बाढ़-भूस्खलन से सबक लेने का वक्त
कुलभूषण उपमन्यु
पूरी प्रकृति को हरियाली से सराबोर करके धरा को तृण संकुल बना कर जहां पैदल रास्ते भी छुप जाते हैं, हमेशा से ही ऐसा बरसात का मौसम कठिनाइयों और बाढ़ आदि खतरों से भरा रहा है। शायद इसीलिए बरसात के महीनों को चौमासा कहा जाता था, जिनमें साधू संत अपनी यात्राओं को स्थगित करके कहीं एक गांव में रुक जाते थे और इस समय को धार्मिक कथा वार्ता के आयोजन करके सद्गुण और धर्म प्रचार में उपयोग करते थे। एक पंथ दो काज वाली कहावत चरितार्थ होती थी। लोग अनावश्यक आवागमन नहीं करते थे, लेकिन अब आधुनिक विकास और यातायात के साधनों के विस्तार के चलते बरसात का मौसम भी पर्यटन का मौसम बन गया है।
खास कर ऊंचाई वाले क्षेत्रों में स्थित धार्मिक स्थलों तक, जहां पंहुच बर्फ पिघलने के बाद बरसात में ही संभव है, वहां के लिए धार्मिक पर्यटन (यात्राओं) बरसात में ही ज्यादा जोर पकड़ता है। ये यात्राएं तो पहले से ही आयोजित होती आई हैं, लेकिन पैदल यात्राएं होने के कारण इतनी भीड़ भाड़ नहीं होती थी।
जलवायु परिवर्तन के इस दौर में बरसात की विभीषिका को और ज्यादा बढ़ा दिया है, जिसके उदाहरण 2013 जून की केदारनाथ त्रासदी या भरमौर मणिमहेश राधाष्टमी स्नान के दौरान 1994 और 2025 में आई बाढ़ों में मिल जाते हैं। मैदानी इलाकों में जल भराव के कारण ज्यादा हानि होती है, जबकि पर्वतीय क्षेत्रों में भूस्खलनों और नदी के तेज बहाव से होने वाले कटाव से ज्यादा नुकसान होता है। ज्यादातर भूस्खलन उन क्षेत्रों में होते हैं, जहां मानव गतिविधि जनित प्रकृति के साथ छेड़छाड़ ज्यादा होती है। मानव जनित छेड़छाड़ कई तरह की है।
सबसे ज्यादा तो वर्तमान विकास कार्यों के कारण प्रकृति विध्वंस होता है। जैसे कि खनन, सड़क निर्माण या जल विद्युत परियोजनाओं के कारण होने वाली तोड़फोड़, जिसमें भारी मशीनों से कटाई, मलबा डंपिंग, सुरंग बनाने जैसी गतिविधियां मुख्य हैं। इन कार्यों के लिए बड़ी मात्रा में जंगल भी कटते हैं, जिससे जलवायु परिवर्तन का खतरा और ज्यादा बढ़ जाता है। जलवायु परिवर्तन के कारण बरसात की बारिश की बौछार बढ़ गई है। थोड़े समय में ही बहुत ज्यादा पानी बरस जाता है।
संकरी घाटियों में एक ही जगह पर जब 10-20 किलोमीटर के दायरे में एक घंटे में 100 मिली मीटर से ज्यादा बारिश हो जाए तो उसे बादल फटना कहा जाता है। बादल फटने की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। यदि प्रकृति से छेड़छाड़ ज्यादा हुई हो तो बादल फटने से नाजुक भूमि जल्दी ही बह कर भयानक भूस्खलनों को जन्म देती है, जिससे जनधन की भारी हानि हर साल पर्वतीय क्षेत्रों को झेलनी पड़ रही है।
इस वर्ष भी शुरुआती बरसात में ही चट्टानें टूटने के कारण लाहुल पांगी में 13 लोग एक गाड़ी सहित ऊपर से गिरी भारी चट्टान के नीचे दब कर काल का ग्रास बन गए, तो बनीखेत के पास एक ही परिवार के पांच लोग दुर्भाग्यवश धुंध के चलते गाड़ी गहरी खाई में लुढ़क जाने से मारे गए। कांगड़ा जिला की शाहपुर तहसील का बोह क्षेत्र तो इस पांच साल में दो बार जनधन की हानी झेल चुका है।
2021 में बोह बाजार से ऊपर जंगल में कोई छोटा भूस्खलन आया, जिससे कुछ पेड़ नीचे खाई में फंस गए। उनसे कुछ मलबा फंसता गया और एक बांध जैसा बन गया। भारी बारिश में जब पानी बांध की क्षमता से ज्यादा हो गया तो वह टूट गया और जमा भारी मात्रा में पानी नीचे बोह बाजार को तबाह करता हुआ निकल गया, जिसमें कुछ जन हानि भी हुई थी।
इस वर्ष भी बोह वैसी ही त्रासदी का शिकार हुआ है। दिन में घटना होने के कारण और 2021 के सबक से चौकन्ने लोगों ने भाग कर जान तो बचा ली, किंतु मकानों और गौशालाओं का भारी नुकसान हुआ। सरकार ने संवेदना से मामले को संभाला भी, किंतु ऐसे घाव भरते हुए दशकों लग जाते हैं। जैसे कि मंडी जिला के 2023 और 2025 के घाव अभी तक भी भर नहीं पाए हैं।
सरकारों की सामर्थ्य भी सीमित ही है और प्राथमिकताएं भी बाधा बनती हैं। बोह की घटनाओं को समझने के लिए मैंने कुछ साथियों से बात करके कारण जानने का प्रयास किया। मैंने समझा था की जरूर कोई निर्माण कार्य व प्रकृति से छेड़ छाड़ हुई होगी, किंतु ऐसा तो कुछ भी नहीं पाया गया। मुझे अपने एक मित्र प्रताप जरयाल जी की बात से नया ही दृष्टिकोण देखने को मिला और उसे मैंने काफी सटीक निष्कर्ष माना।
उनके अनुसार जहां भूस्खलन हुआ उसके ऊपर कोई छेड़छाड़ प्रकृति से नहीं हुई है, किंतु घने वन में आग जरूर लगी, जिससे जलकर मिट्टी की ऊपरी परत ढीली हो गई और आग के कारण कुछ चट्टानें भी फट जाती हैं। उन दरारों में पानी भर कर ढीली मिट्टी को बहाने का कारक बन जाता है। गांव के ऊपर से गुजरने वाली पेयजल पाइपें भी टूट कर त्रासदी को बढ़ने का कारक बनी हैं। ऐसी दो तीन पाइपों का पानी दो घराट चलाने योग्य होता है। इतना पानी भूस्खलन को कई गुणा बढ़ा सकता है।
इसके साथ ही यह भी पाया गया कि 2021 और इस बार के भी नुकसान में नई बस्तियां ही चपेट में आई हैं। अब लोग पुरानी बस्तियों को छोड़ कर जहां दिल किया वहां मकान बना रहे हैं, नदियों के बाढ़-खतरे के भीतर तक घुसते जा रहे हैं। बोह का घडसूण गांव जो इस बार त्रासदी की चपेट में आया है, उसी गांव की पुरानी बस्ती ठीक-ठाक है। इसलिए टीसीपी के तहत गांव में भी ज्यादा बारीकी न भी की जाए परंतु नए निर्माण स्थल का आपदा संभावित स्थल न होने का तकनीकी प्रमाण पत्र तो जरूरी किया ही जाना चाहिए, ताकि सारी जिंदगी की कमाई लगा कर बसाया बसेरा इस तरह ध्वस्त हो जाने का दर्द न सहना पड़े।
