कविता
हमला
नरसिंह कुमार मयूर
बेटियों के स्वाभिमान पर,
जब भी हमला होता है,
सभ्यता का हर आवरण,
सहम के चुपचाप रोता है।
सवाल उठाने वाली आवाज़ें,
जब ट्रोलिंग का शिकार बनें,
शब्दों के ज़हरीले बाणों से,
जब मर्यादा नीलाम बने।
तब समझो कि समाज का,
विवेक कहीं पर सोया है,
मानवता ने अपना ही,
सबसे पावन धन खोया है।
राजनीति के खेल में क्यों,
नारी की गरिमा दांव लगे?
हर बेटी की सुरक्षा पर,
क्यों हर दिन नया सवाल जगे?
फ़र्क़ नहीं पड़ना चाहिए,
किस धर्म या जाति से है नाम,
नारी का सम्मान ही तो,
हर राष्ट्र का होता पहला काम।
आओ मिलकर सुरक्षा और, संवेदना की अलख जगाएं,
ट्रोलिंग और नफ़रत से ऊपर, बेटियों का एक संसार बनाएं।
