डॉ रीटा अरोड़ा की लघुकथा – दोस्ती और भरोसा

युवाओं, अब यह स्वतंत्रता की मशाल तुम्हारे हाथों में है। इसे केवल संभालना नहीं, और अधिक उज्ज्वल बनाना है, ताकि आने वाली पीढ़ियां गर्व से कह सकें - “हमारे पूर्वजों ने हमें आज़ादी दी थी, और हमने उस आज़ादी को सम्मान, एकता और कर्म से जीवित रखा।”

लघुकथा

दोस्ती और भरोसा

~डॉ रीटा अरोड़ा

“अमन, अकाउंट का स्टेटमेंट भेज।”
“अरे यार, अभी तो बैठा हूँ। कल भेज दूँगा।”
“कल नहीं। आज चाहिए।”
“इतनी जल्दी क्या है? मुझसे हिसाब माँग रहा है या नोटिस दे रहा है?”
“हिसाब माँग रहा हूँ।”
“वाह! दोस्ती में भी हिसाब-किताब?”
“दोस्ती अपनी जगह है। बिज़नेस अपनी जगह।”
“तू हर बात को इतना सीरियस क्यों बना देता है?”
“क्योंकि पैसा सिर्फ मेरा नहीं है।”
“तो मुझ पर भरोसा नहीं?”
“भरोसा है। इसलिए साथ काम किया।”
“फिर ये पूछताछ क्यों?”
“पूछताछ नहीं। पारदर्शिता।”
अमन कुछ पल चुप रहा।
“एक बात बताऊँ?”
“बोल।”
“पचास हजार मैंने निकाले थे।”
“किसलिए?”
“ज़रूरत थी।”
“बताया क्यों नहीं?”
“सोचा… बाद में बता दूँगा।”
“अगर मैं स्टेटमेंट न माँगता?”
अमन ने कोई जवाब नहीं दिया।
आर्यन ने स्टेटमेंट उसकी ओर बढ़ा दिया।
“इसे देख ले।”
अमन ने कागज़ उठाया, फिर धीरे से वापस मेज़ पर रख दिया।
दोनों कुछ देर चुप बैठे रहे।
बाहर दुकान का शटर आधा खुला था।
आर्यन की नज़र स्टेटमेंट पर थी…
अमन की नज़र दरवाज़े पर।
उस दिन दोनों में से किसी ने भी स्टेटमेंट दोबारा नहीं उठाया।

 

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