जसवीर त्यागी की पांच कविताएं
रिश्ता
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पार्क आते-जाते
रास्ते में एक घर आता है
जिसमें पीठ झुका
एक बुजुर्ग आदमी
यदा-कदा दिखता है
कभी अख़बार पढ़ता
पौधों को पानी देता
और कभी कुत्तों को रोटी खिलाता
कई बार
मैंने उसे रेहड़ी सब्जी वालों के संग
आत्मीयता से बतियाते हुए भी पाया है
बस इतना परिचय है मेरा उससे
संभव है वह मुझे जानता भी न हो
फिर भी उसका होना
मुझे आर्द्रता और आत्मीयता से भर देता है
बहुत दिनों से
उसे देखा नहीं
पार्क आते-जाते
मेरी आँखें ढूँढती हैं उसे
जैसे अपने घर की
खोयी चाबी खोजता हो कोई।
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सीख
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वह मेरा अपना
मुझे बहुत स्नेह-सम्मान देता
मैं उसके बगैर रह नहीं पाता
वह मेरे बिन रह लेता
वह मेरा संबंध-शिक्षक था
उसने मुझे
धीरे-धीरे
अपनों के बगैर रहना सिखाया।
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रचना
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बहुत दिनों से
कोई कविता नहीं लिखी
एक गरीब बच्चे का
पाठशाला में नाम लिखवाया
एक नया पौधा लगाया
अस्पताल में
रोगियों से मिलकर आया
एक पुरानी पुस्तक पर
जिल्द बंधवाकर लाया
रूठे हुए एक परिजन को मनाया
कुछ इस तरह
मैंने जीवन काव्यमय बनाया।
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|| समय ||
पातहीन पेड़ भी
हरा हो उठता है एक दिन
सूखी नदी में
चमकने लगता है जल
भटके हुए राहगीर को
मिल जाती है मंजिल
सुनसान रास्तों पर
बसने लगती है आबादी धीरे-धीरे
बंजर पड़े खेतों में
मुस्कुराने लगते हैं अंकुर
अंधेरे घर में
जगमगाता है दीया किसी रोज
असंभव और निराशा शब्दों में
छुपे होते हैं संभव और आशा
समय एक जैसा रहता नहीं सदा
करवट बदलता है वह भी
नींद से जागता है एक दिन।
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आगे बढ़ा हुआ हाथ
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कभी-कभी सड़क पार करने से हिचकते हैं हम
खड़े रहते हैं एक ही जगह पर देर तक
मन की उलझन फैलती जाती है
लेकिन!जब कोई
हमारी इस दुविधा को जानकर
बढ़ाता है अपना हाथ हमारी ओर
फिर वही दुर्गम-सा दिखने वाला रास्ता
सरल लगता है
ऐसा नहीं है कि हाथ थामने वाला इंसान
अपनी पीठ पर या गोद में लेकर
रास्ता पार कराता है
वह तो खुद के पैरों पर ही चलकर
तय करते हैं हम
वह तो बस हमारा हाथ थामता है
उसी से हमारा सुप्त हौसला जाग जाता है
हिम्मत की आँख से
हर मंजिल साफ दिखने लगती है
किसी की ओर हाथ बढ़ाना
मनुष्यता की संजीवनी बूटी है
हम वही आगे बढ़ा हुआ हाथ हैं
जो सदा एक-दूसरे के साथ है।
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