमता में निहित होता है।

भारत के लिए इस पूरे घटनाक्रम में एक अत्यंत गंभीर सबक छिपा हुआ है। जिस समय दुनिया की सबसे बड़ी शक्तियाँ भी प्रत्यक्ष टकराव की सीमाओं को समझते हुए सह-अस्तित्व और साझेदारी की भाषा की ओर लौटने को बाध्य हो रही हैं, उसी समय भारत अब भी इज़रायल और उसके नए रणनीतिक साझेदार यूएई के साथ अत्यधिक राजनीतिक-सामरिक आसक्ति में फँसा हुआ दिखाई देता है। पाकिस्तान और चीन जैसे अपने सबसे महत्त्वपूर्ण पड़ोसियों के साथ संबंधों को सामान्य बनाने, संवाद को पुनर्जीवित करने और शांति को अवसर देने के बजाय भारत लगातार “घुस कर मारने”, दंडात्मक राष्ट्रवाद और आक्रामक शक्ति-प्रदर्शन की नीति को ही अपनी वैश्विक पहचान बनाने में लगा हुआ है।

लेकिन आज की दुनिया में इस नीति के लिए वैसी स्वीकृति नहीं बची है जैसी पिछले दशक के अमेरिकी-इज़रायली वर्चस्ववादी दौर में दिखाई देती थी। विडंबना यह है कि स्वयं अमेरिका के भीतर, विशेषकर ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’(MAGA) वाले तबके में भी, ईरान युद्ध और अंतहीन वैश्विक तनावों के बाद इस प्रकार की आक्रामक हस्तक्षेपवादी नीति की व्यर्थता का बोध उभरने लगा है। यदि अमेरिका स्वयं अपनी रणनीतिक जुएसॉंस को नियंत्रित करने की आवश्यकता महसूस कर रहा है, तो भारत का उसी पुराने ढर्रे पर और अधिक आक्रामकता के साथ टिके रहना उसे बदलती हुई विश्व-व्यवस्था में धीरे-धीरे अलग-थलग कर सकता है।

इस अलगाव के केवल कूटनीतिक नहीं, गंभीर आर्थिक परिणाम भी हो सकते हैं, जिनके प्रारंभिक संकेत पहले से दिखाई देने लगे हैं—वैश्विक निवेश की अनिश्चितता, क्षेत्रीय व्यापारिक संतुलनों में बदलाव, आपूर्ति शृंखलाओं के पुनर्गठन और पड़ोसी भू-आर्थिक व्यवस्थाओं से दूरी के रूप में। इसलिए भारत के लिए आवश्यक है कि वह शक्ति के दिखावटी आक्रामक तेवरों को ही रणनीतिक परिपक्वता न माने, बल्कि बदलती दुनिया की नई प्रतीकात्मकता को समझे—जहाँ स्थायित्व का आधार निरंतर टकराव नहीं, बल्कि जटिल सह-अस्तित्व, क्षेत्रीय संतुलन और संवाद की क्षमता बनने जा रहा है।

लेखक समालोचक और टिप्पणीकार हैं।

लेखक – अरुण माहेश्वरी

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