जसवीर त्यागी की पिता केंद्रित कविताएँ

जसवीर त्यागी की पिता केंद्रित कविताएँ

 

पिताजी

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मेरे पिताजी कम बोलते हैं
उन्हें कभी खुलकर हँसते हुए नहीं देखा
अक्सर वे धूप और बारिश में बाहर होते हैं

मैं कई बार मन ही मन सोचता हूँ
पिताजी अकेले ही
धूप और बारिश से लड़ रहे होंगे

घर आने पर वे चुप रहते हैं
और एक ही कुर्सी पर बैठे-बैठे
घण्टों किताब बांचते रहते हैं

उस वक़्त मानो कोई पुजारी हो
बाहर जाते समय
उनका ध्यान बार-बार घड़ी पर ही रहता है
शाम को देखता हूँ उनकी आँखों पर
दिन भर की धूल घर बना बैठी है

मुझसे रोज पूछते हैं
आज पढ़ाई की थी..?
मैं कहता हूँ..जी हाँ

उनका कम बोलना
मुझे बहुत सालता है

फिर एक रोज माँ से पूछा था
पिताजी हँसते क्यों नहीं?
माँ ने बताया-पिताजी ऐसे ही होते हैं
ऐसे ही क्यों..?
यही सब तो मैं जानना चाहता हूँ

यकायक मुझे ख़्याल आया
अपने जन्मदिन पर पिताजी के साथ
चार्ली चैपलिन की फ़िल्म देखूँगा
तब वे ज़रूर हँसेंगे

लेकिन!नहीं
उस दिन भी सामान्य हर रोज की तरह
आख़िरकार एक दिन
मन बांधकर पूछ ही लिया
पिताजी आप हँसते क्यों नहीं?
मेरी बात सुनकर पिताजी हँसे थे
और मेरी पीठ थपथपाकर कहा था

बरखुरदार वक़्त को पहचानना सीखो
मैं देर रात तक
वक़्त को पहचानने का अर्थ खोजता रहा

कुछ हाथ नहीं लगा
उस समय निरा बालक था
बाहर की धूप और बारिश से बेख़बर

जब खुद पिता बना
अब समझ पाया हूँ
पिताजी की चुप्पी का कारण
और वक़्त को पहचानने का अर्थ।

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परवरिश

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मैं एक बुजुर्ग आदमी से मिला
कुछ देर उनके साथ रहा

वो मुझे द्वार तक विदा करने आये
चलते हुए उन्होंने कहा-

आप जैसी सज्जनता के लोग
दुनिया में कैसे गुजर बसर करते होंगे?

उनकी बात सुनकर
मैं कुछ बोल नहीं पाया
मुझे अपने पिता का चेहरा याद आया।

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बच्चा और पिता

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बीमारी से ग्रस्त
बिस्तर पर लेटा बच्चा
दरवाजे के शीशे से
पिता को अपनी ओर झांकते हुए देखता है

लेटे-लेटे
पिता को ‘फ्लाइंग किस’ भेजता है

बच्चे का प्यार
पिता के माथे पर चिपक गया है

एक-दूसरे को निहारते हुए
बच्चा और पिता
एक पेंटिग हो गए हैं

बच्चा पिता
और पिता बच्चा हो गए हैं।

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गुड़ की डली

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पिता को खाना खाने के बाद
गुड़ की डली खाने की आदत थी

यही आदत
मेरे आचरण में भी उतर आयी
खाने के बाद
जब भी गुड़ की डली माँगता हूँ

घर के सदस्य कहते हैं-
तुम बिल्कुल पिताजी पर गये हो

यह सुनकर
मैं कुछ बोल नहीं पाता

मौन होकर
गुड़ में पहले से ज्यादा
मिठास महसूस करता हूँ।

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लालटेन

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पिता एक लालटेन थे
सदा अंधेरा हरते रहे

स्वयं प्रज्वलित हो
जीवन में उजाला भरते रहे

एक दिन लालटेन बुझ गयी
हम चहुँ ओर से अंधकार में घिर गये

हमारी स्मृतियों में
लालटेन की रोशनी कौंधती है।

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मन ही मन कुछ बुदबुदाना

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पिता बनने पर
हम अपने पिता के बारे में सोचते हैं
और एक अपराध-बोध से भर जाते हैं

पिता बनने से पहले
हम पिता के बारे में
कितना कम जानते हैं

पिता एक पहाड़ हैं
हम पहाड़ की सिर्फ कठोरता देखते हैं
उसकी अडिगता
और हर मौसम को
हँसते-हँसते सहने की क्षमता को
अनदेखा करते हैं

कोई पहाड़ एक दिन में निर्मित नहीं होता
न जाने कितने संघर्षों, तप-त्याग से
ठोस और मुकम्मल बनता है

पिता की सच्चाई जानने के बाद
जब हम पिता के लिए कुछ करने का प्रण लेते हैं

तब पिता
पहाड़ से निकलकर आसमान में रहने लगते हैं

और हम हर सुख-दुख में
ऊपर की ओर देखते हुए
मन ही मन कुछ बुदबुदाते हैं।

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कद

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मेरे पिता ऊँचे कद के थे
मैं उनके कद तक
पहुँच नहीं पाया

पिता को
मेरा कद देखकर
मलाल होता था

मुझे फ़ख़्र होता
पिता के ऊँचे कद को देखकर।

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अमर प्रेम

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पिता को गए
बीस बरस से ऊपर हो गए

उनके स्नेह की स्मृति
मेरे साथ-साथ चलती है

पड़ोस में
एक बुज़ुर्ग आदमी के खाँसने का लहज़ा
मेरे पिता के खांसने से मिलता है

देर-सबेर
वह बुज़ुर्ग आदमी जब खाँसता है

उसकी आवाज़ सुनकर
एक अजीब-सी बैचेनी
मेरे सिर पर सवार हो जाती है

उस आदमी की खाँसी
जब बंद रहती है
तसल्ली की एक तरलता
मेरे भीतर नमी की तरह रहती है।
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किसान

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अनाज पक जाने पर
खेत से बैलगाड़ी में घर लाया जाता
अनाज आने की खुशी में
सारा घर चाव की चाशनी में पगा-पगा फिरता

बच्चे भी अनंत उत्साह से
घर ले जाते अनाज
कुछ दाने टोकरी में से उछलकर
कूद पड़ते बीच राह पर

पिताजी एक-एक दाने को
जमीन से उठाकर
अपनी हथेली पर बैठाते

घर का आँगन अनाज से अट जाता
बच्चों को बुरा लगता
पिताजी का जमीन पर बैठकर
एक-एक दाना चुगना

पिताजी किसान थे
जानते थे एक-एक दाने की अहमियत

उन्हें पता था
एक दाने से ही पैदा होते हैं अनेक
अनेक दानों से ही भरता है खेत।

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परवरिश

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मैं एक बुजुर्ग आदमी से मिला
कुछ देर उनके साथ रहा

वो मुझे द्वार तक विदा करने आये
चलते हुए उन्होंने कहा-

आप जैसी सज्जनता के लोग
दुनिया में कैसे गुजर बसर करते होंगे?

उनकी बात सुनकर
मैं कुछ बोल नहीं पाया
मुझे अपने पिता का चेहरा याद आया।

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 रोना

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पिता के संसार से जाने के बाद
वह पहली बार मिला
अपने जिगरी दोस्त से
देखते ही गले मिलकर
फूट-फूटकर रोने लगा

दोस्तों को परस्पर गले लगा देखकर
आँसू भी एक-दूसरे के गले जा लगे

दो दोस्त संसार से विदा हो चुके
अपने-अपने पिताओं की स्मृति में
खड़े-खड़े भीगते रहे देर तक

जबकि दोनों खुद पिता थे
और बच्चों की तरह सुबक-सुबक कर रो रहे थे।

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बच्चा और पिता

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बीमारी से ग्रस्त
बिस्तर पर लेटा बच्चा
दरवाजे के शीशे से
पिता को अपनी ओर झांकते हुए देखता है

लेटे-लेटे
पिता को ‘फ्लाइंग किस’ भेजता है

बच्चे का प्यार
पिता के माथे पर चिपक गया है

एक-दूसरे को निहारते हुए
बच्चा और पिता
एक पेंटिग हो गए हैं

बच्चा पिता
और पिता बच्चा हो गए हैं।

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12 thoughts on “जसवीर त्यागी की पिता केंद्रित कविताएँ”

  1. बहुत ही शानदार कविताएं है गुरुदेव उन कविताओं के द्वारा हमे पिता के मौन प्रेम, संघर्ष और त्याग का बेहद मार्मिक चित्रण दिखाई देता है

  2. सही कहा पिता पहाड़ होते हैं ।बहुत सुंदर कविताएं हैं पिता पर ।जाने के बाद ही पिता का महत्व पता चलता है।

  3. अति सुंदर और भावपूर्ण कविताएँ, बधाई हो सर

  4. जसवीर त्यागी की ये पिता केंद्रित कविताएँ पढ़ते हुए बरसों पहले दुनिया से गए पिता से फिर से मुलाकात होने लगी यही इन कविताओं की रचनात्मकता ताकत लगी मुझे।

    पिता की चुप्पी को भी महसूस कराती ये कविताएं अति संवेदनशीलता की प्रमाण है।‘किसान’ कविता,‘अमर प्रेम’ और ‘रोना’ जैसी इन सभी कविताओं को पढ़ते हुए भावुकता नहीं बल्कि आत्मीय का स्पर्श मन महसूस हुआ। श्रेष्ठ कविताएं।

    अभिनंदन कवि जसवीर त्यागी

  5. पिता पर कम ही लिखा जाता है आपका यह विषय बहुत ही भावपूर्ण है। और कविता अद्भुत…..

  6. हृदय स्पर्शी एवं सुंदर कविताएं सर

  7. पिता के प्रति सच्ची भावपूर्क श्रद्धांजलि अर्पित की गई है।

  8. पिता के प्रति सच्चा भाव प्रकट किया गया है।

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