ओमसिंह अशफ़ाक की कहानी : आज का सच 

वरिष्ठ कहानीकार ओमसिंह अशफ़ाक की सभी कहानियों में समय का सच विद्यमान रहता है। यानी जिस कालखंड में कहानी रची गई उस कालखंड के नैतिक मूल्य, मर्यादा, शिष्टाचार, अनाचार, भ्रष्टाचार, रिश्ते-नातेदार सबकी एक जीवंत तस्वीर-जो जहां है, जैसा है- दिखाई पड़ती है। ‘आज का सच’ कहानी भी 45-46 साल पहले के हमारे समाज की एक ऐसी ही तस्वीर पेश करती है। सवाल यह है कि क्या आज के समाज की तस्वीर उससे कुछ भिन्न है या अभी भी वही सब बुराईयां हमारे समाज में मौजूद हैं? यदि हां, तो क्यों ? इसका जिम्मेदार कौन है ? ये और इस तरह के और भी कई सवाल प्रस्तुत कहानी पाठक के समक्ष लाकर खड़े कर देती है : संपादक।

कहानी

आज का सच

ओमसिंह अशफ़ाक

 

हुशियारे ने एक ईमानदार मुलाज़िम के रूप में नौकरी शुरू की थी। चौबीस साल की उम्र में जब पुलिस में भर्ती हुआ तो आदर्शवादी विचारों का दसवीं पास नौजवान था वह। लेकिन हालात तेज़ी से बदलते गये। वह व्यवस्था के शिकंजे में कसता-भिंचता गया। रोज़मर्रा का कटु यथार्थ उसे कचोटता समय की घड़ी को आगे बढ़ा रहा था। तभी एक दिन बस में सफ़र करते हुए हुशियारे के तीखे सामाजिक अनुभवों में एक अध्याय और जुड़ गया।

‘बस एक और कंडक्टर दो ?’ नहीं, यह उसका भ्रम था। कंडक्टर एक ही था, दूसरा तो ‘स्टाफ’ की हैसियत से सफ़र कर रहा था। उसे अगले डिपो से अपनी बस लेनी थी। वह था कंडक्टर ही, पर इस बस का नहीं।..टिकटें काट चुकने के बाद कंडक्टर ने सवारियां संभाली। तीन, छः, नौ-नौ अट्ठारह…पचपन। हां, पचपन सवारियां थीं गाड़ी में। अब वह फुर्सत में था।

“थोड़ा उधर खिसकना बाबू जी, सैड देखनी है,” कहकर कंडक्टर सबसे पिछली सीट पर खिड़की के साथ सटकर बैठ गया। एक बीड़ी उसने खुद सुलगाई, दूसरी स्टाफ वाले को दी और दोनो में बातचीत शुरू हो गयी।

“कौन-सा नम्बर उठाणा है ?”

“बारह पैंतीस।”

“आज तो गुरू चांदी कटेगी। एस टी सी (स्टेट ट्रांसपोर्ट कंट्रॉलर) आया हुआ है ट्यूरिस्ट कॉम्प्लेक्स में। सारे अफ़सर सेवा-पाणी में लगे हैं, कोई नी मिलना रूट पै?”- कंडक्टर ने स्टाफ की तरफ आंख मार कर कहा।

“नहीं यार, पिछला केस ही अब तक ठीक नहीं हुआ है,” झेंपते हुए स्टाफ ने उत्तर दिया।

बातचीत पिछली घटनाओं पर पहुंच गयी। “गलती तेरी ही थी। ‘फ्रॉड’ चल जाता है, पर ‘इशू’ के केस में पकड़ा जाये तो बच नहीं सकता ! मैं फ्रॉड बेशक कर लूं पर ‘इशू’ कभी नहीं करता। भई, कम-से-कम खुद को पता तो होता है कि कौन-कौन-सी सवारियां ‘विदाउट’ छोड़ रखी हैं ? देख…टांका लगाना हो तो अक्ल से काम लिया कर।…नया जी.एम.(जनरल मैनेजर) तो, भाई साहब ! माहिर है एकदम।

बताते हैं कि “शुरू में कंडक्टर की नौकरी भी की थी। फिर एग्जाम पास करके जी.एम. बना है! एक-एक पाइंट का पता है उसे; टांका कहां लगता है।…मैं फंस गया था एक दिन। कड़कती डांट पड़ी। मैं भी संभल गया; ‘जनाब ! गलती हो गयी…जो हुक्म हो…।’ ‘कल, दफ्तर हाज़िर होना !’ बस इतना कहा था कि मैं समझ गया। डेढ़-सौ का टांका लगा रखा था, सौ दे दिये। पहला चांस था वरना आधा-आधा हो जाता ।…और-तो-और अब तक वार्निंग भी नहीं मिली” बोलते हुए कंडक्टर ने बात पूरी की।

अगला स्टाप नजदीक आ चुका था। “प्याऊ पर उतरने वाले” पुकार कर कंडक्टर ने सीटी मारी। स्टाप पर उतरने वाली सवारियां अपनी सीटों से उठ खड़ी हुईं। बस का ब्रेक लगा और स्टाफ भी इसी स्टाप पर उतर गया।

“साला ऽऽ…चला आया कंडक्टरी करने। गाड़ी में पांच सवारी विदाउट थीं और इसको पता तक नहीं चल सका ! कंडक्टरी क्या ख़ाक करेगा?” एक अधेड़ उम्र सवारी की तरफ मुस्कुराते हुए कंडक्टर ने कहा। सवारी ने भी गालों तक मुस्कान फैलाते हुए मौन-सहमति में गर्दन हिला दी।

कंडक्टर बोले जा रहा था, “बाबूजी, डाकखाने में नौकरी लग्यो थो। तनखाह सवा-चार-सौ रुपए। महीने भर का खर्चा। तनख़ाह मिले एक दिन, ख़र्चा होवै तीस-दिन। ‘ऊपर का’ कुछ था नहीं। बताओ, कैसे गुजारा हो ? पिताजी रिटैर हो चुके। जो कुछ मिल्यो था, उससे दो कोठड़े बण सके सिरफ‌। फिर वही चक्कर ।…बहण ब्याहणे जोग्गी बैठी है, धोरै-धेल्ला नीं। मन्नै तो छोड़-छाड़ के बाबूगिरी, कंडक्टरी पकड़ ली। पिताजी कहते रहे बाबू की इज्ज़त होती है-कंडक्टरी ठीक नहीं। बाबू की इज्ज़त के धन -धन करेगी, जब बहण की इज्ज़त पैई खतरा हो ? इज़्ज़त तो पैसे की है दुनिया में। पैसा है तो सब सलाम करते हैं। वरना कोई नी पूछता।”

कंडक्टर के संवादों ने हुशियार सिंह के दिल में उथल-पुथल मचा दी। उसकी बातें उसकी वंशानुगत मान्यताओं को झंझोड़ गयीं। ईमानदारी और मर्यादा के आदर्श का किला, जिसकी बुनियाद पहले ही खोखली हो चुकी थी, भरभराकर बैठने लगा।’ क्या आज का सच यही नहीं है?’ वह सोचने लगा। कंडक्टर उसको आधुनिक युग का युवा-दार्शनिक प्रतीत हुआ। उसे लगा कि कंडक्टर खुद की नहीं बल्कि उसकी कहानी कह रहा है।…उसकी बेटी सुरती भी तो दो साल पहले जवान हो चुकी थी, पर आज तक बेटी के हाथ-पीले करने का जुगाड़ नहीं कर पाया वह। दो साल से शायद ही कोई ‘रेस्ट’ गया होगा जब वह लड़के की तलाश में न भटका हो। देखे भी बहुत। पर लोगों के मुंह चौपाल की तरह फटे हैं। ‘टिक्के पै क्या दोगे ?…अजी टेलीविज़न तो आजकल आम बात हो गयी है। एक रुपये की शादी सुनकर मुंह पिचका लेते हैं। स्वाद कड़वा हो जाता है, जैसे कच्चा करेला इनके मुंह में ठूस दिया हो। तिस पर फिकरे कसते हैं सो अलग “… अजी बड़ी कमाई है पुलिस वालों की तो… दोनों फरीकों से खाते हैं… इनकी तो एक डांट ही सौ-दो सौ रुपये दे जाती है।”…बड़ा ख़ुदग़र्ज़ जमाना आ गया है स्साला। आपाधापी मची है। लड़कों की भी बोली लगने लगी है। “फलां स्कूटर दे रहा था। पर म्हारा तो अभी विचार ही नहीं है शादी का।” चिकना चुपड़ा झूठ बोलते हैं मक्कार ! दूसरे की इज्ज़त और खानदान की तो परवाह ही नहीं रही किसी को ?

बापू का जमाना ही भला था। खाप की पंचायत ने कंट्रॉल की शादी का फ़ैसला कर दिया था। पर आज कोई मानता है पंचायत की बात ?

यूं बापू ने कौन कम पापड़ बेले थे? – उसे पुरानी स्मृतियां घेर लेती हैं। दस बीघे का ही तो खेत था। उसमें भी जमींदार अपनी जमीन से होकर पानी नहीं जाने देता था। एक बार तो बापू के खेत का रास्ता भी बंद कर दिया था। मज़बूर होकर ज़मींदार के पास ही खेत रेहन रखना पड़ा था। एक बार रख दिया, तो गया। बस ! क्या बापू कभी छुड़ा पाये ?

बाद में कहते हैं सरकार ने जमींदारी भी खत्म कर दी। चकबंदी भी हुई। पर क्या बापू की ज़मीन वापिस मिली ? आज जमींदारी की जगह फारम बन गये हैं। रंग-ढंग बदल गये, पर मालिक तो वही हैं। मशीनें नहीं थीं तो रैयत और मुजारे काम करते थे, अब ट्रैक्टर और थ्रैशर आ गये हैं।

क़िस्मत तो अपनी ही माड़ी है। बापू चाहते थे कि अच्छा-खासा पढ़-लिख कर कहीं हाकिम बन जाऊं। पर घर-गृहस्थी और पेट का चक्कर पढ़ने देता तब न। अब बीस साल से सिपाहीगिरी पीट रहा हूं। मुश्किल से एक ‘फीत’ लगी थी; ईमानदारी के चक्कर में वह भी उतर गयी स्साली … मुल्जिम को कचेहरी पेश करने की ड्यूटी सीताराम की थी, साथ में रवानगी मेरी भी कर दी।…. और मुल्जिम क्या मेरी गलती से फ़रार हुआ था ? फिर भी सजा दे दी। सीताराम की एस.एच.ओ. से सांठगांठ थी, तभी तो उसके हक में रिकार्ड पेश किया था !

बापू भी, ईमानदारी का पल्ला पकड़े मर गये। अब मैं नतीजा भोग रहा हूं। बीस साल से खट रहा हूं-लाइन में, थाने में या फिर अर्दली। थाने में एस.एच.ओ के कमाऊ-पूत ऐश करते हैं, दारू-मुर्गा उड़ाते हैं। और मैं चढ़ता हूं-सन्तरी ड्यूटी पर या फिर रात भर की गश्त पर। हजारों की आमदनी होती है रोज़ना थाने में। लेकिन मैंने कभी कुछ लिया ? आज लड़की की शादी कहां से करूं? कहां से धन लाऊं उनका मुंह भरने के लिए ?- इसी उधेड़-बुन में हुशियारे की आंख लग गयी।

अचानक बस का ब्रेक लगा। झटका लगने से उसकी झपकी टूटी। साथ बैठी सवारी से पूछा: “कौन-सा अड्डा है ?”

‘बैरियर”, उत्तर मिला।

“बैरियर!” हुशियारे के मुंह से विस्मयपूर्वक निकल गया।

उसे, जैसे बैरियर की ही तलाश थी। सूनी घाटी की तरह उसके दिमाग में अनंत तक गूंजता चला गया–बैरियर..बैरियर…बैरियर। हां, सुरती की शादी-का-बैरियर तभी हट सकता है जब वह ईमानदारी का पल्ला छोड़ कर, बैरियर पर ड्यूटी लगवाए। बैरियर उसे सुरती की शादी के लिए धन के विकल्प के रूप में दिखाई दिया। लेकिन बैरियर पर ड्यूटी लगे कैसे?

हुशियारे ने अंदर ही अंदर हौंसला जुटाया। आखिरी दांव फेंकने की कोशिश करने लगा वह। लेकिन यहां भी विरोधी विचार आड़े आये, ‘अगर घरवाली ने टूम-छल्ला न दिया, तो? आख़िर वही तो बुढ़ापे में औरत के स्वाभिमान और अकड़ का जरिया होता है। नालायक औलाद बुढ़ापे में दुत्कार दे, तब ? एक-एक रोटी के लिए मोहताज न हो जाये ?’

नहीं, वह मना नहीं करेगी- वह सोचने लगा। आखिर सुरती की शादी के लिए ही तो वह सबकुछ करना चाहता है। कौन मां अपने घर में जवान-कुंवारी बेटी को बैठी देख कर अपने गहनें न दे देगी।

**

सर्राफ ने खोट-खराबी काटकर दो हजार भेड़े। दसियों बार उजाल कर कसौटी पर रगड़ा तब जाकर मरे-मन-से कहा, “चलो रख लेते हैं चौधरी !…पुराणी चांदी सै, कम ही खेवै सै।…पर तू कौण गैर सै हुशियारे, तू तो अपणा माणस सै!”

हुशियारे ने एक बार फिर हिम्मत बांधी। सुबह-सबेरे एस.पी. साहब के बंगले पर पहुंचा और सौ-सौ के बीस नोट सामने रख कर हाथ जोड़ लिए, “साब बहादर, लड़की स्याणी हो गयी है, हाथ-पीले करना चाहता हूं। पास-पड़ौस के लोग चर्चा करने लगे हैं। पराया धन है, टेम-सिर बिदा हो जाये तो ठीक रहता है। जमाना खराब है, हवा उड़ते देर नहीं लगती। बस, इतनी अर्ज़ है कि बैरियर पर तैनात कर दें तो…।”

“तो…?” एस पी साहब गुर्राए।

“तो बड़ी मेहरबानी होगी जनाब की।” हुशियारा हिम्मत करके एक ही सांस में कह गया।

एक बार तो एस.पी. साहब भी सकते में आ गये। उनकी धारणा थी कि छोटे लोगों को मुंह लगाना अच्छा नहीं। लेकिन धार्मिक-वृत्ति के आधुनिक अफ़सर थे। ब्रह्म-मुहूर्त में घर आयीं लक्ष्मी का अनादर करना वे पाप समझते थे। वे हुशियारे द्वारा मेज के बीचोबीच रखे गये नोटों की गड्डियों से आँख बचाते हुए बनावटी-कठोर मुद्रा में बोले, “ठीक है?…” “ठीक है ?… कल आर्डर हो जाएंगे…जबान बंद रखना, समझ गये…?

“जी-जनाब”, हुशियारे के जुड़े हुए हाथ एक बार फिर कस गये थे।

अब हुशियारा बा-बर्दी बैरियर पर तैनात था। आते ही हाज़िर-रिपोर्ट भेज दी थी।

ट्रक आया और टेन्ट के सामने रुक गया। हुशियारा राइफल की बट पर जोर से हाथ मार कर चिल्लाया, “क्या है ?”

“भैंस हैं, हवलदार साब ! ड्राइवर ने जान-बूझ कर हवलदार कहा। हुशियारे ने और तेज डांट मारी, “पीछे कर…पीछे हटा…उल्लू का पट्ठा…बैरियर क्यों तोड़ा ? सरकार का कानून तोड़ता है? जेल भेज दूंगा साले…।” हुशियारे की कर्कश आवाज से ड्राइवर के साथ बैठे देहाती भैंसों के मालिक के दिल में तो हौल-सी बैठ गयी। उसे ड्राइवर की गलती पर गुस्सा आया और कानून टूट जाने का दुःख हुआ।

तभी ड्राइवर भैंसों के मालिक के साथ नीचे उतर आया। हुशियारे ने फिर ललकाराः

“कहां से लाये हो ?”

“मिलकपुर से।”

“कितनी भैंस हैं ?”

“तीन हैं, साब ?”

“हुलिया दिखाओ ?”

“होलदार जी, घर की हैं, मोल नहीं लाये।”

“सरपंच का सरटिफिकेट तो होगा?” हुशियारे के इस सवाल ने

देहाती को बिचला़ दिया।

“सो तो नहीं है, सरकार”, उसने उत्तर दिया।

“होता कहां से भैंस चोरी की जो हैं! कल रात हिम्मतपुर से जो चोरी गयी थीं, वहीं भैंस तो हैं ?”

देहाती सकपका गया, “नहीं साब, चोरी की नहीं हैं।”

“अच्छा ! बड़ा चुस्त बनता है ? अभी पता लग जाएगा। ट्रक समेत जेल भिजवाऊंगा!” इस बात से देहाती और भी सहम गया। उसकी कल्पना में जेल का नक्शा उभर आया। दसियों एकड़ जमीन को घेरे ऊंची-ऊंची दीवार हमेशा बंद नज़र आने वाला विशालकाय फाटक। फाटक पर जड़े, लोहे के मजबूत किवाड़ और उनके आगे संगीन-चढ़ी राइफल लिए चहल-कदमी करता सन्तरी। उसे सूझा कि जेल के बीचोंबीच बूढ़े पीपल के दरख्त पर पांच-सात गिद्ध बैठे हैं और उससे कोई थोड़ी दूरी पर एक गन्दी-अंधेरी कोठरी में वह हथकड़ी-बेड़ी में जकड़ा पड़ा है। उसने महसूस किया कि कोठरी के अंदर पाखाने-पेशाब की बदबू से उसका दम घुट रहा है और जेल के दरवाजे पर उसकी औरत और बच्चे उससे मिलने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं। धुड़-धुड़ी-सी लेकर उसने सिर हिलाया तो कल्पना का कवच टूटा, तसल्ली हुई कि वह अभी तक बैरियर पर ही खड़ा है।

अब हुशियारा ड्राइवर की तरफ मुड़ा, “इधर आ रै… कितने साल से ड्राइवरी करता है ?”

“दस साल हो गये, होलदार साब।”

“हरामजादे, दस साल में पुलिस के कायदे-कानून नहीं सीख पाया?”

आंख का इशारा करके हुशियारे ने डांट मारी। ड्राइवर देहाती को लेकर ट्रक के पीछे गया और पचास रुपये का नोट लेकर टेन्ट में घुस गया। दो मिनट बाद ही ट्रक बैरियर पार कर चुका था।

अब तक बैरियर पर ट्रकों की लंबी लाइन लग चुकी थी। भेड़-बकरियों से लदे ट्रक का नम्बर आया। मैं…मैं…की मिनमिनाहट। शायद बूचड़खाने जा रही थीं। हुशियारा गरजाः

“कागज दिखाओ ?”

“लो, साब।”

“कितनी भेड़ हैं ?”

“डेढ़-सौ हैं, जनाब।”

“नीचे उतार कर गिनती कराओ ?”

“साब, सचमुच इतनी ही हैं।”

इस दौरान हुशियारे की नजर ट्रक के अंदर दाखिल हो चुकी थी। वह जोर से चिल्लाया, “क्यों…रे काग़जों में जिंदा लिखी हैं, और लाद रखी हैं, मरी हुई ? गैर-कानूनी तरीके से लाश ले जाना चाहता है?”

“एक-दो धक्के लगने से मर गयीं होंगी, होलदार जी। बाकी तो सारी जिंदा ही हैं।”

“हमें कानून सिखाता है? वकालत करता है?..ओवर लोड क्यों किया ?…तभी तो मरी हैं!”

थोड़ी देर बाद इस ट्रक का ड्राइवर भी टेन्ट में गया और ट्रक बैरियर से पार हो गया।

अब अगले ट्रक की बारी थी।

“क्या है ?”

“परचून है, साहब।”

“परखी लगाओ!” हुशियारे ने सहायक से कहा। व्यापारी को पुराना अनुभव था, बिना आगे बहस किये सीधा टेंट में गया और चंद मिनटों में ट्रक पार। उसके बाद तो पुराने टायर, कबाड़ी का सामान, आलू, सीमेंट, प्याज और खल-बिनौला आदि से लदे-फदे ट्रकों के ड्राइवर अथवा मालिक टेंट में जाते रहे और नंबरबार बैरियर ‘पास’ करते गये। देर तक यह सिलसिला चलता रहा। हुशियारा ट्रक ड्राइवरों को डांट मारता, ड्राइवर क्लीनरों को गालियां देते और क्लीनर ट्रकों को। तरह-तरह-तरह की जुबान बोलने वाले लोग जुड़-बिछड़ रहे थे। इसी गहमा-गहमी में रात के नौ बज गये। अब कुछ देर के लिए बैरियर सूना था। ड्यूटी इंस्पेक्टर ने बोतल खोल ली। उसने एक पेग हशियारे की तरफ बढ़ाया। उसने थोडी आनाकानी की तो इंस्पेक्टर ने समझाया ” यहां बिना दारू के काम नहीं चलेगा हशियारे ?….मर जायेगा सूफी बण कै तो…साला काम ही ऐसा है।” दिन भर की थकान थी, इंस्पेक्टर की बात हशियारे को दुरुस्त लगी। पंद्रह मिनट में ही तीन पैग वह चढ़ा गया। तभी टेन्ट की झांकी से किसी वाहन की हेड-लाइट दिखाई दी। हुशियारा टैंट से बाहर आ गया। ट्रक को रुकवा कर सामने खड़ा हुआ तो ड्राइवर ने सौ का नोट हाथ पर रख दिया। तभी हुशियारे को तीखी-सी गंध आयी। उसे संदेह हो गया कि ट्रक में अफीम-गांजा है। “नीचे उतर, “वह बोला ही था कि ड्राइवर ने एकदम क्लच छोड़ दिया। हुशियारे को झटका-सा लगा और लड़खड़ा कर वह गिर पड़ा। ट्रक के पिछले पहिये ने उसकी छाती और सिर के चिथड़े कर दिये थे।

कुछ महीनों बाद सुनने में आया कि सुरती ने कुएं में कूदकर ‘आत्महत्या’ कर ली है, उसके पेट में जमींदार के बेटे सरपंच का गर्भ पल रहा था। पुलिस जांच के मुताबिक “…सुरती को पागल-पन का दौरा पड़ता था…मौत के कारणों में संदेह की गुंजाइश नहीं है… इसलिए केस दाखिल-दफ़्तर (रफा-दफ़ा) किया जाता है…।”

(‘जनयुग’, नई दिल्ली, 19 जुलाई 1981)

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नोट : आज के नौजवान पाठकों को उस ज़माने के ₹50-100 की रकम नगण्य लग सकती है। क्योंकि रुपए का बहुत ज्यादा अवमूल्यन हो गया है। मध्यवर्गीय व्यक्ति के लिए उस वक्त ₹50-100 भी बड़ी रकम होती थी।

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