‘प्रेस क्लब ऑफ इंडिया’ में उमर खालिद की पुस्तक पर परिचर्चा
कार्यक्रम जेल में खालिद के छठे जन्मदिन के मौके पर आयोजित किया गया
राज्यसभा सदस्य मनोज झा, प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद, प्रोफ़ेसर प्रभु महापात्रा, वरिष्ठ पत्रकार आरफ़ा खानम शेरवानी ने की चर्चा
नयी दिल्ली। राष्ट्रीय राजधानी में ‘प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया’ में मंगलवार को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के पूर्व छात्र उमर खालिद की किताब ‘फ्रैक्चर्ड कम्युनिटीज़: आदिवासी हिस्ट्रीज़ एंड द पॉलिटिक्स ऑफ़ पावर’ पर परिचर्चा हुई, जिसमें वक्ताओं ने आदिवासी इतिहास पर एक अकादमिक काम के तौर पर इसकी महत्ता रेखांकित की।
यह कार्यक्रम जेल में खालिद के छठे जन्मदिन के मौके पर आयोजित किया गया। कार्यक्रम में राज्यसभा सदस्य मनोज झा, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद झा, प्रोफ़ेसर प्रभु महापात्रा, वरिष्ठ पत्रकार आरफ़ा खानम शेरवानी और ‘द वायर’ के संपादक सिद्धार्थ वरदराजन समेत कई लोगों ने हिस्सा लिया।
दिल्ली में 2020 में हुए दंगों संबंधी मामले के सिलसिले में जेल में बंद खालिद ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अपनी ‘पीएचडी थीसिस’ के तौर पर यह पुस्तक लिखी है।

खालिद की ‘थीसिस’ की जांच करने वालों में से एक, महापात्रा ने कहा कि उन्हें इस काम से ‘जुड़ाव’ महसूस हुआ जो आज के झारखंड में सिंहभूम के इतिहास और उन राजनीतिक एवं प्रशासनिक ढांचों की पड़ताल करता है जिन्होंने वहां के आदिवासी समुदायों को आकार दिया।
महापात्रा ने कहा, ‘‘वह एक नज़रिए को दूसरे के खिलाफ़ खड़ा करने की कोशिश नहीं कर रहे हैं। वह कई विरोधाभासों को देख रहे हैं और उन्हें एक साथ पेश कर रहे हैं। इतिहास को देखने का यह एक बहुत ही दिलचस्प तरीका है।’’
खालिद की मां सबीहा खानुम ने कहा कि यह परिवार के लिए ‘खुशी और दुख का पल’ है, क्योंकि किताब तो पाठकों के लिए उपलब्ध हो गई, लेकिन इसका लेखक जेल में है। उन्होंने कहा कि खालिद ने पुलिस और अदालती कार्यवाही के बीच अपनी ‘थीसिस’ पूरी की और आखिरकार अदालत के दखल से इसे जमा करना मुमकिन हो पाया। खानुम ने लोगों से अपील की कि वे इस किताब को सिर्फ़ इसलिए न पढ़ें कि इसका लेखक जेल में है, बल्कि इसकी अकादमिक अहमियत के लिए पढ़ें।
सबीहा खानुम ने कहा कि जब उमर ने अपनी थीसिस पूरी की थी, तब शायद उन्होंने नहीं सोचा होगा कि एक दिन हजारों लोग उनके शोध को पढ़ेंगे. उन्होंने कहा कि किताब के रूप में यह शोध सामने आना परिवार के लिए बेहद खुशी की बात थी. उन्होंने कहा कि किताब पढ़ते हुए उनके जेहन में सबसे पहले साल 2016 के हालात आए. उन्होंने कहा कि उस समय उमर खालिद को लेकर लगातार विवाद हुआ और मीडिया में उनकी गिरफ्तारी तथा उससे जुड़े घटनाक्रम को लेकर लगातार खबरें सामने आती रहीं.
2016 में परिवार ने पहली बार झेला ऐसा दौर
सबीहा खानुम ने कहा कि 2016 का समय पूरे परिवार के लिए बेहद मुश्किल था. यह पहली बार था, जब परिवार को पुलिस, मीडिया और अदालत से जुड़े मामलों का सामना करना पड़ा. उन्होंने कहा कि उमर की बहनों और परिवार के अन्य सदस्यों के लिए भी यह एक नया अनुभव था. उन्होंने मीडिया कवरेज को लेकर कहा कि उस दौर में उमर को लेकर एक खास तरह की छवि बनाई गई. आज भी मीडिया में किसी व्यक्ति के बारे में बनने वाली धारणा का समाज पर प्रभाव पड़ता है.
आदिवासी और हाशिये के समुदायों से जुड़े सवाल
सबीहा खानुम ने कहा कि उमर ने आदिवासी समुदायों, समाज के दबे-कुचले लोगों और अल्पसंख्यकों से जुड़े सवालों पर काम किया. उन्होंने कहा कि किताब के जरिए यह समझने का मौका मिलता है कि उमर किन मुद्दों पर सोचते थे और किन समुदायों से जुड़े सवालों को अपने शोध का हिस्सा बनाया. उन्होंने लोगों से अपील की कि वे किताब पढ़ें और उसमें उठाए गए सवालों पर खुद विचार करें.
छह साल का वक्त बहुत लंबा होता है
सबीहा खानुम ने उमर के लंबे समय से जेल में रहने को लेकर भी चिंता जाहिर की. उन्होंने कहा कि गिरफ्तारी के समय परिवार को लगा था कि शायद उमर को दो साल जेल में रहना पड़ेगा. उस समय दो साल भी बहुत लंबा समय लगता था, लेकिन अब करीब छह साल बीत चुके हैं. उन्होंने कहा कि परिवार को अदालतों पर भरोसा है, लेकिन इतने लंबे समय तक चलने वाली कानूनी प्रक्रिया परिवार के लिए बेहद कठिन है.
कार्यक्रम के अंत में सबीहा खानुम ने उमर खालिद के लिए लिखी गई एक नज्म पढ़ी. उन्होंने बताया कि यह नज्म इंतजार हुसैन ने उमर के लिए लिखी है. नज्म में अदालत, जेल, परिवार की भावनाओं और आजादी के सवाल को उठाया गया. नज्म की अंतिम पंक्तियों में आजादी का सवाल सामने आया. सबीहा खानुम ने नज्म पढ़कर अपनी बात समाप्त की और कहा कि वह चाहती हैं कि भारत के साथ-साथ विदेशों में भी अधिक से अधिक लोग उमर की किताब खरीदें और पढ़ें.
लोग अपना ऑडिटोरियम खुद बना लेंगे
उमर खालिद की किताब के लॉन्च पर राष्ट्रीय जनता दल सांसद मनोज कुमार झा ने कहा कि आप ऑडिटोरियम बंद कर सकते हैं या इजाज़त रद्द कर सकते हैं, लेकिन लोग अपना ऑडिटोरियम खुद बना लेंगे. खुला आसमान ही ऐसा ऑडिटोरियम है, जिस पर किसी का कोई दावा या अधिकार नहीं है.
खालिद को सितंबर 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़ी बड़ी साज़िश के मामले में गिरफ़्तार किया गया था और तब से वह दोष सिद्धि के बिना न्यायिक हिरासत में हैं।
