रमेश जोशी की लघु कथा – भक्त की हवाई चप्पलें

लघु कथा

भक्त की हवाई चप्पलें

रमेश जोशी

 

एक भक्त था । बहुत परेशान था । इतना परेशान कि कोई नीट का परीक्षार्थी भी पेपर लीक होने से नहीं हुआ होगा । 15 लाख और अच्छे दिन के जुमले पर आँख मींचकर वोट देने वाला भी इतना निराश नहीं हुआ होगा । उसे तो एक ही भरोसा, एक ही आस और एक ही विश्वास था । केवल राम का । जैसे अंधभक्तों को हर तीर्थ पर जाकर फ़ोटो शूट करवाने वाले अपने अजैविक नेता पर ।

भक्त रोज रामचारित का मास पारायण करता था । मंगलवार को एक टाइम खाना खाता था । हर बार भय लगने पर हनुमान चालीसा बाँचता था । उसे भूत पिशाच भगाने के लिए पुलिस से अधिक प्रभु पर विश्वास था । वह अपने मन की बात भी रेडियो पर नहीं बल्कि एकांत में प्रभु के साथ ही करता था । उसे विश्वास था कि भले ही अंतिम समय में ही सही लेकिन गजराज को मगरमच्छ से बचाने वाले भगवान विष्णु की तरह उसके आराध्य राम जरूर आएंगे ।

किसी तरह राम की कृपा से भक्त का जीवन कट ही रहा था क्योंकि उसकी कोई महत्वाकांक्षा नहीं थी । उसे न तो सोना खरीदना था, गाड़ी नहीं थी सो पेट्रोल डलवाने का चक्कर भी नहीं। विदेश यात्रा भी नहीं क्योंकि किसी देश का सर्वोच्च पुरस्कार भी नहीं मिलना था । लेकिन आज उसका धैर्य चुक गया क्योंकि बड़ा बेटा बी ए करके पिछले दस वर्षों से प्रतियोगी परीक्षा देते देते ओवर एज हो गया । इंसान से कॉकरोच बन गया । कल तो परीक्षा केंसिल होने के कारण एक विरोध प्रदर्शन में गया और पुलिस द्वारा अभिनंदित होकर टांग तुड़वाकर घर लौटा ।

भक्त तीर्थयात्रियों की भगदड़ में मरकर मोक्ष को प्राप्त करके ऊपर पहुँचा तो जाते ही अपने आराध्य पर बिफर पड़ा । बोला- प्रभु, मैं ही मूर्ख था जो आप पर विश्वास करके उल्लू बनता रहा । सब झूठ है कि आप अंत समय में ही सही भक्तों का उद्धार करने जरूर पहुंचते हैं । अजामिल को तो अपने बेटे नारायण का नाम लेने मात्र से ही कन्फ्यूज होकर आपके दूतों ने उसका उद्धार कर दिया । मैं आपको जाने कितनी बार पुकारता रहा लेकिन आप मणिपुर, युद्ध विराम, गाजा और ईरान में बच्चों के संहार की तरह चुप रहे । पुलिस भी चोरों के भाग जाने और अग्निशमन वाले सब कुछ राख हो जाने के बाद ही सही आ तो जाती है लेकिन आप …..?

राम भक्त की पीड़ा से द्रवित हुए और बोले- भक्त, मेरी मजबूरी समझो । मैं अब पहले की तरह स्वतंत्र नहीं हूँ । मुझे कुछ दुष्टों ने एक मंदिर में कैद कर रखा है । जनता के बीच तक नहीं जाने देते हैं । मैं तुम्हारी पुकार सुनकर आना चाहता था लेकिन क्या बताऊँ दुष्टों ने मेरी पादुकाएं ही चुरा लीं । और इतनी तेज धूप में नंगे पैर मेरे पैर जलने लगे थे । मुझे माफ करना भक्त ।

भक्त ने कहा- प्रभु, हवाई चप्पल वालों को हवाई यात्रा करवाने के वादे पर विश्वास करके खरीदी थी लेकिन वह भी अन्य वादों की तरह झूठा ही निकला । इन्हें पहन लें । घिसी हुई सही लेकिन पैरों को जलने से तो बचाएंगी ही ।

और भक्त ने अपनी हवाई चप्पलें रामजी के सामने रख दीं ।

 

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