परमानंद श्रीवास्तव के के आलोचकीय अवदान पर दिनांक 19-20 सितंबर 26 को राजकीय बौद्ध संग्रहालय गोरखपुर राष्ट्रीय गोष्ठी का आयोजन किया जा रहा हैं. इस अवसर पर उनपर लिखा संस्मरण प्रस्तुत हैं.
मेरे काव्य शिक्षक : परमानन्द श्रीवास्तव
स्वप्निल श्रीवास्तव
परमानंद श्रीवास्तव को मैं सेंट एंड्र्यूज कालेज के दिनों से जानता था । मैं उन दिनों बी ए का छात्र था और वे हिंदी विभाग के अध्यक्ष थे । छोटा कद , क्लीन सेव ,सफेद रंग का कुर्ता पैजामा और पांव में चप्पल । वे दिखने में बहुत विनम्र लगते थे । उनके बारे में प्रचलित था कि हिंदी के बहुत बड़े विद्वान है . लेकिन उनके कद – काठी से ऐसा नही लगता था । वे हमे बिहारी और जायसी पढ़ाते थे । ये दोनो कवि हम लोगों के लिये अबूझ थे , लेकिन उनकी व्याख्या के बाद सरल दिखने लगे थे । इन कवियों को पढ़ाने के बाद वे प्राकांतर से कुछ नई चीजे बताते थे , जिससे हमारे विचारों के क्षितिज खुलते थे । उनसे हम लोगो ने अज्ञेय के बारे में जाना – जो हिंदी कविता के बड़े व्यक्तित्व थे । उनके तार – सप्तक की धूम थी । वे सप्त ऋषि थे । वह अकविता और नई कविता का दौर था । हम कविताओं को पढ़ जरूर लेते थे , लेकिन उनका समझना मुश्किल था । कविताओं की व्याख्या भी कविताओं की तरह अमूर्त होती थी । उन्ही दिनो कालेज की लायव्रेरी में कल्पना . लहर ,ज्ञानोदय जैसी पत्रिकायें आती थी – जिसमें परमानंद की समीक्षायें और कवितायें पढ़ने को मिल जाती थी । उन्हें पढ के उनकी विद्वता के संदेह दूर हो जाते थे ।
परमानंद श्रीवास्तव के पढ़ाने की शैली अलग थी । उनकी भाषा अन्य अध्यापकों की भाषा से आधुनिक थी । जायसी को वे बहुत मनोयोग से पढ़ाते थे । वे बताते थे कि विजयदेवनारायण शाही ने जायसी पर अत्यंत महत्वपूर्ण लिखा है । बिहारी की भाषा और व्यंजना उन्हें प्रिय थी । हम छात्रों उन्हें देख कर बिहारी का वह दोहा याद आता था – सतसैया के दोहरे ज्यों नावक के तीर / देखन में छोटे लगे बेधे सकल शरीर । यह दोहा उन पर सटीक बैठता था । बाद में यह दोहा उनके जीवन के साथ जुड़ गया । इस दोहे का इस्तेमाल वे अपने बचाव में करते थे । कक्षा के अनेक छात्रों को उनकी भाषा नही समझ में आती थी । उनकी भाषा परम्परागत नही थी । थोड़ी बौद्धिक जरूर थी । जिन छात्रों की रूचि साहित्य में थी – उनके लिये उनकी भाषा कठिन नही थी । मैंने उनसे बहुत कुछ सीखने का मौका मिला । वे हमे कविताओं का अर्थ लिखने के लिये देते थे । मैंने उन्हें लिख कर दिखाया तो बोले – अब इस तरह के अलंकारिक भाषा का चलन नही है । बस तुम सीधी – सादी भाषा में अपनी बात कहो । यह मेरे लिये सूत्र वाक्य की तरह था और अब तक मैं इस लीक पर चल रहा हूं ।
कालेज में मेरे निकट सम्वंधी भौतिकी विभाग में लेक्चरर थे । पिता ने उन्हें मेरा दायित्व सौप रखा था । उन्होनें परमानंद जी से अपने सम्वंधों के बारे में बताया था । इस नाते भी वे मेरे प्रति स्नेहिल थे । जब उनके पिता की मृत्यु हुई तो साल भर उन्होने वस्त्र नही पहने , बस आधा शरीर वे किसी तरह ढ़कते थे । वे इस परिधान में गांधी की तरह लगते थे । चप्पल की जगह वह खड़ाऊं पहनते थे । उनके खड़ाऊ की आवाज दूर से सुनाई पढ़ती थी । वे सख्त स्वभाव के थे । छात्र उनसे डरते थे । एक दिन परमानंद जी ने उनके हुलिये के बारे में पूंछा तो मैंने बताया कि वे पुराने रीति – रिवाजों में यकीन करते है । उनके पूंछने का तात्पर्य यह था कि एक आदमी विज्ञान पढ़ाता है और वह अपनी निजी जिंदगी में इतना दकियानूस क्यों है ? कुछ लोग खुद आने विलोम होते हैं । अपने विश्वाश की रक्षा अपनी तरह करते हैं ।
एक दिन की बात है वे बिहारी पढ़ा रहे थे । पढ़ाने के बाद वे नोट लिखाते थे । उन्होनें लिखाया कि बिहारी की भाषा बहुत चुस्त है । इस बात पर मेरे अगली बेंच पर बैठा हुआ लड़का हंस पड़ा । उन्होनें कारण पूंछा तो उसने बताया कि सर आजकल हमारी पैटें चुस्त रहती है और अब भाषा भी चुस्त होने लगी । अन्य कोई होता तो इस मजाक पर हंसता लेकिन वे गम्भीर हो गये और क्लास से चले गये । हम लोगों ने उसकी तरफ से माफी मांगी , बाद में उस लड़के ने अपनी गल्ती कुबूल की – लेकिन वे सहज नही हुये । जितने दिन वे रहे , वे क्लास लेने जरूर आते थे लेकिन वे पूर्व भाव में नही लौट सके । मेरा ख्याल था कि वे किसी मानसिक उद्वेग में फंसे हुये थे । कुछ दिनों बाद वे सेन्ट एंड्रूयूज छोड़ कर विश्व विद्यालय चले गये । हिंदी विभाग में शरत चंद्र अग्रवाल आये । उनके पीछे अनंत मिश्र भी आये । वे माथे पर चंदन लगाते थे । उन दिनों वे मानसिक रूप से परेशान थे । यह उनके व्यवहार से दिखता था । मेरा ख्याल है कि मुझे उनका सानिध्य साल भर ही मिला होगा । उनका जाना हम जैसे कई छात्रों के लिये उदास करनेवाला था ।
डॉ अग्रवाल मेरे प्रति अनुराग रखते थे । एक दिन उन्होनें मुझे अपने आवास पर बुलाया । मैं उलझन में था । बुलाने के पीछे का कारण ढ़ूंढ़ रहा था । कहीं मुझसे कोई गल्ती तो नही हुई । उन्होनें मुझे चाय पिलाई और कहा कि कालेज की पत्रिका के हिंदी सवर्ग का सम्पादन तु म करोगे । यह खबर सुन कर मैं भीतर से उछल गया और सर को धन्यवाद दिया । अंग्रेजी सेक्सन का सम्पादन अंग्रेजी विभाग की सहपाठी आशा श्रीवास्तव के जिम्मे था । मेरे सहपाठी महेंद्र प्रताप सिंह थे । वे खूब पढ़ते थे । बाद में वे मेरी तरह विश्व विद्यालय के छात्र हुये । वे बहुत अच्छे छात्र नेता थे । लेकिन जिस तरह की छात्र राजनीति चल रही थी . उसमें वे फिट नही बैठते थे । कालेज के प्रधानाचार्य मिं चाको थे । उन्हे हिंदी बिल्कुल नही आती थी । कुछ दुष्ट छात्र उन्हे उनके सामने उन्हें भद्दी – भद्दी गालियां बकते थे . उन्हें लगता कि वे उनकी तारीफ कर रहे है । उल्टे वे हंसने लगते थे ।
अंग्रेजी विभाग में नाफीज साहब को कौन भूल सकता है । वे अध्यापक नही जादूगर थे । वे डूंब कर पढ़ाते थे । उनकी घंटी जल्दी बीत जाती थी । वे केवल अंग्रेजी साहित्य के बारे में नही दुनियां – जहान की बाते बताते थे ।
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जब मैंने विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग में दाखिला लिया तो उनसे परिचय की जरूरत नही थी । मेरे हिंदी विभाग के दाखिले से मुझे ही नही उन्हें भी खुशी हुई । मैंने यह पूंछने का साहस नही किया कि वे आखिर क्यों कालेज से चले आये । विश्वविद्यालय कालेज से बड़ी जगह तो थी ही । गोरखपुर का हिंदी विभाग काफी समृद्ध था । रामचंद्र तिवारी , गिरीश रस्तोगी , रामदेव शुक्ल , विश्वनाथ प्रसाद तिवारी कृष्ण्चंद्र लाल जैसे लोग थे । जिनके भीतर गहरी रचनात्मकता थी । वे साहित्य में भी जाने जाते थे । परमानंद श्रीवास्तव इन लोगो में सर्वोपरि थे । उनकी किताब – नई कविता के परिपेक्ष्य में और कविता संकलन – उजली हंसी के छोर पर – प्रकाशित हो चुकी थी ।बताया जाता है कि यह शीर्षक अज्ञेय के किसी कविता पंक्ति के नाम पर रखा गया था । पत्र पत्रिकाओं में उनके लेख और कवितायें छप रही थी । वे सेमीनारों और सम्मेलनों में बुलाये जाते थे । वहां से लौट कर वृतांत बताते थे । हिंदी के कवियों – कथाकारों से उनका परिचय था । उनके विभाग में आने के बाद साहित्यिक गतिविधियां बढ़ रही थी । हिंदी विभाग में उन्होने हिंदी साहित्य परिषद नाम की संस्था गठित की थी – जिसके छाते तले कार्यक्रम होते रहते थे । हर साल कविता ,कहा,नी , निवंध प्रतियोगिता आयोजित की जाती थी । पुरस्कार वितरण के लिये किसी बड़े साहित्यकार को बुलाया जाता था । मुझे याद है ऐसे अवसर पर यशपाल का आगमन हुआ था । संयोग से मैं तीनों प्रतियोगिताओं में प्रथम था । जब पहले दूसरे और फिर तीसरे पुरस्कार के लिये मेरा नाम सामने आया तो उन्होनें मेरी पीठ ठोकते हुये कहा – तुम एक दिन अच्छे कवि बनोगे । अच्छे कवि बनने का गौरव तो मेरे पास नही है लेकिन हिंदी कविता में मेरा विनम्र योगदान तो है ही । यह बात मेरे रकीब भी मानते हैं । कहने की जरूरत नही है कि मेरे बनावट में परमानंद ऐसे कई लोगो की भूमिका है ।
इन प्रतियोगिताओं के इतर कई तरह के अयोजन होते थे , इसमे हिंदी विभाग के आचार्य गण शामिल होते थे । मुझे याद है कि काशीनाथ सिंह के उपन्यास – नया मोर्चा पर परिसम्वाद आयोजित किया गया था । यह उपन्यास बनारस के छात्र आदोलन पर आधारित था । इसे परमानंद श्रीवास्तव ने नया उपन्यास कहा था । इस तरह के अनेक आयोजन होते थे और इन सब गतिविधियों के सूत्रधार परमानंद श्रीवास्तव थे । गिरीश रस्तोगी की नाट्य संस्था – रूपान्तर से भी वे जुड़े हुये थे । वे बहुत अच्छे वक्ता थे । वे नपा –तुला बोलते थे । उनकी आवाज तीखी और पेनीट्रेटिंग थी । उनके पास टकसाली भाषा थी । ज्ञान तो था ही । उन्हें बोलने के लिये कोई तैयारी नही करनी पड़ती थी ।
उन्हीं दिनों मेरी दोस्ती अपनी सहपाठी सुमन से शुरू हुई थी । इस लड़की ने मेरा जीवन बदल दिया था । मां की मृत्यु के बाद जीवन में जो सूनापन पैदा हुआ था , उसको वह भरने की कोशिश कर रही थी । साहित्य में उसकी गहरी अभिरूचि थी । साहित्य – परिषद की गोष्ठियों में वह मेरे साथ कविता पाठ करती थी । हम साथ – साथ आते जाते थे । कभी क्लास बंक कर विश्वविद्यालय के सामने गोल्फ के लिये बने हुये हरे मैदान में घूमते और यूकेलिप्टस के चिकने तनों पर एक दूसरे का नाम लिखते थे । इस मैदान को देख कर थकान दूर हो जाती थी । जब याद आता था कि अब क्लास शुरू हो गया होगा तो हड़बड़ी के साथ लौटते थे । भरी हुई क्लास में हम दोनो के आने को जिज्ञासा के साथ देखा जाता था । परमानंद जी हमे सुरूचि और अनुराग के साथ देखते थे । हमारे भीतर यह सपना चुपके – चुपके पल रहा था कि कितना अच्छा हो हम दोनो किसी कालेज में पद्स्थ हो जाय तो यह जिंदगी धन्य हो जाय । हम दोनो अलग – अलग और कभी एक दूसरे के साथ परमानंद श्रीवास्तव के घर जाते थे । उन्हें हमारे सपनों की जानकारी थी । सुमन उनके ज्यादा निकट थी । उसने पारिवारिक रिश्ता बना लिया था । वह हमारे पारिवारिक परिस्थितियों के बारे में उन्हे बताती रहती थी । वे उसे आश्वासन देते रहते थे कि तुम लोगों की नियुक्ति कहीं न कहीं हो जायेगी । सुमन से उनका रिश्ता प्रगाढ़ तब हो गया – जब उसने उन्हें राखी बांधना शुरू कर दिया था । वह उसे उपहार में कोई न कोई किताब भेट करते थे – जो उसके बाद मेरी अपनी हो जाती थी । मैं आश्वस्त था कि हम दोनों में किसी एक की नियुक्ति हो जाय तो भी जिंदगी चल निकलेगी । मैंनें तीन जगहों में इंटरव्यू दिया , संयोग से स्पर्ट परमानंद श्रीवास्तव थे लेकिन किसी जगह मेरा चुनाव नही हुआ | जीवन में बहुत सी घटनाएं संयोग से घटित होती हैं |
सुमन एम. ए . के बाद मोहन राकेश पर शोध करने लगी । मोहन राकेश मेरे प्रिय लेखक थे । मैंनें रूपांतर में उनके नाटक – आषाढ का एक दिन . लहरों का राजहंस, आधे – अधूरे देख कर उनका दीवान हो चुका था । इसके अलावा मुझे उनका उपन्यास , न आनेवाला कल , अंधेरे बंद कमरे तथा कहा.नियां बहुत पसंद थी । मैं उन पर शोध करना चाहता था , लेकिन पिता नें मुझे अफसर बनाने तथा सुमन से दूर रहने के लिये इलाहाबाद का बनवास दे दिया था । जब भी मैं गोरखपुर आता सब से पहले उनसे मिलने उनके आवास सूरजकुंड चला जाता था । वहां मुझे साहित्य की नई जानकारी मिलती थी ।
शुरू में वे गोलघर गांधी आश्रम के पास वाली गली में रहते थे । वहां उनसे मिलना सुविधाजनक था । बाद में वे सूरजकुंड के आवास विकास कालोनी में चले गये – जो शहर के दूसरे छोर पर था । शाम होते रिक्शेवाले मना कर देते थे । वहां सवांरियों के लुटने का खतरा था । अब उस कालोनी का विस्तार हो चुका है । वह शहर के मशहूर कालोनियों में शुमार हो चुका है । जो उनके मुरीद थे , वे उतनी दूर जाने का दुख उठा लेते थे । मेरी नौकरी लग चुकी थी । कवितायें पत्र – पत्रिकाओं में छप रही थी । चूंकि मेरे तमाम रिश्तेदार गोरखपुर में थे । बहन की शादी वहीं हुई थी , इसलिये वहां किसी न किसी बहाने जाता था । क्या कोई उस शहर को भूल सकता है – जिसने जीवन जीना सिखाया । जहां अच्छे ही नही बुरे अनुभव भी मिले । बुरे अनुभव जिंदगी के लिये ज्यादा मूल्यवान थे । उनसे बहुत सीख मिलती है । उस वक्त तक परमानंद श्रीवास्तव कीर्तिवान हो चुके थे । वे साहित्य में गोरखपुर के पर्याय बन चुके थे । उनके लिखने का सिलसिला जोर पकड़ चुका था । प्राय; मुख्य पत्रिकाओं में उनका लिखा मिल जाता था । लेखन के मामले में वे पूर्णकालिक थे । घर के राशन – पानी और अन्य पारिवारिक गतिविधियों से उनका कोई सरोकार नही था । यह भूमिका पत्नी निभाती थी । वे साहित्य के अलावा कोई बात नही करते थे । उन्हें सेमिनारों और गोष्ठियों से फुर्सत नही मिलती थी । एक कार्यक्रम से लौटे तो दूसरे की तैयारी करने लगते थे । जब मैं आता तो कविता सुनाने के लिये कहते । मैं उसके लिये तैयार हो कर नही आता था । एक बार की बात है , वह कुछ साहित्यिक लोगो के साथ बैठे हुये और कविता सुनाने के लिये कहा , मैंनें वही पुराना वाक्य दोहरा दिया कि मेरे पास डायरी नही है । फिर बोले मैं उन पत्रिकाओं को निकाल कर लाता हूं । अब मेरे पास बचाव का कोई रास्ता नही था । कवि को अपनी कवितायें याद रहनी चाहिये , लेकिन हिंदी में अनेक कवि हैं जिन्हें अपनी कवितायें याद नही है । हम सब कवि इस कमजोरी के शिकार है । समाज ही ऐसा है , जिसमें कविताओं के लिये जगह नही बची है , इसलिये कोई उत्साह नही बनता । मैं जब भी जाता , वह अपनी नई कवितायें जरूर सुनाते । मुझे उनकी कवितायें सुन कर अच्छा लगता था ।
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हिंदी कविता में आठवे दशक का समय अत्यंत महत्वपूर्ण था । खासकर कविता की दुनियां का वह प्रस्थान बिंदु था । हम लोगो ने उसी समय से लिखना शुरू किया था ।हालांकि काव्याभ्याश बहुत पहले से चल रहा था लेकिन गम्भीरता इसी काल –खंड में आयी थी । संयोग से नागार्जुन , त्रिलोचन . केदारनाथ सिंह और युवा कवियों में राजेश जोशी ,उदयप्रकाश का सान्निध्य मिला ।उस समय दिल्ली का चेहरा इतना बदरंग नही था । लोग दिल से मिलते थे । आज की तरह कंधे छूकर भागते नही है । शायद जीवन पहले जैसा सरल और सुखदायी नही रह गया है । हम सब एक अंधी दौड़ में शामिल हो चुके है । साहित्य का दामन हम से छूट गया है । साहित्य प्राथमिक नही है . उसकी जगह महत्वाकांक्षायें और अमर होने की कामना प्रमुख हो चुकी है ।
आठवे दशक का उत्तरार्ध परमानंद श्रीवास्तव के साहित्यिक जीवन का नया समय था । उसी समय उनकी कविता की किताब – अगली शताब्दी के बारे में और आलोचना पुस्तक – समकालीन कविता का व्याकरण ,प्रकाशित हुई थी । हिंदी कविता प्रयोगवाद , नई कविता के मुहावरों निकल कर समकालीन हो रही थी । अकविता और नई कविता के दौर के कवि अपने मुहावरे बदल कर समकालीन हो रहे थे । मेरे एक आलोचक मित्र ने मुझे एक रूपक के सहारे बताया कि अब कवि अपने सींघ मुड़ा कर नये बछड़ों में शामिल हो रहे हैं । कुछ भी कहा जाय , यह कविता का ऐतिहासिक समय था । परमानंद श्रीवास्तव के यहां वैचारिकता का कोई आग्रह नही था । उनके लिखने का कैनवास व्यापक था । 1986 में मैं गोरखपुर आ चुका था । उन्होने कहा – अब यहां प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना होनी चाहिये । गोया सेंट ऐंड्रूयूज कालेज के एक कमरे में प्रलेस की स्थापना का बिगुल बजाया गया । उस सभा में गोरखपुर के कुछ लेखक और पत्रकार थे । उसके कुछ समय बाद प्रलेस के तत्वाधान में फिराक पर महत्वाकांक्षी सेमिनार का आयोजन किया गया । उस आयोजन के मुख्य अतिथि डा. नामवर सिंह थे । वे हवाई जहाज से गोरखपुर के हवाई अड्डे पर उतरे थे । खुद परमानंद जी उन्हे लेने गये थे । नामवर सिंह का जहाज से आना चर्चा का विषय था । कुछ लोग इस प्रगतिशीलता की आलोचना कर रहे थे । नामवर सिंह आलोचना पुरूष थे । उनकी आवाज अलग थी । वे जो कुछ भी कहते थे , वह रातो रात वाइरल हो जाता था । सभा का महत्व अलग से बढ़ जाता था । वे आलोचना के बट वृक्ष बन चुके थे । नामवर सिंह की प्रतिभा का लोहा उनके विरोधी भी मानते थे । आलोचना नाम की पत्रिका उनके सम्पादन में निकल रही थी । उसकी भूमिका को कौन नकार सकता है ?
परमानंद श्रीवास्तव के जीवन की सबसे बड़ी घटना आलोचना का सह – सम्पादक होना था । उन्हें एक मंच मिल चुका था । आलोचना के लिये वे लेखको – कवियों से सामग्री मंगवाते थे । फिर नामवर सिंह के दिशा – निर्देश से उसे व्यवस्थित करते थे । इसमें कोई संदेह नही उन्होनें आलोचना को नया रूप दिया । आलोचना पत्रिका से जुड़ना उनके लिये छंलाग से कम नही था । आलोचना में गोरखपुर के लोगो को जगह नही मिलती थी । उनके विरोधी क्या उनके चाहनेवाले इस बात से कम व्यथित नही थे । उनके कुछ प्रिय लोग थे जिन्हें वे जगह देते थे । इस कारण वह नगर में अप्रिय हो गये थे । वे निरंतर लिख रहे थे । कवि कर्म और काव्य भाषा . जैनेद्र के उपन्यास जैसी किताबे पहले ही प्रकाशित हो चुकी थी । इसके अलावा समकालीन कविता पर दो महत्वपूर्ण आलोचना पुस्तकें – समकालीन कविता का यथार्थ और कविता का अर्थात् प्रकाशित हो चुकी थी । समकालीन कविता को समझने के लिये ये आवश्यक किताबें हैं । इसमे तनिक संदेह नही होना चाहिये कि उन्होनें हिंदी कविता पर जरूरी काम किया है । वे अकेले ऐसे आलोचक है जिन्होनें आठवे दशक के बाद की कविता की सम्यक विवेचना की है । नये युवा कवियों को रेखांकित किया है । युवा कवियित्रियों के प्रति उनकी उदारता जरूर अधिक थी । पं बंगाल और झारखंड के कुछ कवियित्रियों / लेखिकाओं को उन्होनें प्रकाश में लाया है । छोटे कद के परमानंद श्रीवास्तव ने हिंदी आलोचना में बड़े काम किये है । आदमी अपने कद से नही पद से पहचाना जाता है । यह ओहदा आसानी से नही हासिल होता है , उसे श्रम और प्रतिभा से अर्जित किया जाता है । किसी का मजाक उड़ाना एक खेल है । यह कौतुक अक्सर नराधम किस्म के लोग करते रहते है । कहा जाता है कि जहां बुद्धिमान लोग पांव रखते डरते हैं , वहां मूर्ख सरपट दौड़ते है ।
परमानंद श्रीवास्तव के कवि रूप की बहुत कम चर्चा हुई है । अगली शताब्दी के बारे में , चौथा शब्द , एक अनायक का वृतांत उनके कविता संग्रह हैं । गुरू –प्रवर डां कृष्णचन्द्र लाल की पत्रिका सहचर में उनके संग्रह – चौथा शब्द की समीक्षा , कठिन समय में शब्द शीर्षक से मैंनें की थी – जो उन्हें बहुत पसंद आयी । उन पर केंद्रित पत्रिका के अंक को जब पुस्ताकाकार शक्ल में छापा गया तो यहीं शीर्षक लगा था । कई विधाओं में एक साथ लिखनेवाले लेखकों की यही ट्रेजिडी है कि उनका कोई न कोई पक्ष मूल्यांकन से छूट जाता है । परमानंद जी ने कुछ बेहतर कवितायें लिखी है । बटोर ,,यह दूरी मेरे कस्बें का ह्र्दय है , दक्षा पटेल , रामसमुझ का हलफनामा . बटोर की पंक्तियां देखे –
साधु आये अलकनंदा से / साधु कंचन कुटी से / साधु आये काशी से कांची से साधु
साधु ही साधु फैल गये / सारी सृष्टि में / मानवीय लोकतंत्र में वे अब पूरी तरह
अंट नही पा रहे थे ।
उनकी यह कविता आज कितनी प्रसंगिक हैं , यह कहने की जरूरत नही हैं । उन्होने अपने जीवन में बेशुमार यात्रायें की है । इन यात्राओं पर लिखी उनकी कवितायें – साबरमती एक्सप्रेस , जूनागढ़ गिरनार , मधुपुर की चाय , पूना की एक रात्रिरात्रि को पढ़ने का अलग सुख है । ये यात्रायें संस्मरण लिखने के योग्य हैं । मेरी प्रिय कविता दक्षा पटेल है ।
अनंत धीरज हो तुम्हारे पास / उन्हे बर्दाश्त करने का / जो तुम्हारी भाषा नही समझते
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वह तुम्हारे जाने के साथ / जुड़ते हाथों ने कह दिया / निर्विकार
क्या विदा इसी तरह देते हैं / अजनबियों को
कविता की समीक्षा करनेवाले आलोचक की कविता पर क्या कोई आलोचक विचार करेगा ? यह सवाल तब तक बना रहेगा जब तक कोई पारखी नजर उन तक नही पहुंचती । उनकी कविताओं में निरंतर वैचारिक विकास देखा जा सकता है । वे अपने पुराने मुहावरे से मुक्त होते दिखाई देते हैं। उनके जाने के बाद हिंदी कविता की आलोचना में जो शून्य पैदा हुआ है , वह बढ़ता जा रहा है । 21 वी शताब्दी के लगभग दो दशक बीतने को है । अभी तक इस दौर का मूल्यांकन नही हुआ है ।
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हर शहर की अपनी साहित्यिक संस्कृति होती है । गोरखपुर की अपनी परम्परा रही है । इस परम्परा में राजनीति कम नही होती । गोरखपुर वैसे ही दो जातीय गुटों के बीच बदनाम रहा है । इस शहर के आंचल में खूंन के धब्बे कम नही हैं । प्राय : हर विश्वविद्यालयों दो जातियों के ध्रुव काम करते है और सृजनशीलता को विनष्ट करते हैं । पढ़े – लिखे समाज में इस तरह की प्रवृति हमे बताती है कि हम भीतर से कितने आदिम हैं । यही काम साहित्यिक जगत में होता है । हर शहर में दो तीन ग्रूप होते हैं । कुछ की असहमतियां बेहद हिंसक होती है । विचार – विमर्श में असहमति जरूरी है , उससे विकास होता है । कुछ नई चीजें सामने आती हैं । गोरखपुर में दो ध्रुव थे । एक छोर पर परमानंद श्रीवास्तव थे तो दूसरे छोर का प्रतिनिधित्व विश्वनाथ प्रसाद तिवारी करते थे । विश्वनाथ प्रसाद तिवारी 1977 से दस्तावेज नाम की पत्रिका निकालते थे । यह हिंदी की महत्वपूर्ण पत्रिका है, जिसमें छपने का सौभाग्य मुझे मिल चुका है । इस पत्रिका ने कुछ नये लोगों को प्लेटफार्म दिया । उसकी ख्याति देश भर में थी । ये दोनो लोग विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के शीर्ष थे । डां तिवारी हिंदी विभाग के प्रोफेसर और अध्यक्ष के पद से रिटायर हुये जब कि यह सौभाग्य परमानंद श्रीवास्तव को नसीब नही हुआ । दोनो गुटों के अपने – अपने अनुयायी थे । जब भी मैं गोरखपुर आता था , तमाम किस्से सुनने को मिलते थे । मेरे लिये दोनों प्रिय थे । एक बार दस्तावेज में वाल्टेयर को उद्धृत करते हुये एक लेख छपा – लेख की प्रस्तावना में लिखा था कि भले ही मैं तुमसे असहमत हूं लेकिन अंत तक तुम्हारे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा कंरूगा । इस रक्षा कवच के साथ परमानंद श्रीवास्तव की खूब आलोचना की गयी थी । उससे वे बेहद आहत थे । दोनों मेरे गुरू थे , इसलिये किसी के पक्ष और विपक्ष में स्वभावतह कुछ नही कह सका । इसे आप मेरी कमजोरी भी कह सकते हैं । मेरा कद इतना बड़ा नही था कि मैं आलोचना कर संकू । विश्वनाथ प्रसाद तिवारी साहित्य अकादमी के अध्यक्ष हो गये और और परमानंद श्रीवास्तव अपने नगर में अकेले रह गये । कुछ दिनों बाद वे आलोचना के दायित्व से मुक्त हो गये । आलोचना नये लोगो के हाथ में पहुंच गयी । स्थायी सम्पादक नामवर सिंह अडिग थे ।
परमानंद श्रीवास्तव विश्वविद्यालय की राजनीति तथा अन्य कारणों से हिंदी विभाग के अध्यक्ष नही हो सके इसका उन्हे कम मलाल नही था । वे हिंदी के आधिकारिक आलोचक और लेखक थे । उन्हें वह जगह मिलनी चाहिये थी । हिंदी संसार में उनकी पहचान एक प्रतिष्ठित आलोचक के रूप में थी । यह पद उन्हें मिल भी जाता तो क्या फर्क पड़ता । लेकिन असल बात यह थी कि उन्हें दरकिनार कर दिया गया था । यह बात उन्हें हजम नही हो रही थी । फिर वे बर्दवान यूनीवर्सिटी में प्रोफेसर और अध्यक्ष के पद पर नियुक्त हुये । बर्दवान में उनके अनुभव खुशगवार थे । वे वहां के गेस्ट हाउस में रहते थे और माह में सुविधानुसार एक दो बार गोरखपुर आते थे । उनका परिवार यहां अकेला था । वे यहां रहकर परिवार की क्या मदद करते थे । बस अहिर्निश साहित्य सेवा में लगे रहते थे । साहित्य उनका ओढ़ना- बिछौना था । बर्दवान से लौटने के बाद जब उनसे मिलने गया और उनका हालचाल पूंछा तो वे रोमांटिक होकर बोले – स्वप्निल तुम्हें क्या बताऊं – जब आकाश में बादल आ जाते है तो हास्टल से लड़कियां निकल कर सामनेवाले जंगल में चली जाती है और अपना केश खोल कर रबींद्र संगीत गाती है । वे इस बात से लापरवाह हो जाती थी कि जंगल में बहुत से सांप रहते हैं । यह उनका बताया हुआ विलक्षण बिम्ब था । जब कभी आकाश में बादल छा जाते तो यह बिम्ब मुझे आयास याद आता है । सोचता कितनी अदभुत और खिलद्द्ढ होती है बंगाली लड़कियां ।
बर्दवान में वे साल भर रहे । इसी बीच अपने प्रयत्न और दौड़ – धूप करके हिंदी विभाग में प्रेम चंद पीठ की स्थापना करायी और उस पीठ के प्रोफेसर एंव अध्यक्ष के पद को सुशोभित किया । इस तरह उनकी यह कामना पूरी हुई और विरोधियों को जबाब भी मिल गया । इस छोटे के कद के आदमी में जिद्द है , इसका पता इस प्रकरण से चलता है । उन्हें कभी नाराज होते नही देखा है न उन्हें तेज बोलते हुये सुना गया है । उनके आलोचक यह जरूर बताते है कि उन्होनें नामवर सिंह की सघन छाया में काम किया है , अपना अलग मार्ग नही बनाया है । शहर में किसी को कहते हुये सुना था कि परमानंद श्रीवास्तव के पास दो सीढ़ियां थी । एक नामवर सिंह थे दूसरे केदारनाथ सिंह । यह बात उनकी मृत्यु के कुछ दिनों बाद कही गयी थी । मैंने तत्काल विरोध किया कि अभी उनके चिता की राख नही ठंडी हुई है और आप इस तरह की बात कर रहे है । कहावत है कि लोमड़ी अपनी खाल बदल सकती है लेकिन दुष्ट अपनी दुष्टता नही छोड़ते ।
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उनके जीवन के दो वाकयें अक्सर याद आते हैं । पहला था उनके 75 वर्ष पूरे होने नगर में उनका नागरिक अभिनंदन , दूसरा अयोध्या के राजघराने से दिया जानेवाला द्विज देव सम्मान । पहली घटना का मैं साक्षी नही था लेकिन दूसरी घटना मेरे सामने घटित हुई थी । गोरखपुर में इस सम्मान का आयोजन कवि मित्र देवेंद्र आर्य ने किया था । शीर्षक दिया गया था प्रतिमानों के पार । मुख्य अतिथि थे प्रो. नामवर सिंह । उन्होनें प्रतिमानों के पार का तुक सितारों के पार से भिड़ाया । फिर उन्होने व्यंग में बच्चन के गीत – इस पार प्रिये तुम हो मैं हूं / उस पार न जाने क्या होगा । इस अवसर पर उन्होनें वह नही कहा – जो उन्हें कहना चाहिये । अगर कोई साहित्यकार अपने शहर में सम्मानित हो रहा है तो उसे शुभकामनायें देनी चाहिये, लेकिन नामवर सिंह बोलने में कंजूसी कर गये – जो कुछ भी कहा उसका टोन ठीक नही था ।जिन नामवर सिंह के लिये परमानन्द जी ने अपना साहित्यिक जीवन न्योछावर किया था , लोगो के तानें सुने उनके लिये उनके पास बोलने के लिये अच्छे शब्द नही बचे थे । इन्ही नामवर सिंह के 75वें जन्मदिन को अमृत महोत्सव के नाम से देश के बिभिन्न शहरों में मनाया गया । इस कार्यक्रम के सूत्रधार प्रसिद्ध पत्रकार प्रभाष जोशी थे । नामवर सिंह नें इस पर कोई एतराज नही किया । परमानंद श्रीवास्तव के लिये इस आयोजन पर वे दिल खोल कर कुछ नही बोले । सब अपने लिये अच्छा चुनाव करते है और दूसरे के लिये उनका चुनाव बदल जाता है । वे नामवर सिंह से कितने आसक्त थे कि उनके बिना इस आयोजन की कल्पना नही कर सकते थे \ स्वाभाविक था उनके विरोधी इस बात को चटकारे लेकर गाते रहे ।
अयोध्या में जब उन्हें द्विजदेव सम्मान दिया गया । इस सम्मान के मुख्य वक्ता अशोक बाजपेयी थे । उन्होनें उनके योगदान पर कुछ नही कहा । व्यक्तिगत बातों को लेकर उनकी आलोचना करते हुये कहा कि परमानंद जी तुरंता आलोचक है । सम्मान के अवसर पर अपमानजनक टिप्पणी – हम सब सुन कर हैरान थे । किसी का विरोध करना हो तो उसके लिये मंच की कमी नही है । विष – वमन करके अशोक बाजपेयी बैठ गये । यह भी सुना गया कि रात को उन्हें दिल्ली लौटना था – उन्हें बोल कर निकलने का इतना अच्छा मौका कहां मिलता । आयोजक की ओर से कुछ नही कहा गया । इससे यह लग रहा था कि उन्हें अपमानित करने की व्यूह योजना सम्मिलित रूप से बनाई गयी थी । मैं यह सोच रहा था कि इस तरह के चरित्र – हनन की टिप्पणी के बाद , वह इसका प्रतिरोध करेगे और सम्मान वापस कर देगे । अगर वह ऐसा करते तो उनका मान बढ़ जाता , लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा कुछ नही हुआ । परमानंद जी जैसे लोग पुरस्कारों और सम्मानों से नही जाने जायेगे । उनका लेखन ही उनका मूल्यांकन हैं । मेरे जैसा अदना आदमी उस जगह पर होता तो इस सम्मान को ठोकर मार देता । हिंदी के लेखको और कवियों का अनुराग पुरस्कारों और सम्मानों के प्रति बढ़ गया है । परमानंद श्रीवास्तव इसके उपवाद नही बन सके ।
इस बेहद आशालीन प्रकरण से हमारा मन भरा हुआ था । जब वह मंच से उतरे तो मैंने अपना आक्रोश उनके सामने व्यक्त किया । जबाब में उन्होने बस इतना कहा कि अशोक बाजपेयी शुरू से मेरे प्रति अनुदार रहे हैं । आगे उन्होनें जो कुछ कहा , उससे मेरी सहमति नही थी । उनकी यह भीरूता मुझे अच्छी नही लगी ।
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सेवानिवृत होने के बाद उनकी सक्रियता में कमी नही आयी । शहर के बाहर के सेमिनारों में उनका आना जाना बना रहा । वे नियमित रूप से कुछ न कुछ लिखते रहते थे । उम्र बढ़ रही थी लेकिन वह प्राय: बुलावे पर चले जाते थे । लौट कर अस्वस्थ हो उठते थे । स्थानीय लोग उन्हें गोष्ठियों में यह कह कर ले जाते थे कि अभी एक घंटे में लौट आयेगे । ऐसा नही होता था , एक घंटे की जगह कई घंटे लग जाते थे । उनकी भी इच्छा गोष्ठियों में शामिल होने होती थी । साहित्य उनकी प्राण – वायु थी । लेकिन जीवन तो जीवन है , उसकी रक्षा आदमी को खुद करनी पड़ती है । उनकी अस्वस्थता तो परिवार को झेलनी पड़ती थी । इसलिये फोन या मोबाइल पर पावंदी लगा दी गयी । जो लोग उनके स्नेहभाजन थे , उनका आना कम होने लगा , क्योकि वह उपयोग के योग्य नही रह गये थे । मैं वैसे भी दूर फैज़ाबाद में था । कभी कभार ही मिलना हो पाता था , लेकिन जिन लोगों का उन्होने साहित्यिक संस्कार किया था , वे उनसे मुंह चुराने लगे । जिस कठिन समय का प्रयोग वे अपनी आलोचना में करते थे , वह समय उनके जीवन में आ चुका था । गोरखपुर में कम ही लोग थे , जो उनसे मिलते थे । अंतिम दिनों में उनके बोलने में कोई तारतम्य नही मिलता था । उनकी स्मृतियां उन्हें धोखा दे रही थी । वे कभी अपने तवियत को लेकर कोई बात नही करते थे । बस उनके पास साहित्य के किस्से जरूर थे – जो उनके अतीत से दस्तक दे रहे थे । वे अंत तक साहित्य की बाते करते रहे । मुझे यह बहुत कारूणिक लगता था । वे शुरू से अंत तक साहित्य के लिये जिये और मरे । जो कुछ भी लिखा मनोयोग से लिखा ।
हर आदमी का जीवन विलोमों से भरा होता है । वह गुण और दोष का समुच्च्य होता है । परमानंद श्रीवास्तव उससे परे नही थे । वे हिंदी के बहुत से लेखकों और कवियों से बेहतर थे । वह साहित्य के पूर्णकालिक नागरिक थे । उनके बिना आजादी के बाद हिंदी कविता के इतिहास की कल्पना नही की जा सकती । मेरे लिये तो वह परम थे । मैंने जीवन भर उनसे कुछ न कुछ सीखा है । हर व्यक्ति अपने अंत के साथ बंधा हुआ है । यही जीवन का सच है । इस सच का सामना जाने के बाद परिजन और इष्ट मित्र करते रहते है ।
(यह लेख मेरे संस्मरण की किताब लेखक की अमरता में शामिल है )
स्वप्निल श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से साभार

स्वप्निल श्रीवास्तव
