सच की कीमत और शब्दों का सौदा

साहित्य

सच की कीमत और शब्दों का सौदा

रत्ना भदौरिया

 

आज साहित्य के सामने सबसे बड़ा संकट यह नहीं है कि लेखक एआई का प्रयोग कर रहा है। असली संकट यह है कि शब्द किसके लिए लिखे जा रहे हैं और किसके सामने झुक रहे हैं।

किसी लेखक ने अपनी रचना लिखने में एआई की सहायता ली—यह अपने आप में अपराध नहीं। तकनीक कलम का विकल्प हो सकती है, लेकिन अंतरात्मा का नहीं। यदि लेखक अपने विचार, अपना अनुभव और अपनी संवेदना बचाए रखता है, तो मशीन से मिली सहायता उसके लेखन की तकनीकी प्रक्रिया का हिस्सा भर है। इसके विपरीत वह लेखक अधिक चिंताजनक है जो अपनी कलम किसी भाड़े के लेखक के हवाले कर देता है और फिर मंच पर खड़े होकर उस रचना को अपनी आत्मा की आवाज बताता है।

यहाँ प्रश्न प्रतिभा का नहीं, ईमानदारी का है।

एआई से लिखा गया एक सच कभी-कभी उस हस्ताक्षरित झूठ से अधिक मानवीय हो सकता है, जिसे किसी प्रतिष्ठित लेखक ने अपने नाम से प्रकाशित कराया हो। क्योंकि सच की पहचान हमेशा लेखक के हाथ की लिखावट से नहीं होती; वह उसके कथ्य, उसके साहस और उसके नैतिक जोखिम से होती है।

आज साहित्य में एक विचित्र बाजार बन गया है। शब्द लिखे नहीं जाते, तैयार करवाए जाते हैं। पुस्तकें रची नहीं जातीं, पैकेज की जाती हैं। समीक्षाएँ पढ़ी नहीं जातीं, जुटाई जाती हैं। सम्मान अर्जित नहीं किए जाते, उनके रास्ते खोजे जाते हैं। और पुरस्कारों के आसपास धीरे-धीरे ऐसी भाषा विकसित हो रही है जिसमें साहित्य पीछे छूट जाता है और पहचान, पहुँच, संबंध और स्वीकृति आगे आ जाती है।

फिर सवाल उठता है—लेखक बचा कहाँ?

जिस लेखक ने अपनी रचना के लिए किसी और की कलम किराए पर ली, उसने केवल शब्द नहीं किराए पर लिए; उसने अपनी सृजनात्मक जिम्मेदारी भी गिरवी रख दी। और जब वही लेखक पुरस्कार के लिए सत्ता की चौखट तक पहुँचता है, तब मामला और गंभीर हो जाता है। वहाँ साहित्य केवल कमजोर नहीं पड़ता, उसकी रीढ़ पर प्रश्न खड़ा होता है।

सत्ता से संवाद करना अपराध नहीं। सत्ता की आलोचना करना भी साहित्य का अनिवार्य धर्म नहीं कि हर रचना विरोध में ही लिखी जाए। लेकिन जिस क्षण सम्मान पाने की इच्छा लेखक की स्वतंत्र आवाज से बड़ी हो जाती है, उसी क्षण शब्दों का स्वाभिमान संदिग्ध हो जाता है।

जिस सम्मान के लिए लेखक को अपनी असहमति छिपानी पड़े, वह सम्मान लेखक का नहीं, उसकी चुप्पी का पुरस्कार है।

साहित्य का सबसे बड़ा पुरस्कार कोई पदक नहीं, वह क्षण है जब लेखक अपने समय की असुविधाजनक सच्चाई को बिना किसी संरक्षण की अपेक्षा के कह सके। उसके शब्द किसी दरबार की स्वीकृति से प्रमाणित न हों। वे पाठक के भीतर जाकर अपना प्रमाण स्वयं खोजें।

विडंबना यह है कि आज कई बार रचना से पहले लेखक का परिचय पढ़ा जाता है और पुस्तक से पहले उसके संबंधों की चर्चा होती है। कौन-सा सम्मान मिला, किस मंच पर बुलाया गया, किस संस्था ने अभिनंदन किया—ये प्रश्न धीरे-धीरे उस मूल प्रश्न को विस्थापित कर रहे हैं कि उसने लिखा क्या है?

और शायद यही साहित्य का सबसे मौन पतन है।

क्योंकि जब पुरस्कार रचना से बड़ा हो जाए, तो लेखक पुरस्कार का लेखक रह जाता है। जब मंच विचार से बड़ा हो जाए, तो लेखक मंच का सजावटी चेहरा बन जाता है। और जब सत्ता की निकटता शब्द की स्वतंत्रता से अधिक मूल्यवान हो जाए, तब साहित्य धीरे-धीरे अपनी आत्मा से दूरी बनाने लगता है।

इसलिए मुझे एआई से सहायता लेकर सच लिखने वाला लेखक उस लेखक से अधिक ईमानदार दिखाई देता है जो अपनी रचना किसी और से लिखवाकर अपने नाम का झंडा गाड़ता है। कम-से-कम पहला व्यक्ति यह स्वीकार करने का साहस रखता है कि तकनीक उसके काम में शामिल है। दूसरा व्यक्ति तो पाठक से ही अपना पहला परिचय छिपा रहा है।

साहित्य में चोरी केवल किसी की पंक्ति उठा लेना नहीं है।

कभी-कभी अपने नाम से किसी और की चेतना प्रकाशित करना भी चोरी है।

और सत्ता से पुरस्कार माँगना केवल पुरस्कार माँगना नहीं है। यदि उसके बदले लेखक अपनी आलोचनात्मक स्वतंत्रता सौंप देता है, तो वह सम्मान नहीं—अपने शब्दों की कीमत तय कर रहा है।

साहित्य को यह तय करना होगा कि उसे चमकदार लेखक चाहिए या सच्चे लेखक।

क्योंकि समय मंचों की तालियाँ भूल जाता है।

पुरस्कारों की सूची धूल खाती है।

सम्मान के स्मृति-चिह्न टूट जाते हैं।

लेकिन किसी लेखक द्वारा अपने समय के विरुद्ध, अपने भय के बावजूद लिखा गया एक सच्चा वाक्य—कभी-कभी पूरी व्यवस्था से अधिक लंबी उम्र पाता है।

कलम की असली प्रतिष्ठा इस बात में नहीं कि उसे कितने मंच मिले; इस बात में है कि उसने कितनी बार बिकने से इनकार किया।

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