लघु कथा
किसी बात पर यक़ीन करने से पहले…
डॉ रीटा अरोड़ा
“दादाजी, देखिए!” अरनव ने मोबाइल स्क्रीन आगे करते हुए कहा, “यह वीडियो कह रहा है कि ऊँट से पता लगाया जा सकता है कि पानी कितना गहरा है।”
दादाजी मुस्कराए, “अच्छा! ऊँट ने खुद बताया?”
अरनव हँस पड़ा, “नहीं दादाजी, वीडियो में लिखा है।”
“तो फिर तुमने मान भी लिया?”
“इतने लोग साझा कर रहे हैं… गलत थोड़ी होगा!”
दादाजी ने पास रखे गिलास से पानी पीते हुए कहा, “बेटा, बहुत लोगों का किसी बात को मान लेना, उस बात के सही होने का प्रमाण नहीं होता।”
“तो हर चीज़ पर शक करें?”
“शक नहीं… सवाल करो। किसने कहा? क्यों कहा? उसका आधार क्या है? और क्या किसी भरोसेमंद जगह से उसकी पुष्टि होती है?”
अरनव कुछ पल चुप रहा, फिर बोला, “मतलब आगे भेजने से पहले जाँच?”
दादाजी ने हँसते हुए कहा, “बिलकुल! वरना आज ऊँट पानी की गहराई बताएगा, कल कोई कह देगा-मोबाइल को धूप में रखने से बैटरी दुगुनी हो जाती है!”
हम ऐसे दौर में जी रहे हैं, जहाँ जानकारी की कमी नहीं, बल्कि सही जानकारी पहचानने की चुनौती है। सुबह आँख खुलने से लेकर रात को सोने तक व्हाट्सऐप, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, फेसबुक और दूसरे माध्यमों पर सैकड़ों संदेश, वीडियो और दावे हमारे सामने आते रहते हैं। इनमें से कुछ ज्ञानवर्धक होते हैं, कुछ मनोरंजक, कुछ आधे-अधूरे सच और कुछ पूरी तरह भ्रामक।
ऐसे में एक बहुत साधारण-सा नियम हमारी बड़ी मदद कर सकता है-
“किसी बात पर यक़ीन करने से पहले यह ज़रूर देखिए कि उसे कह कौन रहा है।”
हम अक्सर संदेश को देखकर प्रभावित हो जाते हैं, लेकिन कहने वाले की विश्वसनीयता देखना भूल जाते हैं। “एक डॉक्टर ने कहा है”, “वैज्ञानिक संस्था ने बताया है”, “सरकार ने आदेश जारी किया है”, “शोध में साबित हुआ है”- ऐसी पंक्तियाँ पढ़ते ही हम बात को सच मान लेते हैं। जबकि कई बार न डॉक्टर का नाम होता है, न शोध का संदर्भ, न सरकारी आदेश की कोई तारीख या प्रमाण।
यहीं पर थोड़ी-सी वैज्ञानिक सोच और सामान्य समझ काम आती है।
कोई स्वास्थ्य संबंधी सलाह है तो देखें- क्या वह किसी मान्य चिकित्सा संस्थान, डॉक्टर या सरकारी स्वास्थ्य संस्था से आई है? कोई सरकारी घोषणा है तो संबंधित विभाग की आधिकारिक वेबसाइट या आधिकारिक खाते पर देखें। कोई आर्थिक या सामाजिक आँकड़ा है तो उसके मूल स्रोत को खोजें। केवल इसलिए किसी दावे को सही नहीं माना जा सकता कि उसके नीचे लिखा है- “सौ प्रतिशत सच, सबको भेजें।”
एक प्रसिद्ध विचार है-
“असाधारण दावों के लिए असाधारण प्रमाण चाहिए।”
अर्थात जितना बड़ा दावा, उतना ही मजबूत प्रमाण चाहिए।
उदाहरण के लिए कोई कहे कि रोज़ सुबह एक विशेष पेय पीने से दस दिन में मधुमेह पूरी तरह ठीक हो जाएगा, तो सिर्फ एक लोकप्रिय वीडियो उस दावे का प्रमाण नहीं हो सकता। इसी तरह यदि कोई पुरानी घटना का वीडियो नई घटना बताकर दिखाया जाए, तो उसकी तारीख, स्थान और मूल स्रोत अवश्य देखना चाहिए।
आज AI से बनी तस्वीरें, नकली वीडियो और बदले हुए दृश्य इस चुनौती को और बढ़ा रहे हैं। अब केवल आँखों से देखकर भी हर बात पर भरोसा करना संभव नहीं रहा। इसलिए “देखा है, इसलिए सच है” वाला तरीका भी पर्याप्त नहीं है।
हमारे बुज़ुर्ग कहा करते थे-
“सुनी-सुनाई बात पर निर्णय मत लो।”
आज की डिजिटल दुनिया में यही बात नए रूप में लागू होती है-
“देखी-सुनी बात को जाँचे बिना आगे मत भेजो।”
यह आदत केवल झूठी खबरों से ही नहीं बचाती, बल्कि हमारे निर्णयों को भी बेहतर बनाती है। किसी व्यक्ति, संस्था या घटना के बारे में एकतरफा संदेश देखकर राय बना लेना आसान है, लेकिन सही सोच यह है कि दूसरा पक्ष भी देखा जाए, संदर्भ समझा जाए और तथ्य जाँचे जाएँ।
कई बार हम वही बात जल्दी मान लेते हैं, जो पहले से हमारी सोच से मेल खाती हो। मनोविज्ञान में इसे पुष्टि-पक्षपात कहा जाता है। यानी हमें जो पहले से सही लगता है, हम उसी के समर्थन वाली बातों को जल्दी स्वीकार कर लेते हैं।
इसलिए कभी-कभी सबसे जरूरी सवाल यही होता है-
“क्या मैं इसे इसलिए सच मान रहा हूँ क्योंकि इसका प्रमाण है, या इसलिए क्योंकि मैं इसे सच मानना चाहता हूँ?”
अंततः समझदारी का अर्थ हर बात पर अविश्वास करना नहीं है। समझदारी का अर्थ है-विश्वास करने से पहले विवेक का इस्तेमाल करना।
फंडा यह है कि आज की दुनिया में समझदार वही नहीं है जिसके पास सबसे ज्यादा जानकारी है, बल्कि वह है जो सही और गलत जानकारी में फर्क करना जानता है। इसलिए अगली बार कोई चौंकाने वाला संदेश मिले तो तुरंत आगे भेजने के बजाय कुछ क्षण रुकिए और तीन सवाल पूछिए- किसने कहा? प्रमाण क्या है? और क्या किसी भरोसेमंद स्रोत से इसकी पुष्टि होती है?
क्योंकि कई बार एक मिनट की जाँच… कई दिनों की गलतफहमी से बचा सकती है।
~
इसे भी पढ़ें…
