सिविल सोसायटी सरकार के खिलाफ़ प्रतिरोध नहीं कर रही अपितु अपने देश को खा रही है

सिविल सोसायटी सरकार के खिलाफ़ प्रतिरोध नहीं कर रही अपितु अपने देश को खा रही है

मंजुल भारद्वाज

 

अमेरिका ने भारत के चार मालवाहक जहाज़ों पर हमला किया होर्मुज की खाड़ी में और कई नाविकों को मार दिया। भारत सरकार की सिट्टी पिट्टी गुम है आख़िर माई डियर डोनल्ड फ्रेंड का मामला है और भक्तों ने तो मान रखा है कि माई डियर डोनल्ड फ्रेंड ने भारतीय अस्मिता और सार्वभौमिकता को अपने पैरों तले रौंदा है तो कुछ सोच कर ही किया होगा !

कल एक टीवी एंकर गला फाड़ कर बोल रहा था कि अरे अमेरिका ने भारतीयों को मार दिया। यह एंकर ऐसे ही गला फाड़ कर चिल्लाता है SIR पर , पेपर लीक पर , मंहगाई पर , पर होता कुछ नहीं क्योंकि मोदी से यह भी सवाल नहीं पूछता!

कल की बहस में फ़ौज के दो अफ़सर बोल रहे थे कि अमेरिका ने वार क्राइम किया है भारत को अंतर्राष्ट्रीय कोर्ट में जाना चाहिए। उन्होंने यह भी साफ़ किया कि भारत सरकार यानी मोदी के बस की बात नहीं है पर जनता कहां है ? सिविल सोसायटी कहां है? उसकी तरफ़ से कोई प्रतिरोध क्यों नहीं हो रहा?

सेवानिवृत्त फौजियों की यह बात ग़ौर करने लायक है। आख़िर उनका धैर्य भी जवाब दे रहा है! पर सही में सिविल सोसायटी कहां है?

सिविल सोसायटी सड़क पर एक दूसरे का खून पी रही है ! रेल में एक दूसरे की जान ले रही है! मंहगाई का गुस्सा सड़क पर सब्ज़ी बेचने वाले पर निकाल रही है। पर यही सिविल सोसायटी शॉपिंग मॉल में चूं चपड़ नहीं करती । ब्रांड के नाम पर बिछ जाती है। एप्पल के स्मार्ट फ़ोन रात रात भर लाइन लगाकर खरीदती है।

सिविल सोसायटी कहां है? भारत में सिविल सोसायटी कभी थी ? आज भारत की सिविल सोसायटी मर गई है आस्था के गटर में डूबकर । आज सिविल सोसायटी नहीं हिपोक्रेट सोसायटी है, अवसरवादी सोसायटी है,पांच किलो अनाज के बदले, 10 हज़ार रुपए के बदले अपना वोट बेचने वाली सोसायटी है, आज अपना ईमान बेचने वाली सोसायटी है, आज जन प्रतिनिधि बिकने के लिए चुने जाते हैं और उनको चुनने वाली सिविल सोसायटी मौन रहती है!

आज सिविल सोसायटी के नौकरशाह, न्यायधीश किसी रेंगते प्राणी की तरह पूंजी और सत्ता के झूठ में लिप्त होकर संविधान,न्याय और सत्य को सूली पर टांग दिया है।

आज सिविल सोसायटी देश को दीमक की तरह चट कर रही है। इतिहास में ऐसा दौर कई बार आया है जब सिविल सोसायटी आत्मघाती हो जाती है। आज भारत में वही दौर है जब सिविल सोसायटी सरकार के खिलाफ़ प्रतिरोध नहीं कर रही अपितु अपने देश को खा रही है।

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