फिल्म समीक्षा
सतलुज : पानी में मिलता खून, घटना में सिमटता इतिहास
जसविंदर सिंह
घटना इतिहास नहीं होता। घटना को समय विशेष की खास परिस्थितियों की कसौटी पर कस कर देखना होता है। समग्रता से घटनाओं को परखने से ही तार्किक और सार्थक नतीजों तक पहुंचा जा सकता है। इसके उलट यदि हादसे को ही इतिहास समझ लिया जाए, तो न सिर्फ भटकाव की सम्भावनाएं बन जाती हैं, बल्कि गलतियों के दोहराव के रास्ते भी खुल जाते हैं। हनी तेहरान द्वारा निर्देशित दिलजीत दोसांज की फिल्म ‘सतलुज’ पर चर्चा भी इसी दृष्टि और समग्रता से होनी चाहिए।
यह फिल्म राज्य नियंत्रित आतंक और दमन का शिकार हुए जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित है। उस दौर मे जब पंजाब आतंकवाद के भीषण दौर से गुजर रहा था, शताब्दियों पुरानी हिन्दू-सिख भाइचारे की साझी संस्कृति को कत्ल किया जा रहा था, तब आतंकवाद से लड़ने के नाम पर निर्दोष नागरिकों को निशाना बनाया जा रहा था। इस स्टेट टेरर के खिलाफ आवाज उठाना कोई आसान बात नहीं थी। उस समय मे उन निर्दोष लोगों की सूची तैयार करना, श्मशान घाटों पर जलाई गयी लाशों के साथ उनका मिलान कर राज्य और पुलिस को कटघरे में खड़ा करना एक जोखिम भरा काम था। जसवंत सिंह खालड़ा ने यह जोखिम उठाया और अपनी जान की बाजी लगाकर इसकी कीमत भी चुकाई। इसलिए उनकी बहादुरी और शहादत के सामने तो सबको सिर झुकाना होगा।
खालड़ा अपने परिवार में प्रतिरोध की तीसरी पीढ़ी थे। उनके दादा सरदार हरनाम सिंह संधू गदर पार्टी के उस 375 सदस्यीय दल में शामिल थे, जो कामागाटा मारू जहाज पर सवार होकर वैनक्यूलर बंदरगाह पहुंचे थे, मगर उस जहाज को बंदरगाह पर अनुमति न मिलने से शंघाई पहुंच गए थे। वे 1915 में लाहौर षड्यंत्र केस में जेल भी गए थे। जसवंत सिंह खालड़ा के पिता करतार सिंह संधू स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हैं, उन्होंने 1942 के असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया था और जेल भी गए थे। जसवंत सिंह खालड़ा ने सत्तर के दशक में प्रदेशव्यापी छात्र आंदोलन में हिस्सा लिया था। छात्रों के लिए बस पास की सुविधा के लिए इस आंदोलन को छात्रों ने जीता था। एक वामपंथी छात्र संगठन ने इस आन्दोलन का नेतृत्व किया था। वे भगत सिंह द्वारा गठित भारत नौजवान सभा में भी सक्रिय रहे थे। इस पृष्ठभूमि में पुलिस स्टेट के दहशत भरे वातावरण में उसका प्रतिरोध की आवाज बनना और राज्य को चुनौती देना स्वाभाविक ही था।
दिलजीत दोसांज ने भी एक गायक और कलाकार होने के साथ-साथ सामाजिक सरोकारों के प्रति अपनी जवाबदेही की अनदेखी नहीं की है। ऐतिहासिक किसान आन्दोलन का उन्होंने न केवल मुखर समर्थन किया था, बल्कि आंदोलन के संचालन में एक करोड़ रुपये सहयोग देकर दूसरे कलाकारों और हस्तियों को भी मदद में आगे आने के लिए प्रेरित किया था। मोदी सरकार की जनविरोधी नीतियों और संघ के विभाजनकारी एजेंडे के वे मुखर विरोधी रहे हैं। इस तरह से वे बेहतर कलाकार के साथ साथ संवेदनशील इंसान और जिम्मेदार नागरिक भी हैं। ‘मैं वापस आऊंगा’ फिल्म में उन्होंने विभाजन के दर्द को जीवंतता के साथ पर्दे पर उतारा है।
‘सतलुज’ फिल्म की विडम्बना यह है कि वह बेहतर निर्देशन में जनता के चहेते कलाकार को लेकर बनाई गई है। संवादों, प्रभावी दृश्यों और अभिनय की दृष्टि से इसे श्रेष्ठ फ़िल्मों में रखा जा सकता है। लेकिन समस्या यह है कि यह किसी काल्पनिक कहानी पर आधारित नहीं है। यह एक विशेष कालखंड में पंजाब में आई विपदा पर फिल्माई गई फिल्म है, और उस कालखंड को समग्रता से बताये बगैर यदि एक घटना को ही कालखंड समझ लिया जाता है, तो यह उस कालखंड से सबक सीखने की बजाय फिर से उन अंधेरी गुफाओं की ओर कदम बढ़ाने की अनचाही कोशिश है, जिससे पंजाब बड़ी कीमत चुका कर बाहर आया है।

उस कालखंड का सबसे कड़वा सच मानवीय रिश्तों, पारिवारिक बंधनों के कच्चे धागों और सामाजिक रिश्तों का कत्ल होना था। क्या यह सच नहीं था कि एक ही परिवार में एक भाई हिन्दू और दूसरा सिख था? एक भाई के सामने दूसरे भाई का कत्ल किया जा रहा था, क्योंकि उसकी पूजा पद्धति अलग थी। यह वही भयानक दौर था, जब रोडवेज की बस में से लोगों को उतार कर, लाइन में खड़ा कर एक ही गोली से मौत के घाट उतारा जा रहा था, क्योंकि वे हिंदू थे। यह वो दौर था, जब साझा संस्कृति को जलाया जा रहा था और साझा चूल्हे को बुझाया जा रहा था। इस साझा संस्कृति पर पहला घाव तब लगा था, जब आजादी के समय फैली नफरत की आग में मुसलमानों को असुरक्षा की आँधियों को पार करते हुए पाकिस्तान जाना पड़ा था या रातों-रात खड़ी कर दी गई सीमा के उस पार रह रहे हिन्दुओं और सिखों को अपना घर बार छोडकर ऐसे ही असुरक्षित और जोखिम भरे हालातों में भारत आना पड़ा था। यह पंजाब का दूसरा दर्द था, जब आजादी की आधी सदी के बाद फिर शताब्दियों से साथ रहे रहे लोगों ने भाइचारे को तार-तार होते देखा था। जब गाँव में रहे रहे हिन्दुओं को अपने घर बार, कारोबार और जमीनें छोडकर या औने-पौने दामों में बेच कर या तो शहर आना पड़ा था या पंजाब के बाहर जाने पर मजबूर होना पड़ा था। आज तक पंजाब के गांवों में कोई हिन्दू नहीं लौट पाया है। सरकार के आंकड़ों के अनुसार ही 3000 निर्दोष हिन्दू आतंकवादियों का शिकार हुए थे। उस कालखंड के इस खौफनाक अध्याय का जिक्र किए बगैर किसी दुर्भाग्यपूर्ण हादसे को इतिहास बना देना भी दुर्भाग्यपूर्ण है और खतरनाक भी। जब फिल्म स्टेट टेरर को बता रही है, तो निर्दोष नागरिकों की सुरक्षा में राज्य की असफलता के लिए भी तो कुछ जगह होना चाहिए थी। इतिहास में अतिशयोक्ति नहीं होती है। खालड़ा कालखंड में सिर्फ पुलिस ज्यादतियां नहीं हुई हैं। दहशतगर्दों के हाथों पांच हजार सिख भी मारे गए थे। जब पुलिस निर्दोष सिख युवकों को आतंकवादी बता कर उनकी हत्याएं कर रही थी, तब आतंकवादी भी सिखों से ही मोटी-मोटी रकमें वसूल रहे थे। स्टेट टेरर की दूसरी असफलता यह थी कि सिख, स्टेट टेरर के साथ आतंकवादियों के दमन, उत्पीड़न और लूट का शिकार हो रहे थे। इतिहास में अतिशयोक्ति नहीं होती है। खालड़ा का कनाडा का वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें वह कह रहे हैं कि 6 हज़ार युवा गायब हैं, और फिल्म कह रही है कि 30 हजार गायब हैं।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि उस पृथकतावादी आंदोलन के पीछे साम्राज्यवादी साज़िशें और पाकिस्तान का हाथ था। यह पाकिस्तान ही था, जो आतंकवादियों को प्रशिक्षण दे रहा था और उन्हें अत्याधुनिक हथियारों से लैस कर रहा था। जाने-अनजाने में इन साजिशों को नजरअंदाज करना पंजाब की उन गौरवशाली साम्राज्यवाद विरोधी विरासत को नजरअंदाज करना है, जिसकी शुरुआत गदरी बाबाओं से शुरु होकर, जलियांवाला बाग से होती हुई भगत सिंह और फिर उधम सिंह से होती हुई आज तक जारी है। जसवंत सिंह खालड़ा के दादा हरनाम सिंह और पिता करतार सिंह भी इस गौरवपूर्ण विरासत का हिस्सा हैं। फिल्म ने उस कालखंड के इस बुनियादी पहलू को ही अनदेखा कर दिया है।
उस अंधेरे और दुखदाई कालखंड का एक सुखद पहलू यह था कि एक धारा सब तरह के दमन से लड़ते हुए भाइचारे की विरासत को बचाने के लिए लड़ रही थी। वामपंथी ताकतों के तीन सौ से ज्यादा कार्यकर्ताओं ने साम्राज्यवाद विरोधी साजिशों को बेनकाब करते हुए, साझा संस्कृति की रक्षा के लिए शहादतें दी थी। आजाद भारत के इतिहास में पाकिस्तानी प्रशिक्षित दहशतगर्दों का मुकाबला करते हुए किसी गैर-सैनिक को सर्वोच्च सैनिक सम्मान भी वामपंथी कार्यकर्ता को उसी पंजाब में, उसी कालखंड में दिया गया था।
इन सारे पहलुओं को अनदेखा कर बनाई गई फिल्म खतरे का संकेत है। सिर्फ फासीवादी ताकतें ही इतिहास को तोड़ मरोड़कर या इतिहास की घटनाओं में से कुछ को पिक एंड चूज कर अपनी स्वार्थपूर्ति करती हैं। आरएसएस भारतीय इतिहास के साथ यही कर रहा है। इस फिल्म के दो खतरे हैं। एक तो हिन्दू-सिख समुदायों के बीच ध्रुवीकरण और बढ़ेगा। अलगाववादी तत्वों को फिर से अपने पांव ज़माने का अवसर मिलेगा और हिन्दू समुदाय का ध्रुवीकरण भाजपा के लिए लाभदायक होगा। मोदी और भाजपा यही तो चाहते हैं कि 40 प्रतिशत हिन्दू आबादी के साथ स्टेट टेरर के शिकार सिखों को कॉंग्रेस या दूसरे दलों से दूर कर अपने नजदीक किया जाए और फिर पंजाब आरएसएस के नियन्त्रण में कर लिया जाए। अनजाने में यह फिल्म हिटलर और उन्ही फासीवादी एलियंस के फैलाव की आशंका को पुख्ता करती है, जिसके बारे मे ‘मैं वापस आऊंगाजेड के 95 वर्षीय ईशर सिंह ग्रेवाल बेहोशी में बड़बड़ाते हैं।
