तपती गर्मी और बेजुबान जिंदगियाँ
करुणा अब केवल विकल्प नहीं, आवश्यकता है
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बढ़ती गर्मी के बीच पशु-पक्षियों के लिए छोटी संवेदनाएँ कैसे बन सकती हैं जीवन का सहारा
डॉ. रीटा अरोड़ा
“मम्मी, ये चिड़िया बार-बार खाली गमले के पास क्यों आ रही है?”
बेटी ने बालकनी से बाहर झाँकते हुए पूछा।
माँ ने कुछ क्षण देखा, फिर धीमे स्वर में बोलीं –
“बेटा…
उसे शायद पानी की तलाश है।”
बेटी तुरंत रसोई में गई और एक छोटी मिट्टी की कटोरी में पानी भरकर बालकनी में रख आई।
कुछ ही देर बाद वह चिड़िया वहाँ आकर पानी पीने लगी।
शायद पहली बार एहसास हुआ कि हमारे लिए मामूली-सी लगने वाली एक कटोरी पानी, किसी बेजुबान के लिए जीवन और मृत्यु का अंतर बन सकती है।
गर्मियों का मौसम हर वर्ष आता है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में बढ़ती तपिश ने इंसानों के साथ-साथ पशु-पक्षियों के जीवन को भी गहरे संकट में डाल दिया है।
मई और जून की दोपहरें अब केवल गर्म नहीं रहीं, बल्कि कई जीवों के लिए संघर्ष का मौसम बन चुकी हैं।
हम इंसान तो ए.सी., कूलर और ठंडे पानी की सुविधा जुटा लेते हैं, लेकिन उन बेजुबान जीवों का क्या जो खुले आसमान के नीचे जीने को मजबूर हैं?
कंक्रीट के जंगलों में बदलते शहरों ने उनके हिस्से की छाँव भी छीन ली है।
पेड़ कटते जा रहे हैं।
तालाब और पारंपरिक जलाशय गायब हो रहे हैं।
और पानी की छोटी-छोटी जगहें भी अब सीमेंट और तारकोल से ढँकती जा रही हैं।
सबसे अधिक असर पक्षियों पर दिखाई देता है।
गौरैया, कबूतर, मैना और तोते जैसे पक्षी तेज धूप में पानी की तलाश में दूर-दूर तक उड़ते हैं। कई बार अत्यधिक गर्मी के कारण वे हीट स्ट्रोक का शिकार होकर जमीन पर गिर जाते हैं।
शहरों में अब उनके लिए सुरक्षित घोंसले भी कम होते जा रहे हैं।
लोहे की रेलिंग, टिन की छतें और गर्म दीवारें दोपहर में भट्टी की तरह तपने लगती हैं। ऐसे में अंडों और चूजों का बच पाना भी कठिन हो जाता है।
सड़क पर रहने वाले जानवरों की स्थिति भी कम दर्दनाक नहीं है।
तेज धूप में तारकोल वाली सड़कें इतनी गर्म हो जाती हैं कि उन पर नंगे पंजों से चलना तक मुश्किल हो जाता है। पानी और छाँव की तलाश में भटकते कुत्ते, गायें और बिल्लियाँ कई बार थककर सड़क किनारे बैठ जाती हैं।
दुखद बात यह है कि कई बार लोग उन्हें वहाँ से भी भगा देते हैं।
हम शायद यह भूल जाते हैं कि वे भी उसी धरती के जीव हैं, जिस पर हम रहते हैं।
उन्हें भी दर्द होता है।
उन्हें भी प्यास लगती है।
और उन्हें भी जीवित रहने के लिए दया और सहारे की आवश्यकता होती है।
भारतीय संस्कृति ने हमेशा सह-अस्तित्व का संदेश दिया है।
हमारे यहाँ पहली रोटी गाय के लिए और आखिरी रोटी कुत्ते के लिए निकालने की परंपरा केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं थी, बल्कि करुणा और साझेदारी का जीवन-दर्शन थी।
आज आवश्यकता इसी संवेदनशीलता को फिर से जीवित करने की है।
राहत की बात यह है कि समाज में अभी भी संवेदनशील लोग मौजूद हैं। कई संस्थाएँ “सकोरा अभियान” चलाकर लोगों को मिट्टी के बर्तन बाँट रही हैं ताकि छतों और बालकनियों में पक्षियों के लिए पानी रखा जा सके।
कई पशु-प्रेमी संगठन घायल और बीमार जानवरों के इलाज के लिए हेल्पलाइन चला रहे हैं। कुछ कॉलोनियों और सोसायटियों में आवारा जानवरों के लिए पानी की टंकियाँ और अस्थायी शेल्टर भी बनाए जा रहे हैं।
लेकिन केवल संस्थाओं के भरोसे यह काम पूरा नहीं हो सकता।
असल बदलाव तब आएगा, जब हर व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी समझे।
इसके लिए बहुत बड़े संसाधनों की जरूरत नहीं है।
एक मिट्टी का छोटा बर्तन,
थोड़ा-सा पानी,
और कुछ मिनट का समय –
इतना भी किसी बेजुबान की जान बचा सकता है।
हम अपने घर की छत, बालकनी या बाहर किसी सुरक्षित स्थान पर पानी रख सकते हैं।
मिट्टी के बर्तनों का उपयोग अधिक बेहतर होता है क्योंकि वे पानी को अपेक्षाकृत ठंडा रखते हैं।
यदि संभव हो तो पक्षियों के लिए दाना भी रखा जा सकता है।
छोटे पौधे और पेड़ लगाना भी उनके लिए प्राकृतिक आश्रय तैयार करता है।
यदि कोई जानवर धूप से बचने के लिए आपकी गाड़ी के नीचे या घर के बाहर बैठा हो तो उसे तुरंत भगाने के बजाय कुछ देर आराम करने देना भी मानवता है।
विशेष रूप से बच्चों को बचपन से ही पशु-पक्षियों के प्रति संवेदनशील बनाना बहुत जरूरी है।
जब बच्चे यह सीखते हैं कि पानी केवल इंसानों के लिए नहीं, हर जीव के लिए जरूरी है, तब समाज अधिक करुणामय बनता है।
आज की भागदौड़ भरी दुनिया में संवेदनाएँ धीरे-धीरे कम होती जा रही हैं।
लोग व्यस्त हैं, लेकिन शायद भीतर से थोड़े कठोर भी होते जा रहे हैं।
ऐसे समय में बेजुबान जीवों के प्रति दया केवल सामाजिक जिम्मेदारी नहीं, इंसानियत की पहचान है।
क्योंकि किसी सभ्य समाज की पहचान केवल उसकी ऊँची इमारतों से नहीं होती।
उसकी पहचान इस बात से होती है कि वह अपने सबसे कमजोर और मूक जीवों के साथ कैसा व्यवहार करता है।
अंततः, गर्मियों की यह तपिश केवल मौसम की परीक्षा नहीं है।
यह हमारी संवेदनशीलता, करुणा और मानवता की भी परीक्षा है।
शायद इसलिए…
एक कटोरी पानी,
एक मुट्ठी दाना
और थोड़ी-सी छाँव –
कई बार किसी बेजुबान के लिए पूरी दुनिया बन जाती है।
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लेखिका – डॉ रीटा अरोड़ा
