डॉ. रीटा अरोड़ा की लघुकथा – हर बात का जवाब जरूरी नहीं

युवाओं, अब यह स्वतंत्रता की मशाल तुम्हारे हाथों में है। इसे केवल संभालना नहीं, और अधिक उज्ज्वल बनाना है, ताकि आने वाली पीढ़ियां गर्व से कह सकें - “हमारे पूर्वजों ने हमें आज़ादी दी थी, और हमने उस आज़ादी को सम्मान, एकता और कर्म से जीवित रखा।”

लघुकथा

हर बात का जवाब जरूरी नहीं

डॉ. रीटा अरोड़ा

 

“साक्षी, उसने फिर मुझे बहुत कुछ सुना दिया।”
“तुमने क्या कहा?”
“बहुत कुछ… फिर पूरी रात सोचती रही।”
साक्षी ने पूछा, “क्यों?”
“क्योंकि उसकी बात चुभ गई।”
साक्षी कुछ पल चुप रही, फिर बोली-
“हर चुभने वाली बात का जवाब देना जरूरी है क्या?”
वंदना ने उसकी ओर देखा।
“कुछ लोगों को जवाब नहीं, दूरी चाहिए। कुछ बातों को सफाई नहीं, मौन चाहिए। और कुछ परेशानियाँ…”
“कुछ परेशानियाँ?”
“उन्हें हमारी प्रतिक्रिया चाहिए होती है। हम देते रहते हैं… और वे बढ़ती रहती हैं।”
वंदना धीरे से बोली, “तो क्या हर बात अनदेखी कर दूँ?”
“नहीं। जो जरूरी है, उसे संभालो। जो तुम्हारी शांति छीनता है, उसे छोड़ना सीखो।”
वंदना चुप हो गई।
साक्षी ने मुस्कुराकर कहा-
“हर लड़ाई जीतना जरूरी नहीं… कुछ लड़ाइयों से बाहर निकल जाना ही अपनी जीत होती है।”
वंदना ने फोन उठाया और एक तरफ रख दिया।
कुछ जवाब उसने आज भी नहीं दिए।
बस अपनी शांति चुन ली।

~ डॉ. रीटा अरोड़ा, सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, करनाल।

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