डॉ रीटा अरोड़ा की लघु कथा – वक्त का जवाब

युवाओं, अब यह स्वतंत्रता की मशाल तुम्हारे हाथों में है। इसे केवल संभालना नहीं, और अधिक उज्ज्वल बनाना है, ताकि आने वाली पीढ़ियां गर्व से कह सकें - “हमारे पूर्वजों ने हमें आज़ादी दी थी, और हमने उस आज़ादी को सम्मान, एकता और कर्म से जीवित रखा।”

लघु कथा

वक़्त का जवाब

डॉ रीटा अरोड़ा

 

रसोई में शशि सब्ज़ी काट रही थी। राज चुपचाप चाय बना रही थी।
“सुना, बड़ी बहू से फिर झगड़ा हुआ?”
“हाँ।”
“अच्छा हुआ।”
राज ने उसकी ओर देखा।
“क्यों?”
“बहुत बनती थी।”
“वो परेशान है।”
“तो मैं क्या करूँ?”
राज चुप हो गई।
कुछ देर बाद शशि हँसते हुए बोली-
“दूसरों की मुसीबत देखकर दुखी होने की आदत भी अजीब है।”
राज ने बस इतना कहा-
“मुसीबत कभी पूछकर नहीं आती।”
शशि मुस्करा दी।
तभी राज का फोन बजा।
उसने सुना… और चुपचाप फोन रख दिया।
“क्या हुआ?” शशि ने पूछा।
“कुछ नहीं।”
“बताओ भी।”
राज ने उसकी ओर देखा।
“आज तुम्हारे बेटे का फोन था।”
“क्यों?”
“उसकी नौकरी…”
राज आगे कुछ नहीं बोली।
शशि का चेहरा बदल गया।
“क्या कहा उसने?”
राज ने चाय का कप उसकी ओर बढ़ा दिया।
“कुछ बातें फोन पर नहीं कही जातीं।”
शशि ने कप पकड़ लिया।
कुछ क्षण दोनों चुप रहीं।
फिर शशि ने धीरे से पूछा-
“राज… मैंने कभी किसी की परेशानी पर खुशी मनाई थी?”
राज ने कोई जवाब नहीं दिया।
बस चाय की प्याली उसके सामने रख दी।
भाप उठती रही।
और दोनों के बीच कुछ अनकहा… ठहर गया।

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