लघु कथा
कल की परछाई
डॉ रीटा अरोड़ा
सुबह की धूप खिड़की से छन रही थी। मेज पर पड़ी पुरानी किताब पर धूल जमी थी। वंदना ने उसे उठाया ही था कि केशी ने पूछा,
“फिर वही किताब?”
वंदना हल्का-सा मुस्कुराई,
“हाँ… कभी इसे पढ़कर लगा था, कुछ बनूँगी।”
“फिर छोड़ क्यों दी?”
“पापा चले गए थे। घर चलाना था। पढ़ाई बाद में करने की सोचती रही… वह ‘बाद में’ कभी आया ही नहीं।”
केशी ने पूछा,
“आज फिर नौकरी का इंटरव्यू था?”
“हाँ। डिग्री पूछी… और बात वहीं खत्म।”
कुछ पल चुप रहकर वंदना बोली,
“कभी-कभी लगता है, उस वक्त कोई और फैसला लेती तो आज सब अलग होता।”
“तुम्हें सच में लगता है, तुम्हारे पास कोई दूसरा रास्ता था?”
वंदना चुप हो गई।
“नहीं,” उसने धीरे से कहा, “शायद नहीं।”
“तो फिर खुद को दोष क्यों देती हो?”
वंदना की आँखें भर आईं।
“क्योंकि घर तो संभाल लिया… अपना सपना नहीं।”
केशी ने उसका हाथ दबाया,
“अब भी कुछ बाकी है?”
“डर बहुत है।”
“डर रहेगा। करना क्या है?”
वंदना ने पुरानी किताब खोली और फोन उठाया।
“ओपन यूनिवर्सिटी का नंबर है?”
केशी मुस्कुराई,
“है।”
वंदना ने नंबर मिलाया।
“जी… मुझे दाखिले की जानकारी चाहिए।”
फोन पर बात करते हुए उसकी आँखें नम थीं।
मेज़ पर किताब खुली थी… और शायद वंदना का कल भी।
