ब्राह्मण सौंदर्य बोध क्या है? ब्राह्मण सौन्दर्य बोध से मुक्ति से क्या आशय है?

यह लेख मोहन मुक्त का है। वह उत्तराखंड के दलित चिंतक हैं। उनके अपने विचार हैं। उनकी टिप्पणी को बगैर काट-छांट के यहां प्रकाशित किया जा रहा है। उनके विचारों से सहमत, असहमत हुआ जा सकता है। लेकिन इस विचारोत्तेजक टिप्पणी को पढ़ने और उस पर चर्चा करने की जरूरत है। आप अपने विचार दीजिए। हम इसे सहर्ष प्रकाशित करेंगे। यह लेखक के निजी विचार हैं। इससे प्रतिबिम्ब मीडिया की सहमति जरूरी नहीं है। संपादक

ब्राह्मण सौंदर्य बोध क्या है? ब्राह्मण सौन्दर्य बोध से मुक्ति से क्या आशय है?

मोहन मुक्त

 

भाग 4

 

मैं खुश हूँ कि मेरे पुरखों ने गाय और भैंस दोनों को खाया था
मैं खुश हूँ कि मेरे पुरखे आदमखोर नहीं थे

हिमालयदलितहै

पता चला है कि जिस प्रसिद्ध लेखक की वीगनिज्म पर किताब आयी थी ,वो कुछ समय पहले बाबासाहेब को लेकर अनर्गल प्रलाप करता हुआ भी पाया गया, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं होती चाहिए

असल में कुछ अरसा पहले ही शीर्ष जगहों से यह स्पष्ट संकेत दे दिया गया था कि आंबेडकर को निशाने पर लेना है तो सभी दक्षिणपंथी आंबेडकर पर हमलावर हुए हैं… इससे कोई ख़ास फ़र्क तो नहीं पड़ेगा लेकिन आंबेडकर विचार के दुश्मनों को अच्छी तरह से पहचान लेने का एक और मौका आपके सामने तो है ही।

बहरहाल इसे पढ़ें

“मीट की दुकान से साथ बाहर निकलते हुए ग्राहक ने मुझसे कहा,”देखा कैसे खचाक-खचाक मांस काट रहा है,साली क़ौम ही कट्टर है। किसी दिन ये ऐसे ही आदमी भी काट देगा।”

“आप ये मीट खायेंगे ?” मैंने एक नज़र उसके हाथ की मांस वाली थैली पे डालकर पूछा।

“हाँ उसमें क्या है,मीट तो..” वो कुछ सकपकाया।

“तब तो आप किसी दिन इंसान भी खा लोगे।” मैंने कहा।
उसने स्तब्ध होकर मुझे देखा। “ये भी वही है क्या ..!” कहता हुआ निकल गया।…”

Deepak Tiruwa की एक fb पोस्ट है ऊपर…कुछ ही लाइनों में उन्होंने बहुत कुछ कह दिया, ख़ास तौर पर उत्तर भारत के अपर कास्ट मानस की बनावट…’ये भी वही है क्या ‘…

सवाल ये है कि ये मानस ऐसा होता क्यों है क्या इसके कारण राजनीतिक हैं यानि कथित साम्प्रदायिक….

मांस की दुकानों को बंद कराने का अभियान फिर से चर्चा में है तो कुछ पड़ताल पहले कही गई बातों के सहारे

सारी ‘दया करुणा ‘बकरों के लिये और सारी घृणा इंसानों के लिये ज़ाहिर करने वाले इस समाज का संकट किसी ख़ास दौर का संकट नहीं है… मूल समस्या सांस्कृतिक है….. कुछ ख़ास मौकों पर रक्तपिपासु ‘शाकाहारियों’ के मैसेज वायरल होने लगते हैं तो सोचा याद दिला दूं कि ब्राह्मण धर्म संस्कृति के मूल ग्रंथ दर्शन और समस्त परिप्रेक्ष्य का बचाव करते हुए या उसे किसी ना किसी तरह स्थापित करते हुए कथित साप्रदायिकता का निषेध नहीं किया जा सकता….

साम्प्रदायिकता शब्द अपने आप में बहुत आधुनिक है और इसके अर्थ में सकारात्मक से नकारात्मक शिफ्ट पिछले सत्तर अस्सी सालों में हुआ है,1932 मे नये संविधान (1935का भारत शासन अधिनियम ) मे सभी समुदायो के सीमित प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने वाले निर्णय का नाम ‘साम्प्रदायिक अधिनिर्णय’ था… आंबेडकर का बेहद पठनीय लेकिन ज़ाहिर है उपेक्षित पेपर है -“कम्युनल डेडलॉक एंड ए वे टू सॉल्व इट” इस पेपर मे ‘साप्रदायिक’ उस अर्थ मे नकारात्मक नहीं है जिस अर्थ मे ये आज इस्तेमाल हो रहा है…

बाद मे विभाजन के समय या उससे पहले और बाद मे भी हुए दंगों के प्रकाश मे विपिन चंद्र ने साम्प्रदायिकता पर जो कुछ लिखा उससे आधुनिक समस्या के रूप मे ये चिह्नित हुई साथ ही इसमें अंतर्निहित हिंसा की अवधारणा का प्रवेश हुआ

ये कुछ अर्थो मे ज़रूर उपयोगी है लेकिन इससे संगठित धर्मों और भारत मे ख़ासतौर पर ब्राह्मण धर्म की अंतर्निहित सांस्कृतिक हिंसा केवल साम्प्रदायिकता पर ही आरोपित हो जाती है… और ये ग़लती सबसे अधिक प्रगतिशील और मार्क्सवादी कहे गये लेखकों ने की है –

मांसाहार और मुस्लिम विरोधी हिंसा का मसला दिखता साम्प्रदायिक है लेकिन वह सांस्कृतिक है

संस्कृति जो श्रम विरोधी, इंसान विरोधी और ब्राह्मणीय है

चूंकि ये मसला वर्चस्व की संस्कृति का है इसलिये वर्तमान हिंसा…. अभूतपूर्व ब्राह्मणीय सांस्कृतिक वर्चस्व के समय मे अपनी गहरी जड़ें देख पाने का अवसर दे रही है

क्या आपने हिंदी साहित्य की कोई एक कविता या कृति पढ़ी है जिसमें कसाई को हिंसक ख़राब और नकारात्मक न बताया गया हो

जिसमे उसके साथ वस्तुनिष्ठ और मानवीय व्यवहार किया गया हो, उसे हमें अच्छा और सस्ता भोजन मुहैया कराने वाला श्रमिक मानकर उसकी गरिमा को चित्रित किया गया हो

फ़ासिस्ट गुंडे वही करेंगे जो उन्हें करना है वह उनका राजनीतिक लक्ष्य है…

लेकिन आपने कसाई के साथ अब तक क्या किया है आप आगे क्या करेंगे

कसाईयों के साथ साहित्य के द्वारा भाषाई हिंसा करने वाले प्रगतिशील सरोकारी कवि मॉब लिंचिंग को सांप्रदायिक सवाल मानकर विरोध करते है …अगर गहराई से देखें तो कसाईयों के पूरे समुदाय को हिंसक और आपराधिक बताने और मानने का मनोविज्ञान उनकी अपनी कविता से भी तैयार होता है

कोई आश्चर्य नहीं कि किसी अपर कास्ट प्रगतिशील कवि की किसी कविता का गठन इस तरह हो-

“उन कसाइयों ने काट दिया अख़लाक़ और पहलू खान को कसाई की तरह ”

क्या इस कविता का या इस तरह की किसी कविता का सच में कोई मूल्य या अर्थवत्ता संभव है

गहरे सांस्कृतिक सवालों से बचते हुए केवल राजनीतिक साम्प्रदायिकता को लक्ष्य बनाना अपर कास्ट प्रगतिशीलों का पुराना और दोषपूर्ण रवैया है

उन्होंने कसाई के साथ फ़ासिस्टों से कम हिंसा नहीं की है

उनकी हिंसा संस्कृति भाषा और बिंबों की हिंसा है

ज़्यादा दिक्क़त ये है कि वर्चस्व की संस्कृति पर सवार होकर उन्हें लगता है वो प्रगतिशील हैं, मानवीय हैं, वैज्ञानिक हैं

कविता बिम्ब भाषा और साहित्य के द्वारा की गई हिंसा प्रशंसित होती है एंडोर्स की जाती है स्थापित होती है वो एक विरासत की तरह अगली और सुसंस्कृत मानी जाने वाली पीढ़ियों तक पहुंचती है… इसलिये ही दीपक की पोस्ट वाले व्यक्ति के लिये ये कहना एकदम स्वाभाविक है कि ‘कसाई इंसान भी काट देगा’ या ‘ये भी वही है क्या’

सबसे ज़्यादा दिक़्क़त की बात है कि मार्क्सवादी कहे और माने गए विद्रोही कवियों ने भी इस हिंसा को अपने लेखन से समाज मे गहरे पैवस्त किया है …और उन्हें इसका अहसास ही नहीं

सांस्कृतिक वर्चस्व की ख़ासियत यही है वो बहुत सचेत होकर ही समझ मे आता है… लेकिन हिंदी के अधिसंख्य साहित्यकारों और हिंदी / गाय / गोबर पट्टी के बौद्धिकों की समझ मे वो नहीं आता…. कारण हम जानते हैं…

वो कारण यह है कि असल ग़ुलामी राजनीतिक नहीं सांस्कृतिक है…

हिंदी के प्रसिद्ध कवि वीरेन डंगवाल की साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कृति ‘दुश्चक्र में स्रष्टा ‘से ली गई यह कविता देखिएगा…

“विद्वेष

यह बूचड़खाने की नाली है.
इसी से होकर आते हैं नदी के जल में
ख़ून
चरबी, रोयें और लोथड़े.

प्रेम की सुंदरता का निषेध करनेवाले
इसी तट पर आते हैं
हाथ -पैर धोने.”

-वीरेन डंगवाल

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इस कविता को पढ़कर आपके मन में बूचड़खाने /बूचड़ /कसाई का कैसा चित्र बनता है या पहले से बने हुए चित्र पर कैसा रंग चढ़ता है, मेरे विचार में ये वही रंग है जिसका निषेध करने की कोशिश कवि कर रहा है, भाषा की हमेशा हत्या नहीं होती कई बार वो गफ़लत में भी मारी जाती है और ये गफ़लत अपनी सांस्कृतिक जड़ों के कारण प्रगतिशीलों से अक्सर हो जाया करती है….

किसान की दराती और कसाई के चाकू में कोई अंतर नहीं है ..किसान और कसाई दोनों हमें भोजन देने वाले श्रमिक हैं, दोनों की गरिमा समान है यही मानवीय है वैज्ञानिक है ,दिक़्क़त आपकी नज़र में है..

अब वीरेन डंगवाल जैसा समर्थ मार्क्सवादी कवि अपनी भाषा के दोष को नहीं देख पा रहा हो तो एक आधारभूत समस्या खड़ी हो जाती है

हिन्दी जैसी बना दी गई है या किसी भी वर्चस्वशाली भाषा में कोई संवेदनशील बात कहना बहुत मुश्किल है ये बहुत बड़ी समस्या है

बहरहाल वीरेन की इस कविता और बिम्ब चित्रण से पूर्ण असहमति के साथ प्रतिवाद में मेरी यह कविता…..जो कविता संग्रह #हिमालयदलितहै में शामिल है-

प्रेम…..

क्या बात करते हो….वीरेन डंगवाल ….
प्रेम का निषेध करने वाले
हाथ धोने नहीं आते
बूचड़खाने की नाली से बहते पानी में…

वो हफ़्ते के किसी भी दिन
बूचड़ की दुकान पर आते हैं….
उठाते हैं मांस
मुर्गा… बकरा कुछ भी… पैसे नहीं देते…

तुम क्या देखते हो….. वीरेन डंगवाल….
प्रेम का निषेध करने वाले
ना तो बूचड़खाने की नाली देखते हैं…

ना ही देखते हैं बूचड़ का चेहरा
वो देखते हैं
बूचड़ की दुकान खुली तो नहीं है
मंगलवार के दिन…

वो आते हैं
बूचड़ के टपरे टिन के दरवाज़े पर लात मारते हैं
कटे बकरे को देखकर दहाड़ते हैं नफ़रत से

भो.. डी के मुल्ले
बहन.. द कटुवे
यहीं काट देंगे तुझे मादर… द

कसाई के हाथ मे बड़ा सा चाकू
उस वक़्त…
दुनिया की सबसे निरीह बेड़ी
दुनिया का सबसे बेकार औज़ार
काँपने लगता है…

आर्तनाद करता है कसाई का सबसे छोटा बच्चा
कसाई की बीवी दुआ बड़बड़ाती है

माहौल मे भय के साथ तैरता है प्रेम भी
प्रेम भय से ताक़तवर है
हम डरते हैं
क्योंकि हम प्रेम करते हैं

हो सकता है कि ये प्रेम
निषेध करने आये लोगों मे से किसी को कवि बना दे…

सुनो…..वीरेन
मेरी बात से पहले
कसाई के बच्चे का आर्तनाद सुनो
कसाई की बीवी की दुआ सुनो
प्रेम सुनो …वीरेन ….प्रेम
और जान लो कि
प्रेम का निषेध करने वाले
कभी प्रेम का निषेध कर नहीं पायेंगे…

❤️❤️❤️

 

मोहन मुक्त के फेसबुक वॉल से साभार

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