ओमसिंह अशफ़ाक की कहानी : उनकी राह

अस्तित्व का संघर्ष’ और नतीजतन ‘सिस्टम से टकराव’ बहुत सीधा, सरल और सपाट नहीं है। यह बहुत जटिल, बहु-रेखिक और दूभर भी है। इसमें व्यक्ति को बहुआयामी संघर्ष करना पड़ता है। यहां व्यक्ति को एक सिस्टम और समाज से ही नहीं जूझना पड़ता बल्कि उसे “परिवार और अपने अंतर्मन में मचे द्वंद्व” से भी लोहा लेना पड़ता है। बहुकोणीय दबाव को झेलते हुए संघर्षरत व्यक्ति कई बार टूटकर बिखर जाता है और कई बार स्टील की तरह तपकर संघर्ष की भट्टी से बाहर आता है। शायद इसीलिए शहीद भगतसिंह और उनकी पीढ़ी के युवा क्रांतिकारियों ने गृहस्थ जीवन से खुद को दूर रखना मुनासिब समझा होगा? फिर भी इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि पुरुष वर्ग, स्त्री-जगत के सहयोग के बिना ही अकेला सामाजिक-क्रांति कर सकता है? यहां प्रस्तुत वरिष्ठ कहानीकार ओमसिंह अशफ़ाक की कहानी ‘उनकी राह’ ऐसी ही स्थिति से हमारा साक्षात्कार कराती है। यह कहानी 44-45 साल पहले के यथार्थ को बेशक ‘फेंटेसी’ की फॉर्म में ब्यान करती है लेकिन वैसे ही या उससे भी बदतर शोषण-दमन-उत्पीड़न के सैकड़ो क़िस्से आज भी हम अख़बारों की सुर्खियां बनते हुए देखते-पढ़ते हैं : संपादक।

 

कहानी

उनकी राह

ओमसिंह अशफ़ाक

 

“अब बस भी करो बाबू! इसी तरह फाइलों में सिर खपाते रहे तो दो-एक साल में आंखों पर चश्मे चढ़ जायेंगें।” रामदास चौकीदार की आवाज सुनकर तनिक चौंक जाता हूं। दफ़्तर की कमरे की दीवार पर टंगी बूढ़ी घड़ी की सुइयों में नज़र अटक जाती है। ” अच्छा, तो आठ बज चुके हैं?” खुद ही खुद से सवाल करता हूं।

“तुम क्यों इतनी सिरखपाई करते रहते हो? ई.टी.ओ. साहब और बड़े-बाबू (हैड-क्लर्क) भी कभी के चले गये हैं।” रामदास बताता है। फिर कनखियों से चारों ओर देखकर फुसफुसाता है रामदास, “आज तो गज़ब हो गया बाबूजी ! सेवाराम चपरासी छुट्टी पर था। सो, दिन के टैम भी बड़े-साहब के आफिस में मेरी डीवटी थी। ई.टी.ओ.साहब के कमरे से फाइल लेकर बड़े साहब के कमरे में घुसा, तो दंग रह गया…वो सेठ जी आया करते हैं ना, सफेद कार वाले वही थे। सौ-सौ के नीले नोटों की गड्डी साहब की दराज में रख रहे थे कि मेरी नजर पड़ गयी… मैं तो भौंचक्का रह गया बाबूजी-इतने सारे नोट देखकर। कभी सपने में भी नहीं देखे थे। खैर, हमें क्या बाबू । बड़े साहबों की बातें उन्हीं तक रहें- काहे अपना ईमान खराब करें हम!”

फिर रामदास विषय बदल देता है, “सुना है गौरमिंट महंगाई भत्ते की किस्तों से भी मुकर रही है… ओवरटाइम का भी कुछ नहीं बना दीखे !..और हां, परसों यूनियन की मिटिंग में क्या फ़ैसला हुआ बाबू ? क्या कहा, दुबारा लड़ाई लड़नी पड़ेगी, तब समझौता लागू हो पायेगा ?…अच्छा….सब मुकद्दर के खेल हैं बाबू…चलो, दो-ढेरी तो गुज़र गयी, एक तिहाई बचती है, सो भी रोते-पीटते बीत जायेगी! अपन तो लड़े थे- आजादी वास्ते। क्या पता था, रोटी की लड़ाई भी अलग से लड़नी होगी। अब हमसे तो कुछ बनता नहीं है, तुम्हीं पर भरोसा किये लेते हैं बाबू…” कहता हुआ वह कली(छोटा हुक्का) बायें हाथ में पकड़ गुड़गुड़ाने लगता है।…

सफेद कार का पहिया मेरे दिमाग में घूमने लगता है। कार के अंदर बैठे रॉयल लीकर एंटरप्राइजेज के मालिक सेठ एस.एस.ओबराय की शक्ल आंखों के सामने तैरने लगती है। लगता है, चुनौती दे रहे हैं श्याम सुंदर ओबराय, “क्लर्क के बच्चे, जरा संभलकर नोटिंग करना फाइल पर। टेढ़ा-तिरछा चला तो समझा लूंगा। तेरे साहबों की टांट पर तो चांदी का जूता मारना पड़ता है, लेकिन तेरी टांट तो चमड़े के जूते से ही नरम हो जायेगी…”

मन नफरत से भर जाता है। मुंह का कड़वा थूक निगल नहीं पाता हूं। फाइल वहीं मेज पर पटककर बाहर निकल आता हूं। साइकिल उठाकर घर की तरफ चल पड़ता हूं। पंक्चर हुई साइकिल घसीटता

हुआ दफ़्तर से घर लौटता हूं तो पत्नी बताती है कि छुटवा आज फिर अड़ गया, “…थिक्कल लगी निक्कर पहनकर स्कूल नहीं जाऊंगा। सारे बच्चे चिढ़ाते हैं…रोज कह देते हो, कल नयी निक्कर सिलायेंगे। कभी कहते हो यहां कपड़ा अच्छा नहीं मिलता। कभी कहते हो, महंगा मिलता है। कभी दर्ज़ी का बहाना…मैं तुम्हारी चाल समझ गया हूं। तुम मुझे यूं ही बहकाते रहोगे, कभी भी नयी निक्कर नही सिलाओगे।…कल टीटू कह रहा था- ‘अबे, तेरे पापा को तनखाह तो चार सौ रुपये मिलती है, नयी निक्कर कहां से लायेंगे? खुद तो फटे कोट के नीचे आधी-बाजू की बुशर्ट पहनकर दफ़्तर जाते हैं बेचारे। कल परसो का तो बहाना है। मेरी मम्मी कहती थी, तुम्हारे घर में तो रुपये ही नहीं हैं। कल तेरी मम्मी मिट्टी के तेल वास्ते, मेरी मम्मी से रुपये उधार मांगने आयी थी…’तुम पापा से कहतीं क्यों नहीं, ढेर सारे रुपये क्यों नहीं ले आते ? पांच-सौ हजार तनखाह क्यों नहीं बनवा लेते ? उतनी तनखाह में तो पांच निक्कर आ सकती हैं…”

पत्नी के मुंह से छुटवा की बड़ी बातें सुनता हूं, तो अंदर तक दहल जाता हूं। आंखों के ठेठ सामने पीली रोशनी का घेरा छा जाता है, तारे-से टूटने लगते हैं…अच्छा, तो छुटवा को भी हमारी गरीबी के जबरदस्ती छुपाये गये रहस्य का पता चल ही गया? लेकिन बुरा हुआ। उसे इतनी छोटी उम्र में ये बातें मालूम न होतीं, तो ही ठीक था। बचपन में ही शुरू हो जानेवाले बुढ़ापे से कुछ समय तक और बचा रहता। अभी खेलने खाने की उम्र है, चिंता का घुन उसे न खाये, तो ही अच्छा था- मैं सोचता हूं। मेरे छोटे अफ़सर ने उस दिन जो बात कही थी, उसकी याद ताजा हो जाती है:

“सोच लो, उदमीराम ! तुम तो किसी तरह गुज़ार लोगे, दुनियादारी की समझते हो ?… ठीक है, नौकरी क्लर्की की मिली है तो क्या, पढ़ाई तो एम.ए. तक की है, अर्थशास्त्र के नियम- सिद्धांत भी तुम्हें आते हैं, लेकिन मैं तो सिर्फ इतना जानता हूं कि बच्चों का भविष्य बरबाद न करो। सबको पता है कि इस महंगाई में तनख्वाह में गुज़ारा नहीं होता… जमाने को देखो और बदल जाओ। जो वक्त के साथ नहीं चलता, वह पिछड़ जाता है। जो तूफ़ान के रुख के ख़िलाफ़ उड़ता है, वह टूट जाया करता है…सोच लो, तुम्हारे फ़ायदे की कह रहा हूं। तुम अभी जवान हो, हर मुसीबत छू-मंतर लगती है। लेकिन एक वक्त आयेगा, तुम मेरी बात के मर्म को समझोगे। लेकिन तब तक देर हो चुकी होगी…”

“… नहीं साहब, मैं ‘इनफीरियारिटी कांप्लेक्स’ जैसी किसी चीज़ में विश्वास नहीं करता हूं। बच्चे पढ़ने में मेहनती और तेज हों तो इनफीरियारिटी-कांप्लेक्स कैसा?” मैं अड़ गया था। घर आकर डिक्शनरी देखी थी-“इन साइकोएनेलिसस, रिप्रैस्ड सैंस ऑफ इनफीरियारिटी”…और अपने आप से कहा था-नहीं, यह परिभाषा गलत है। झूठा वहम है। दरअसल, जो लोग खुद हालात से दो-चार होना नहीं चाहते, यह उन्हीं का घड़ा-मंढ़ा शब्द है। इंसान में कुछ कर गुज़रने का इरादा हो, तो क्या नहीं हो सकता?”

लेकिन आज मैं इतना क्यों टूट रहा हूं? छोटे से बच्चे की बातें मुझे क्यों ढ़हाये दे रही हैं? बच्चा सो चुका है, लेकिन मेरी आंखें अभी भी उसके चेहरे से कतरा रही हैं, लगता है, अभी उठ जायेगा, मुझसे भी वही सवाल करेगा- पापा,तुम ढेर सारे रुपये क्यों नहीं ले आते ?… ‘पांच सौ हज़ार’ तनख़ाह क्यों नहीं बनवा लेते ?…क्या जवाब हो सकता है, उसके सवाल का? कैसे समझा सकता हूं मैं उसे? मैं सोचने लगा हूं। कनपटी की नसें फड़‌फड़ाने लगती हैं। दायें हाथ के अंगूठे और चारों उंगलियों के बीच माथे की खाल को पकड़कर रगड़ता हूं।

अब तक पत्नी का गिलास ले आयी है। पानी पीने से कुछ राहत मिलती है। समय काफ़ी हो चुका है, रात पसरने लगी है। बाहर गली में कुत्ते भूक रहे हैं। पत्नी खाना ले आती है। रोटी खा नहीं, निगल रहा हूं। पेट में भरती जा रही हैं। पत्नी पूछ रही है, “अरहर की दाल कैसी बनी है?”

“ठीक है।” बिना सोचे ही मुंह से ज़वाब निकल गया है।

“तुम्हें क्या होता जा रहा है आजकल ? स्वाद तक का पता नहीं चलता ? आज भूल से नमक दो बार डल गया। क्या करूं, चित्त ठिकाने रहे तब न!” पत्नी खुद ही बताती है, “बच्चों ने तो खायी भी नहीं। रूखी रोटी खाकर ही सो गये हैं। गुड़ के लिए जिद्द करते रहे। पिछले हफ़्ते ही तो खतम हुआ है। छह दिन भी नहीं बीते, इतने में बेइज्जती करने लगे हैं। कौन-सा सस्ता है-तीन रुपये किलो देने लगा है हज़ारी भी… पिछले पैसे भी मांग रहा था। कह रहा था-‘सबको सात तारीख तक तनख़ाह मिल जाती है, आज तो पंद्रह तारीख़ हो गयी है?’…अब और नहीं रुकने का वह।

आधे-तिहाई तो देने ही होंगे। दुकान के सामने से गुज़रते हुए शरम आती है। बेअकल सबके सामने टोक लेता है….”

मैं हां-हूं करता जाता हूं। पत्नी विषय बदल लेती है, “अबकी अरविंद के बड़े ताऊजी बिमलेश का ब्याह भी करेंगे। हजार-पांच सौ वहां भी देने होंगें। उतने बिना तो लड़की के ब्याह में जाने का मुंह भी नहीं पड़ता। फिर, शादी में मंझली जेठानी भी तो आयेगी। अफ़सर की बहू है, अफसरनी कहलाती है। खैर, इससे हमें क्या? पर मुझसे तो उसका रोब नहीं सहा जाता। अफसरनी होगी तो अपने घर की, हम कौन-सा कुछ मांगने जाते हैं? फिर भी नकसा करती है। कुते-बिल्ली की आड़ में तान्ने कसती है-सोलहवीं तक पढ़ाया, तनखाह चार-सौ रुपल्ली। अपने ही पेट के जाले़ नहीं झड़ते-भतीजी के ब्याह में क्या अशरफी देंगें? अबकी दीवाली पर गये थे, तभी तान्ना कस दिया था। अब तो कुछ-ना-कुछ जुगाड़ करना ही होगा…”

“क्या जुगाड़ हो सकता है ?” मैं उत्सुक होकर पत्नी से जानना चाहता हूँ। वह दो पल के लिए दुविधा में पड़कर सोचती है।

“मेरी सुहाग की अंगूठी और कुंडल अभी बचे हुए हैं। उन्हीं को गिरवी रख दो।” पहले कई मर्तबा की तरह इस बार भी पत्नी सीधा-सा प्रस्ताव कर देती है।

“लेकिन एक-एक करके तुम्हारा सारा ज़ेवर निकल गया। कभी वापस लौटा पाये क्या ?” मैं पश्चात्ताप और खिन्नता से भरकर कहता हूं। कुछ देर के लिए पत्नी मन मसोसकर बैठ जाती है।

मैं उठकर खाट पर लेट जाता हूं। पत्नी संभावित खर्चे का मोटा-मोटा हिसाब फला़ रही है और उधर दफ़्तर में फिर हड़ताल के आसार बन रहे हैं। पिछली हड़ताल के दौरान ही थानेदार शैतानसिंह से काफी खिंच गयी थी। जलील कुत्ता आदमी है साला। जबसे धनपत सिंह गृहमंत्री बना है, तबसे तो इसने स्याह-सफेद में फर्क करना ही छोड़ दिया है। वरना क्या यूनियन की छोटी-सी लड़ाई के कारण ‘झोटे-बिजार’ वाली दुश्मनी साधी जाया करती है? उस दिन शराब के नशे में बके जा रहा था- “स्साला यूनियन का लीडर बनकर चौधरी धनपतसिंह की मुखालफत में राजनीति चलाना चाहता है। होम मिनिस्टर को बदनाम करके सरकार के ख़िलाफ़ बगावत करवाना चाहता है। सारे भूखे-नंगे इर्द गिर्द जोड़ लिये हैं। स्साले, होम मिनिस्टर से जवाब मांगते हैं- ‘बीस साल से मंत्री बनते आ रहे हो, इलाके का विकास क्यों नहीं हुआ ? बेरोज़गारी क्यों बढ़ रही है? महिलाओं पर बलात्कार क्यों हो रहे हैं? चोरी डकैती और कत्ल क्यों हो रहे हैं ?’ – मैं बताऊंगा क्यों हो रहे हैं। ऐसा कांटा निकालूंगा कि तुम्हारे सात पुश्तें याद रखेंगीं।… हरामजादो, मजदूर राज करेंगे तो काम क्या तुम्हारा बाप करेगा ?”

**

घर, दफ़्तर और इधर-उधर की बातें दिमाग में गड्‌ड‌मड्ड हो जाती हैं में जम्हाई लेने लगा हूँ। आंखें झपकने लगी हैं, नींद मुझे दबोच लेती है…माहौल में उत्तेजना और गर्मी है। दफ़्तर के मेन गेट के साथ वृनियन का तंबू गड़ा है। पास में ही स्टेज पर कर्मचारी नेता जोशीले भाषण दे रहे हैं। बीच-बीच में नारेबाजी चल रही है- कर्मचारी मजदूर भाई-भाई! लेके रहेंगें पाई-पाई!..जब तक भूखा, इंसान रहेगा! धरती पर तूफान रहेगा!…

राकेश भाषण समाप्त करके स्टेज से उतर रहा है। मेरा नाम स्टेज पर बोलने के लिए एनाउंस कर दिया गया है। मैं उठकर स्टेज की तरफ़ जा रहा हूं। स्टेज पर चढ़ने लगा हूं, तभी पत्नी पीछे से फटे कोट का पल्ला पकड़ लेती है, “नहीं जाने दूंगी…तुम तो शोर-शराबा करके पुलिस की लाठियां खा लोगे, जेल में बंद हो जाओगे। हम एक-एक रोटी को मोहताज हो जायेंगे. पिछली हड़ताल के दौरान कितनी मुसीबतें झेली थी, तुम्हें क्या ख़बर? तुम्हारी फरारी के दिनों में शैतानसिंह शराब के नशे में धुत हो, सिपाहियों को साथ लेकर, एक रात में तीन-तीन बार तलाशी लेने आया करता था। एक दिन तो बरतन भी उठाने लगे थे। उल्टी सीधी बकवास करता था। मुझे तो कमीने की नीयत ही माड़ी लगती है। दूसरो की बहू-बेटियों को तकता है। वह तो भला हो अलादीन दादा का, पुलसियों के बूटों की टाप सुनते ही, सारे मुहल्ले को जगाकर इक‌ट्ठा कर लाता था। उसके बाद तो हिम्मत नहीं पड़ती थी शैतान की कि आंख भरकर भी देख ले- जल-भुनकर वापिस लौट जाता था।…अपना न सही तो कुछ इन बच्चों का ही ख्याल करो। क्यूं हमें दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर करते हो? छोटे-छोटे मासूम हैं, कड़कती ठंड में भूख से मर जायेंगे..। मान जाओ..।”

“इसके अलावा कोई रास्ता भी नहीं है देवकी।” मैं पत्नी को समझाता हूं, “तुम समझने की कोशिश तो करो, इन मासूमों की जिंदगी के लिए ही तो हम जूझ रहे हैं।”

“नहीं-नहीं, अबकी मैं तुम्हारी बातों में बिल्कुल नहीं आने की। तुम्हारे अफ़सर तो कभी भी हड़ताल पर नहीं जाते? फिर भी उनके घरों में बेशुमार दौलत है। तुम मुझे बना रहे हो। मैं हरगिज हरगिज़ तुम्हारी बातों में नहीं आऊंगी।”

मैं समझाने की कोशिश कर रहा हूं, “अफसरों की बात छोड़ो देवकी ! वे शार्ट-कट रास्ते से चल रहे हैं। वो आम रास्ता नहीं है। वो रास्ता, सबका रास्ता नहीं हो सकता है। सैकड़ों झोंपड़ियां उजाड़कर वह रास्ता निकलता है देवकी-उसके निकालने में वे अनाज की फसलें तबाह होती हैं जिनसे हम सब पेट भरते हैं। यूं समझो कि सैकड़ों का हिस्सा छीनकर खुद हड़पने वाली बात है, वर्तमान और भावी पीढ़ी से गद्दारी है, इतिहास से धोखा है। तुम दूसरों के बच्चों का हक छीनकर खाना पसंद करोगी ?… बोलो !…बोलो..!!”

पत्नी अभी भी लिपटी हुई है, “तुम्हारी बातें मेरी समझ में नहीं आतीं। तुमने ही सारी दुनिया का ठेका ले रखा है क्या? तुम हरिश्चंद्र बने बैठे रहो, भूख हड़ताल करते रहो और लुटेरे लूटते रहें? हमारे बच्चे तिल-तिलकर गलते रहें और लुटेरों पर चर्बी चढ़ती रहे- यह कहां का इंसाफ है?”

“इसी अन्याय का खात्मा हम करना चाहते हैं देवकी, तुम समझ क्यों नहीं रही हो ?” मैं झल्लाहट में कह देता हूं।

तभी जलसे में खलबली मच जाती है। पुलिस के घोड़े दौड़ते आ रहे हैं…सब लोग नहीं भाग रहे हैं, बहुत सारे वहीं डटकर खड़े हो गये हैं…लाठीचार्ज शुरू हो गया है…हो हल्ला मच रहा है। कुछ भी साफ सुनाई नहीं देता है…मेरे सिर पर लाठी पड़ती है…आंखों के सामने तारे-से टूटने लगते हैं, फिर घुप्प अंधेरा छा जाता है।

अब मैं पुलिस हवालात में हूं। बदन दुख रहा है। सूरज डूबे देर हो चुकी है। शैतानसिंह चला आ रहा है। दो सिपाही साथ हैं। ताला खोलकर तीनों अंदर आ गये हैं।

“उथ्थ स्साले ! लीदर की दुम!” जूते की ठोकर मारकर शराब के नशे में धुत शैतानसिंह चीखता है।

“नीच-कुत्तो ! ये दमन हमेशा-हमेशा नहीं चलने का। हम भी इंसान हैं, अपना हक मांगते हैं- तुम्हारी तरह डाके नहीं मारते!” मैं सूखी जबान से बोल देता हूं। तभी दोनों तरफ से सड़ाक सड़ाक बेंत पड़ते हैं। मैं तिलमिला जाता हूं।…घसीटकर हवालात से बाहर निकाल लिया गया हूं। न मालूम ये ज़ालिम मुझे कहां ले जा रहे हैं।

“इंटेरोगेशन रूम ले चलो स्साले को।” शैतानसिंह सिपाहियों को हिदायत करता है।

मैं एक कमरे में धकिया दिया गया हूं। दरवाजा बंद कर गये हैं। कमरे में नीम-अंधेरा छाया है। कहीं कोई खिड़की रोशनदान दिखायी नहीं देता। थोड़ी देर बाद शैतानसिंह लौट आया है। सिपाही अब भी साथ हैं। दरवाजा खोलकर अंदर आ गये हैं। कमरे का बल्ब जल गया है, पर रोशनी अब भी सामान्य से कम है। मेरे हाथ पीठ-पीछे बांध दिये गये हैं।… एक सिपाही मेरे पायजामे का नाड़ा खोल रहा है। अमानुषिक-यंत्रणा की कल्पना से मैं सिहर जाता हूं। मुझे नंगा करके सिर के बल उल्टा लटका दिया गया है। बिजली की तारें मेरी नाक से छुआते हैं…असहनीय वेदना होती है।

…अब मुझे उतार दिया गया है। लकड़ी का मोटा डंडा मेरी गुदा में डालकर मथा जाता है…मैं चीख रहा हूं, तभी एक मोटा रोलर मेरी पिंडलियों के आर-पार रखकर दोनों सिपाही दायीं-बायीं तरफ़ उस पर चढ़ जाते हैं। मांसपेशियां फटने को हो जाती हैं…मैं तड़प उठता हूं।

“सत्तपुत्तर फिट करो स्साले को।” शैतानसिंह आदेश देता है। एक सिपाही गुथी हई मोटी रस्सी का घेरा मेरे सिर के चारों ओर डाल देता है। दूसरा सिपाही उसमें डंडा फंसाकर रस्सी ऐंठने लगा है…. मेरी खोपड़ी कसती जा रही है।

कड़..कड़..कड़ाक की आवाज़ होती है, मैं नीम बेहोशी में कराहने लगा हूं। लेकिन नहीं, वह तो मेरा बहम था। कल्पना का आवरण हट जाता है। योजना कुछ और है। अब समझ आने लगा है।..

पायजामे का नाड़ा निकालकर, छत से लटकते पंखे में फंदा बना लिया गया है। अब योजना साफ-साफ समझ में आ चुकी है। पर, हो सकता है, साइकोलॉजिकल टेरर दिखाकर आतंकित करना चाहते हों-मन में विचार कौंधता है। इस विचार से मैं और भी दृढनिश्चयी हो जाता हूं। लेकिन, ‘साइको टेरर’ का मेरा अनुमान गलत साबित हो रहा है…फंदे के नीचे स्टूल पर चढ़ाकर, मेरे गले में नाड़े का फंदा डाल दिया गया है। तभी शैतानसिंह स्टूल को जूते की ठोकर से गिरा देता है. मैं फंदे से झूल गया हूं। गर्दन लंबोतरी हो गयी है। आंखें पलट गयी हैं। जीभ बाहर निकल आयी है।

पुलिस के रिकार्ड में ‘आत्महत्या’ का केस दर्ज हो गया है। ‘पोस्टमार्टम’ की औपचारिकता पूरी की जा रही है। डाक्टर ‘आत्महत्या’ पर दस्तखत कर देता है।

लाश, मेरी वारिश पत्नी को सौंप दी गयी है। पत्नी विलाप करती हुई डकरा रही है। तीनों बच्चे आर्तनाद करके चिल्ला रहे हैं। शायद मौत का अर्थ ये भी समझ गये हैं।

अब तक दफ़्तर के गेटवाले जलसे का आलम मेरे घर में बन गया है। हड़ताली गैरहड़ताली, सभी कर्मचारी आ चुके हैं। मेरी लाश को उठाकर जुलूस चल पड़ा है… और अब थाने के सामने लाश रख दी गयी है। सभी हड़तालियों की आंखों में खून उतर आया है।

 

“खून का बदलाः खून से लेंगे” के नारे लगने लगे हैं। थाने को फूंक देने की आवाजें आनी शुरू हो गयी हैं। स्थिति बहुत नाजुक हो चली है..अगले ही क्षण कुछ भी हो सकता है।

बलदेव भीड़ को संयत करते हुए लंबे निर्णायक संघर्ष का आह्वान कर रहा है, इस कातिल व्यवस्था को ही उखाड़ फेंकने की बात कर रहा है। कह रहा है कि तभी ज़ुल्मों से निजात मिल सकती है। थाने से मुखातिब होकर बोल रहा है बलदेव, “.. यह भूख की आग है- जठरानल है। जरखरीद, पालतू कुत्तो ! इंसानों के खून से यह आग नहीं बुझा करती, कत्ले-इंसाफ से ये तूफ़ान नहीं रुका करते…!”

तभी भीड़ में फिर नारा गूंजता है- उदमीराम का बलिदानः बेकार नहीं जायेगा ! शहीद उदमी का खून रंग लायेगा..!!

 

“….सोच लो, शैतानो ! तुम इस आग में जलकर भस्म हो जाओगे, ख़ाक में मिल जाओगे!” बोलता हुआ बलदेव तकरीर समाप्त करता है।…

अब पत्नी बोल रही है। आंखें सुर्ख हैं, गला रुंध गया है, “मैं अपने पति की लाश के सामने प्रतिज्ञा करती हूं…मैं उनकी राह को आगे बढ़ाऊंगी…उनकी अधूरी लड़ाई को पूरा करके दिखाऊंगी….”

मैं एक बार फिर जिंदा होना चाहता हूं। मैं मौत को पराजित करना चाहता हूं। पत्नी से कहना चाहता हूं कि तुम्हारी प्रतिज्ञा मुझे कभी मरने नहीं देगी। मैं कभी नहीं मरूंगा। मैं हमेशा जिंदा रहूंगा। उदमी कभी नहीं मरा, उदमी कभी नहीं मरेगा। लेकिन मेरी लाश मुझे उठने नहीं दे रही है।

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“आज दोपहर तक सोये रहोगे क्या?…आटे का पीपा भी खाली पड़ा है…”पत्नी मुझे झिंझोड़ रही है।

मैं हड़बड़ाकर उठ जाता हूं। पत्नी को हसरतभरी निगाह से देखता हूं। आज मुझे उस पर अटूट भरोसा होने लगा है।

 

(‘कथन’ जुलाई-अगस्त,1982)

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