बिल्ली कै घंटी कौण बांधै ?
रणबीर सिंह दहिया
भेड़ों की ढालां बेघर लोगों का शहरां के ख़राब तैं ख़राब घरां में बढ़ता जमावड़ा आज के हरयाणा की एक कड़वी सच्चाई सै । सारे सामाजिक नैतिक बन्धनों का तनाव ग्रस्त होना तथा टूटते जाना गहरे संकट की घंटी बजावण सैं । बेर ना हमनै सुनै बी सै अक नहीं ?
माहरे परिवार के पितृ स्तात्मक ढांचे में अधीनता (परतंत्रता ) का तीखा होना साफ साफ देख्या जा सकै सै । जिंघान देखै उँघानै पारिवारिक रिश्ते नाते ढहते जाना । युवाओं के साहमी पढ़ाई लिखाई अर रोजगार की गंभीर चुनौतीयाँ सैं । परिवारों में बुजुर्गों की असुरक्षा का बढ़ते जाना जगहां जगहाँ देखन मैं आवै सै ।
दारू नै रही सही कसर पूरी करदी , घर तो गामां मैं कोई बच नहीं रह्या दारू तैं , मानस एकाध घर मैं बचरया हो तो न्यारी बात सै । ताश खेलण तैं फुरसत नहीं । काम कै हाथ लाकै कोए राज्जी नहीं ।
बैलगाड्डी की जागां बुग्गी नै ले ली अर बुग्गी चलना भी महिला के सिर पै आण पड़या । ऐह्दी पणे की हद होगी । महिलावाँ पै और बालकां पै काम का बोझ बढ़ता जाण लागरया सै | असंगठित क्षेत्र बधग्या अर जन सुविधावां मैं घनी कमी आंती जावै सै |
एक नव धनाढ्य वर्ग पैदा होग्या हरित क्रांति पाच्छै उसकी चांदी होरी सै । उसक निशाना सै पीस्से कमाना कुछ भी करकै \ कठिन जीवन होता जा सै । मजदूर वर्ग को पूर्ण रूपेण ठेकेदारी प्रथा में धकेल्या जाना आम बात की ढा लां देख्या जा सै ।
गरीब लोगों के जीने के आधार कसूते ढा ल सिकुड़ता जान लाग रया सै \गाँव तैं शहर को पलायन का बढ़ना तथा लम्पन तत्वों की बढ़ोतरी होणा चारों कान्ही दीखै सै | शहरां के विकास में अराजकता छागी |
ठेकेदारों और प्रापर्टी डीलरों का बोलबाला होग्या चा रों तरफ । जमीन की उत्पादकता में खडोत , पानी कि समस्या , सेम कि समस्या तैं किसानी का संकट गहरा ग्या । कीट नाशकां के अंधाधुंध इस्तेमाल नै पानी कसूता प्रदूषित कर दिया अर कैंसर जीसी बीमारियां के बधण का खतरा पैदा कर दिया ।
कृषि तैं फालतू उद्योग कि तरफ अर व्यापार की तरफ जयादा ध्यान दिया जावै सै इब । स्थाई हालत से अस्थायी हालातों पर जिन्दा रहने का दौर आग्या दीखै सै । अंध विश्वासों को बढ़ावा दिया जावण लाग रया सै |
हर दो किलोमीटर पर मंदिर का उपजाया जाना अर टी वी पर भरमार सै इसे मैटर की । अन्याय अर असुरक्षा का बढ़ते जाण की साथ साथ कुछ लोगों के प्रिविलिज बढ़ रहे सैं । मारूति से सैंट्रो कार की तरफ रूझान |
आसान काला धन काफी इकठ्ठा किया गया सै । उत्पीडन अपनी सीमायें लांघता जा रया सै |गोहाना काण्ड , मिर्चपुर कांड अर रूचिका कांड ज्वलंत उदाहरण सैं | व्यापार धोखा धडी में बदल लिया दीखै सै ।शोषण उत्पीडन और भ्रष्टाचार की तिग्गी भयंकर रूप धार रही सै ।
भ्रष्ट नेता , भ्रष्ट अफसर और भ्रष्ट पुलिस का गठजोड़ पुख्ता हो लिया सै । प्रतिस्पर्धा ने दुश्मनी का रूप धार लिया । तलवार कि जगह सोने ने ले ली । वेश्यावृति दिनोंदिन बढ़ती जा सै । भ्रम अर अराजकता का माहौल बढ़रया सै | धिगामस्ती बढ़ री सै ।
संस्थानों की स्वायतता पर हमले बढे पाछले कुछ सालों मैं । लोग मुनाफा कमा कर रातों रात करोड़ पति से अरब पति बनने के सपने देख रहे सैं अर किसी भी हद तक अपने आप नै गिराने को तैयार सैं ।
खेती में मशीनीकरण तथा औद्योगिकीकरण मुठ्ठी भर लोगों को मालामाल कर गया तथा लोक जण को गुलामी व दरिद्रता में धकेलता जारया सै । बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का शिकंजा कसता जावण लाग रया सै |
वैश्वीकरण को जरूरी बताया जारया सै जो असमानता पूर्ण विश्व व्यवस्था को मजबूत करता जाण लाग रहया सै । पब्लिक सेक्टर की मुनाफा कमाने वाली कम्पनीयों को भी बेच्या जा रया सै । हमारी आत्म निर्भरता खत्म करने की भरसक नापाक साजिश की जा रही सै । साम्प्रदायिक ताकतें देश के अमन चैन के माहौल को धाराशाई करती जा रही सैं जिनतें हरयाणा भी अछूता कोणी ।
सभी संस्थाओं का जनतांत्रिक माहौल खत्म किया जा रया है । बाहुबल, पैसे , जान पहचान , मुन्नाभाई , ऊपर कि पहुँच वालों के लिए ही नौकरी के थोड़े बहुत अवसर बचे सैं । महिलाओं में अपनी मांगों के हक़ में खडा होने का उभार दिखाई देवै सै |
सबसे ज्यादा वलनेरेबल भी समाज का यही हिस्सा दिखाई देसै मग़र सबसे ज्यादा जनतांत्रिक मुद्दों पर , नागरिक समाज के मुद्दों पर , सभ्य समाज के मुद्दों पर संघर्ष करने कि सम्भावना भी यहीं ज्यादा दिखाई देसै । वर्तमान विकास प्रक्रिया भारी सामाजिक व इंसानी कीमत मानगणे आली सै | इसको संघर्ष के जरिये पल ट्या जाना बहुत जरूरी सै । फेर बिल्ली कै घंटी कौण बांधै ?
