लघु कथा
फैसले से पहले
डॉ रीटा अरोड़ा
“माँ, मैंने तय कर लिया है… अब मैं पापा से कभी बात नहीं करूँगा।”
माँ ने बेटे को गौर से देखा, “इतनी बड़ी बात… लेकिन हुआ क्या?”
“उन्होंने मेरी शादी के लिए साफ मना कर दिया है।”
“तुमने उनसे पूछा क्यों नहीं कि मना क्यों किया?”
“क्या फायदा? उनका फैसला आ चुका है।”
माँ की आँखें भर आईं।
“बेटा, तुम्हारे पिता ने तुम्हारे हर फैसले में तुम्हारा साथ दिया है। एक बार उनकी चुप्पी का कारण भी सुन लो।”
“माँ, मुझे उनकी परवाह नहीं।”
“अगर सचमुच परवाह नहीं होती, तो इतनी नाराज़गी भी नहीं होती।”
बेटा चुप हो गया।
रात को वह पिता के कमरे के बाहर खड़ा था।
“पापा…”
कोई उत्तर नहीं आया।
वह अंदर गया। पिता सो रहे थे। सिरहाने उसकी बचपन की तस्वीर रखी थी और हाथ में उसकी शादी का निमंत्रण।
बेटे ने निमंत्रण उठाया। उस पर पिता की आँखों के आँसू के निशान थे।
वह वहीं बैठ गया।
सुबह पिता ने पूछा, “तुम रात को आए थे?”
बेटा कुछ नहीं बोला… बस उनके गले लग गया।
