जब कानून की आड़ में आवाज़ कैद होने लगे

कानून की छात्रा की नजर से
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जब कानून की आड़ में आवाज़ कैद होने लगे

रत्ना भदौरिया

 

लोकतंत्र ने नागरिक को केवल मतपेटी तक सीमित नहीं किया। संविधान ने उसे असहमति की आवाज़ दी है—सत्य के साथ खड़े होने की, अहिंसा के साथ विरोध करने की और शांतिपूर्ण प्रदर्शन के माध्यम से सत्ता के सामने अपनी बात रखने की।
लोकतंत्र की खूबसूरती ही यही है कि वहाँ सत्ता के सामने सिर झुकाना नागरिकता की शर्त नहीं होती।
फिर यह कैसी विडंबना है कि जिस आवाज़ को संविधान ने अधिकार दिया, उसी आवाज़ के सामने प्रशासनिक निषेध खड़ा कर दिया जाए?
धारा 163 का उद्देश्य उन परिस्थितियों में सार्वजनिक शांति और सुरक्षा की रक्षा करना है जहाँ हिंसा, दंगा या गंभीर अव्यवस्था की आशंका हो। लेकिन जब इसी तरह की कानूनी शक्ति का प्रयोग शांतिपूर्ण प्रदर्शन और नागरिक असहमति को रोकने के लिए किया जाने लगे, तब कानून अपनी सीमा से अधिक एक बड़ा सवाल पैदा करता है।
क्या अब सत्य भी संभावित अशांति है?
क्या अहिंसा भी प्रशासन के लिए आशंका बन चुकी है?
क्या नागरिक की आवाज़ अब शांति भंग करने वाली वस्तु है?
सत्ता के लिए सबसे सुविधाजनक नागरिक वह होता है जो चुप रहे।
न प्रश्न करे, न प्रतिरोध करे, न हिसाब माँगे।
लेकिन लोकतंत्र ने नागरिक को सुविधाजनक बनने के लिए पैदा नहीं किया।
जिस राज्य में जनता के हाथों में हथियार नहीं, केवल तख्तियाँ हों; जिन होंठों पर हिंसा नहीं, केवल असहमति हो; जिन कदमों में अराजकता नहीं, अपने अधिकार की माँग हो—वहाँ यदि सबसे पहले कानून की बाड़ खड़ी कर दी जाए, तो सवाल प्रदर्शनकारियों से पहले सत्ता से पूछा जाना चाहिए।
क्योंकि कानून व्यवस्था और सत्ता की सुविधा एक ही चीज़ नहीं हैं।
कानून यदि हिंसा को रोकता है, तो वह नागरिक की रक्षा करता है।
लेकिन कानून यदि शांतिपूर्ण असहमति को रोकने की ढाल बना दिया जाए, तो वही कानून नागरिक के भीतर एक और प्रश्न जन्म देता है—
आखिर सत्ता को हिंसा से डर है या उस सत्य से, जिसे जनता खुले मैदान में बोलना चाहती है?
तानाशाही हमेशा बंदूक लेकर नहीं आती। कभी-कभी वह कागज़ लेकर आती है—आदेश की भाषा में, प्रतिबंध की भाषा में, सुरक्षा की भाषा में। बाहर से सब कुछ कानूनी दिखाई देता है, लेकिन भीतर नागरिक की आवाज़ के लिए जगह लगातार छोटी होती जाती है।
यही लोकतंत्र की सबसे भयावह विडंबना है—
जब आवाज़ को दबाने के लिए आवाज़ को ही खतरा घोषित कर दिया जाए।
सत्ता को याद रखना चाहिए कि असहमति कोई बीमारी नहीं, जिसे प्रशासनिक आदेश से क्वारंटीन कर दिया जाए। वह लोकतंत्र का वह आईना है जिसमें शासन को अपना चेहरा देखना पड़ता है।
और यदि उस आईने के सामने खड़े होने से सत्ता असहज होती है, तो आईना तोड़ देना समाधान नहीं है।
क्योंकि प्रतिबंध सभा को रोक सकता है, रास्ता रोक सकता है, मंच रोक सकता है—लेकिन नागरिक के भीतर जन्मे सत्य को आदेश देकर चुप नहीं कराया जा सकता।

 

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