गोवा डायरी 2026 : भाग-1
मानसून, समुद्र और बदलता कैंडोलिम
संजय श्रीवास्तव
पांच साल पहले कोरोना काल में गोवा जाना हुआ था. तब करीब दस दिन वहां रहा. मन में था कि एक बार फिर जाऊं. कहते हैं, यात्राएं भी अपना समय खुद तय कर लेती हैं. इस बार भी ऐसा ही हुआ. कार्यक्रम बना और हम चल पड़े.
राजधानी एक्सप्रेस से 26 घंटे का सफर तय कर मडगांव पहुंचे. स्टेशन पर उतरकर पहला एहसास यही हुआ कि देश के सबसे बड़े पर्यटन स्थलों में शामिल गोवा का रेलवे स्टेशन उतना भव्य नहीं, जितनी उसकी पहचान है. बाहर निकलते ही टैक्सी बूथ है. यहां ओला और उबर नहीं चलतीं. स्थानीय टैक्सी यूनियनों ने उन्हें आने ही नहीं दिया. टैक्सी का किराया भी इतना कि दिल्ली-नोएडा की टैक्सियां इनके सामने सस्ती लगें. होटल कैंडोलिम में था, करीब 40 किलोमीटर दूर.

5 साल बाद भी गोवा बहुत बदला हुआ नहीं लगा. फर्क सिर्फ इतना था कि मानसून ने उसकी खूबसूरती कई गुना बढ़ा दी थी. यहां बारिश रोज होती है. कभी तेज, कभी हल्की. कुछ देर बरसती है, फिर धूप निकल आती है. समुद्र किनारे बारिश का अपना अलग ही आनंद है.
जून से सितंबर तक यहां पर्यटकों की भीड़ कम हो जाती है. समुद्र तट शांत हो जाते हैं. शांत, सुकून और आनंददायक गोवा का दूसरा चेहरा सामने आता है. अगर मुझसे कोई पूछे कि गोवा आने का सबसे अच्छा समय कौन-सा है, तो मैं बिना सोचे कहूंगा – मानसून. मुझे गोवा की बारिश से प्यार है. मैं हर बार इसी मौसम में यहां आना चाहूंगा.

इस बार भी मैंने वही होटल चुना, जहां 5 साल पहले ठहरा था. होटल कमरा बड़ा और आरामदायक था. खिड़की खुलते ही नारियल के पेड़ हवा में झूमते दिखाई देते थे. लंबी रेल यात्रा की थकान थी, इसलिए दो घंटे गहरी नींद सोया. फिर नीचे बने ‘बनाना लीफ’ रेस्टोरेंट में मसाला डोसा खाने पहुंचा. डोसे के भीतर आलू की ऐसी स्वादिष्ट फिलिंग पहले शायद ही कहीं खाई हो. साथ में नारियल के चूरे से भरा पान का बीड़ा मिला, जिसने पूरे भोजन के स्वाद को और यादगार बना दिया.
कैंडोलिम उत्तर गोवा का छोटा-सा तटीय गांव है, लेकिन इसकी रंगत तेजी से बदल रही है. गोवन शैली के रंग-बिरंगे मकान, ढलवां छतें, नारियल के पेड़ और बड़े-बड़े अहाते अब भी दिखाई देते हैं, लेकिन ज्यादातर पुराने घर बंद पड़े हैं. कई जर्जर होकर गिर रहे हैं, कई बिक चुके हैं. उनकी जगह नए होटल, विला और आलीशान इमारतें खड़ी हो रही हैं.
स्थानीय लोगों ने बताया कि यहां की जमीनों के दाम लगातार बढ़ रहे हैं. बड़ी संख्या में खरीदार दिल्ली, मुंबई, हरियाणा और पंजाब से हैं. मुझे लगा कि अगर यही रफ्तार रही तो कुछ वर्षों बाद कैंडोलिम की पहचान सिर्फ समुद्र तट और नारियल के पेड़ों तक सिमट जाएगी. उसकी पारंपरिक गोवन आत्मा धीरे-धीरे पीछे छूट जाएगी.
समुद्र होटल से करीब चार सौ मीटर पीछे था, गांव की छोटी गलियों से गुजरते हुए शांत रास्ता. कुछ ही मिनटों में लहरों की आवाज सुनाई देने लगी. तांबई रंग की रेत पर समुद्र से कुछ दूरी तक बेल की शाखाएं फैल रही थीं. स्थानीय लोग इसे मर्यादा बेल कहते हैं. इसका वैज्ञानिक नाम है – इपोमोए पेस-कैप्रे. यही बेल तेज हवा, खारे पानी और समुद्री कटाव से तट की रक्षा करने में खास रोल अदा करती है. गोवा के लगभग हर समुद्र तट पर ये दिखाई देगी.
गोवा के साथ फैला हुआ खूबसूरत अरब सागर. लगातार आती-जाती लहरें. समुद्र के किनारे खड़े होकर हमेशा महसूस होता है कि हवा और लहरों का कोई गहरा रिश्ता है. हवा उन्हें ऊर्जा देती है. लहरें हजारों किलोमीटर की यात्रा करके तट से मिलने का इरादा लिए चली आती हैं. हवा समुद्र के किनारे सरसराते हुए चलती है. बाल उड़ते रहते हैं.
वहीं समुद्र तट पर हमारी मुलाकात लाइफसेवर संतोष से हुई. उन्होंने बताया कि उनकी ड्यूटी सुबह आठ बजे शुरू होती है, शाम तक चलती है. मानसून में सबसे ज्यादा सावधानी रखनी पड़ती है, क्योंकि समुद्र बाहर से शांत दिखता है लेकिन भीतर धाराएं बहुत खतरनाक हो सकती हैं. गोवा के करीब हर प्रमुख बीच पर प्रशिक्षित लाइफसेवर तैनात रहते हैं.उनकी सतर्कता कई लोगों की जान बचाती है.
संतोष से बातचीत करते करते ही फिर तेज बारिश शुरू हो गई. हमने जल्दी से रेनकोट पहने. कुछ देर तक बारिश की बूंदों को समुद्र की लहरों पर गिरते देखते रहे. फिर गांव की गलियों से होते हुए होटल लौट आए. थोड़ी देर आराम किया. रेल यात्रा की थकान अभी पूरी तरह उतरी नहीं थी.
शाम ढलने लगी तो फिर पैदल निकल पड़े. हल्की बारिश के बीच कैंडोलिम की सड़कें और भी खूबसूरत लग रही थीं. आधा किलोमीटर चलने के बाद एक छोटे-से ढाबेनुमा रेस्टोरेंट में रुक गए. पिछली यात्रा में भी यहां खाना खाया था. इस बार गोवा के प्रसिद्ध व्यंजन ज़ाकुटी (Xacuti) का ऑर्डर दिया. साथ में रोटी और अंडा बिरयानी.
ज़ाकुटी गोवा की सबसे मशहूर करी में गिनी जाती है. इसे भुने नारियल, खसखस और करीब 15 तरह के मसालों से पेस्ट के रूप में तैयार करते हैं, जिससे इसका स्वाद गहरा और अलग हो जाता है. आमतौर पर यह चिकन या मटन के साथ बनती है, लेकिन हमने इसे खासतौर पर वेज बनवाया. स्वाद जोरदार.
वैसे कैंडोलिम सिर्फ समुद्र तट के कारण नहीं जाना जाता. इतिहास भी इसकी पहचान है. उत्तर गोवा के बारदेज तालुका का यह पहला गांव माना जाता है, जिसने 16वीं सदी में बड़े पैमाने पर ईसाई धर्म अपनाया. यहां का सबसे धनी और सबसे ज्यादा जमीन का मालिक शेनॉय ब्राह्मण परिवार सबसे पहले ईसाई बना. उसे जातीय नाम मिला – साल्वाडोर पिंटो. गोवा के प्रसिद्ध पिंटो परिवार की शुरुआत यहीं कैंडोलिम में इसी परिवार से ही मानी जाती है. बाद में यही परिवार पुर्तगाली शासन के खिलाफ रचे गए एक विद्रोह से भी जुड़ा. मेरे होटल से कुछ ही दूरी पर स्थित प्रसिद्ध बोसियो अस्पताल भी इसी परिवार द्वारा दान की गई संपत्ति में कई दशकों से चल रहा है.
पहले ही दिन कैंडोलिम ने साफ कर दिया कि गोवा सिर्फ समुद्र तटों का नाम नहीं है. यहां हर मोड़ पर इतिहास है, हर गांव की अपनी कहानी है. हर बारिश एक नया रंग छोड़ जाती है. (अगले भाग में—कैलेंगूट बीच की सैर, मानसून का समुद्र और उससे जुड़ी कुछ दिलचस्प कहानियां).
