ज्ञान विज्ञान ही खोलेंगे अंधविश्वासों की पोल

ज्ञान विज्ञान ही खोलेंगे अंधविश्वासों की पोल

मुनेश त्यागी

हमारी मानवजाति हजारों साल से अंधविश्वासों, धर्मांधताओं, अविवेकशीलता और तर्कहीनता व ढपोरशंखी मान्यताओं की शिकार रही है। उसे बहुत तरह की जनविरोधी मान्यताओं द्वारा लूटा, पीटा और ठगा जाता रहा है, उसे मूर्ख बनाया गया है, उसे बौध्दिक रूप से लंगडा, लूला और बौना बनाये रखा गया है। मगर पिछले तीन सौ साल की वैज्ञानिक संस्कृति, सोच व प्रगति ने उसके ज्ञान के चक्षु खोले हैं, उसके डर और वहम को दूर किया है। औरतों को तो उसने बहुत से कष्टों और लांछनों से निजात दिलायी है। जरा देखिए कि विज्ञान ने पूरी मानवजाति को बहुत से दुख, दर्द, अंधविश्वासों और समाज में प्रचलित कूप्रथाओं से मुक्ति दिलाई है। विग्यान ने मनुष्यों और महिलाओं पर बहुत सारी मेहरबानियां की हैं। विज्ञान की कुछ उपलब्धियों का विवरण इस प्रकार है….

विज्ञान ने बताया कि बच्चे आदमी और औरत के सहयोग या मिलन के बगैर पैदा नही हो सकते हैं। वे औरत के गर्भाशय से ही पैदा हो सकते हैं। बच्चे नाक, कान, आंख या हाथ पैरों से पैदा नही हो सकते हैं। साइंस ने ही जानकारी दी है कि बच्चे सेव या दूसरे फल खा लेने से पैदा नही होते हैं। विज्ञान ने ही बताया है कि लडका या लडकी पैदा करने के लिए औरत जिम्मेदार नही है। यह सब XY क्रोमोसोम्स के मिलन से होता है। औरतों में XX क्रोमोसोम्स होते हैं और पुरुषों में XY क्रोमोसोम्स होते हैं, जब आदमी का X क्रोमोसोम महिला के X क्रोमोसोम से मिलता है तो लडकी पैदा होती है और जब आदमी का Y क्रोमोसोम औरत के X क्रोमोसोम से मिलता है तो लडका पैदा होता है। तो देखा आपने, लडका पैदा करने की असली जिम्मेदार आदमी है, औरत नही। यहीं पर यह बताना भी उचित होगा कि लडका या लडकी पैदा करने में किसी देवी देवता या ओझा, मुल्ला, पंडा का कोई हाथ नही है।

विज्ञान ने बताया कि कोई भी ताला, जेल का या घर का, बिना चाबी के और अपने आप नही खुलता व बिना खोले नही खुल सकता। साइंस आगे कहती है कि कोई भी पत्थर पानी पर नही तैर सकता। अतः खुद ताला और फाटक खुलने की बात और पत्थरों से पुल बनाने की बात केवल कल्पना भर है। हकीकत में ऐसा नही होता। अगर ऐसा हो सकता तो फिर लोहा, रोडी, बदरपुर, सीमेंट और रेत की क्या जरूरत होती?

विज्ञान की जानकारी आगे बढ़कर कहती है कि आदमी हवा में या आकाश में, बिना किसी वाहन के नही उड सकता। वह हवाई जहाज या हैलीकॉप्टर की मदद से ही हवा या आसमान में आवागमन कर सकता है, अतः पुराने जमाने में हवाई जहाज या हवाई वाहन का बताना या होना मुमकिन ही नही है। ये सिर्फ आदमी की हसीन कल्पनायें ही थीं।आधुनिकतम मानव ज्ञान यह भी कहता, बताता है कि कोई भी आदमी एक निश्चित सीमा से ज्यादा वजन उठा ही नही सकता। अतः किसी बंदर द्वारा किसी पहाड, पर्वत या उसकेे खंड को उखाड़ कर हवा में उड पाना और उसे किसी दूसरे स्थान पर ले जाना मुमकिन ही नही है।

विज्ञान और मानव ज्ञान यह भी कहता है कि कोई भी नदी किसी देवी देवता की या भगवान की जटाओं या उसके सिर से नही निकल सकती। भारत समेत दुनिया की तमाम नदियों का उदगम ऊंचे पहाडों और पर्वतों पर जमे बर्फ के पिघलने से होता है, जो पानी की धार की शक्ल में नदी का रूप धारण कर लेता है। वैसे भी कोई भी बडी नदी गंगा, जमना, सिंधु, ब्रह्मपुत्र, अमेजन, नील, मिसौरी, मिसिसिपी, मास्कवा आदी कई कई छोटी नदियों से मिलकर बडी नदी का रूप और आकार ग्रहण करती हैं। कोई भी नदी किसी देवता या देवी की कृपा, मेहरबानी से नही निकलती है।

हमारी वैज्ञानिक जानकारी कहती है कि कोई भी तीर एक निश्चित दूरी से आगे नही जा सकता, ऐसा कोई भी तीर या तीरंदाज़ नही हुआ जो दुनिया के सारे पेडों के सभी पत्तों का बींधकर वापस आ जाये और यह बात भी निश्चित है कि कोई भी तीर एकबार कमान से निकलने के बाद वापस तरकस में आ जाये।

हमारा विज्ञान कहता है कि कोई भी मर्द, बच्चा या औरत एकबार आग में डालने के बाद जिंदा वापस नही आ सकता, हां कल्पनाओं में आदमी ऐसा जरूर सोच सकता है। हमारा ज्ञान विज्ञान कहता है कि एक बार मर जाने या शरीर से प्राण निकलने के बाद, कोई भी आदमी या औरत या अन्य कोई जीव जन्तु पुनः जीवित नही हो सकता। हमारा विज्ञान हमें आगे भी जानकारी देता है कि कोई भी आदमी किसी पहाड या पर्वत को अपनी उंगली पर नही उठा सकता। ऐसा मानना सिर्फ और सिर्फ कोरी कल्पना और अंधविश्वास और अज्ञान ही हो सकता है।

हमारी साइंस हमें जानकारी देती है कि हमारी पृथ्वी स्थिर नही है बल्कि व बुध, शुक्र, मंगल, वृहस्पति, शनि, अरुण, वरुण और यम के साथ सूर्य के चक्कर लगाती है और हमारा सूर्य खुद घूमते हुए इन नौ ग्रहों के साथ सौर मंडल के चक्कर लगाता है। यह बात कोपरनिकस और ज्यार्दन ब्रूनो पहले ही सिध्द कर चुके हैं। हमारा विज्ञान यह भी बताता है कि सूर्य और चंद्र ग्रहण में राहू और केतू का कोई रोल ही नही है, वास्तव में ये राहू और केतू कोई ग्रह ही नही हैं। ये पेट पूजा के लिए और लोगों को धोखा देने और डराने के लिए दो काल्पनिक ग्रह हैं, जो सूर्य और चंद्र ग्रहण के अवसर पर जिंदा हो उठते हैं। है ना कमाल की बात?

हमारा विज्ञान यह भी कहता और बताता है कि ऐसा कोई धनुष बाण नही है कि जो धरती में मारने पर धरती में से पानी निकालना शुरू कर दे। ऐसा किस्सों, कहानियों में तो हो सकता है, मगर हकीकत में ऐसा कदापि नही हो सकता। अगर ऐसा हो सकता तो फिर बोरिंग या समर्सिबल लगवाने की क्या जरूरत थी? बाण धरती में मारो और पानी की धार धरती से फूट पड़ेगी।

हमारा विज्ञान और हमारा ज्ञान हमें बताते हैं कि ऐसा सम्भव ही नही है कि कोई पैर, दैवीय या अन्य ,पत्थर को छू दे और वह पत्थर हमारे सामने औरत बनकर खडा हो जाए। बहुत से अंधविश्वासों ने हमारे समाज के अंदर यह बात बहुत गहरे से बैठा रखी है कि बच्चे या बच्चियां किसी खुदा या भगवान की देन हैं और वे उसकी मर्जी से होते हैं। हमारा विज्ञान हमें जानकारी देता है कि आदमी परिवार नियोजन के लिये नसबंदी, निरोध या दूसरे उपाय अपना कर जब चाहे, तब बच्चे पैदा करने पर रोक लगा सकता है और बच्चे पैदा होने से रोके जा सकतें हैं। अतः बच्चे पैदा करने में भगवान का हाथ होने की मान्यता को हमें सिरे से ही खारिज कर देना चाहिए।

हमारे विज्ञान ने यह सिध्द कर दिया है कि यहां चमत्कार होने की बात में कोई सच्चाई नही है। यहां कभी भी कोई चमत्कार नही हुए हैं, हां चतुर और स्वार्थी लोगों ने समाज में फैले अज्ञान का फायदा उठाकर, आदमी को बहुत मूर्ख बनाया है। गजब यह है कि आज भी करोडों लोग इन्हीं चमत्कारों के बहाने ठगे जा रहे हैं। क्या कोई आदमी बता सकता है कि यहां विज्ञान और चमत्कारों के बीच कभी कोई सम्बंध रहा है?

हमारा प्यारा विज्ञान हमें जानकारी देता है कि कोई भी आदमी या औरत न तो आग खा सकते हैं और ना ही कोई सूरज को निगल सकता है। हमारे सूरज का तापमान छ हजार डिग्री सेल्सियस से भी ज्यादा है अभी तक वहां कोई भी आदमी जिंदा नही पहुंच पाया है, इसीलिए आग खाने या सूर्य को निगल जाने की बात एक पक्का अंधविश्वास ही कहा जायेगा। हम यहां सूर्य के बारे में थोडी जानकारी देना चाहते हैं हमारी पृथ्वी का ब्यास करीब 12,700किलोमीटर है। हमारी पृथ्वी का भार 66,00,00,00,00,000 अरब टन है। सूर्य का ब्यास पृथ्वी से 109 गुणा बडा है। हमारा सूर्य इतना बडा है कि इसमें हमारी पृथ्वी जैसे 13,00,000 पिंड समा सकते हैं। यह पृथ्वी से 3,30, 000गुणा भारी है। अब आप देखिये कोई आदमी या बंदर सूरज को कैसे निगल सकता है, इसका मतलब वह आदमी या बंदर सूरज से कई गुणा बडा ही होगा। क्या ऐसा होना संभव है? क्या यह सूरज को निगलने वाली बात निरा झूठ और कोरा गप्प नही है? इस प्रकार हम देखते हैं कि यह दुनिया के लोगों को मूर्ख बनाये रखने की एक बहुत बडी साजिश का ही हिस्सा है।

हमारे मैडिकल साइंस का विस्तृत ग्यान कहता है कि पर्याप्त दवा के बिना कोई भी रोग ठीक नही हो सकता है और किसी भी बीमारी को बिना औषधियों के ठीक नही किया जा सकता है। कोई भी रोग, मंत्र मारने या हवा फूंकने या राख की पुडिया या पढा हुआ पानी देने से ठीक नही हो सकता है। हां यह जरूर है कि आज भी करोडों लोग इस बीमारी से ग्रस्त हैं और अपनी ठीक हो सकने वाली बीमारियों को लाइलाज बनाकर, असमय मौत के गाल में समाकर, समय से पहले मरने पर तुले हुए हैं।

हमारे यहां करोडों लोग यह माने बैठे हैं कि हमारी पृथ्वी शेषनाग के फन पर या गाय के दो सींगों पर टिकी हुई है और जब गाय सींग हिलाती है तो हालन या भूचाल आते हैं। हमारा विज्ञान हमें जानकारी देता है कि हमारी पृथ्वी किसी सींग या फन पर नही टिकी हुई है, बल्कि वह भौतिकी के नियमानुसार अपनी धुरी पर घूमते हुए सूरज के चक्कर लगा रही है और सदैव ही गतिमान स्थिति में बनी रहती है। वह अन्य ग्रहों की भांति भौतिकी के नियमानुसार स्पेस में बनी हुई है और ऐसा गुरुत्वाकर्षण के नियमों के तहत हो रहा है। यहीं पर एक हकीकत देखिये हमारी पृथ्वी का भार 66,00,00,00,00,000, अरब टन है। क्या भारत को तो छोडिये, दुनिया में ऐसा कोई सांप या गाय हो सकती है कि जो 66 खरब अरब टन वजन अपने फन या सींग पर उठा ले? हमारे बहुत से लोग हैं कि जो इसे सच माने बैठे हुए हैं। अब इससे ज्यादा बुध्दि का दिवाला निकलना और क्या हो सकता है?

हमारा विज्ञान हमें बताता है कि आधुनिक मैडिकल साइंस से पहले दुनिया को सर्जरी की जानकारी नही थी और भूतकाल में सर्जरी होने के कोई प्रमाण मौजूद नही हैं। सबसे बडे आश्चर्य की बात कि एक हाथी का सिर एक बच्चे के सिर पर कैसे लगाया जा सकता है? क्या पहले सर्जरी के औजार मौजूद थे, खून को जांचना संभव था क्या? वैग्यानिक जानकारी कहती है कि दैवीय या किसी पौराणिक मान्यताओं के हिसाब से भी बच्चे के सिर पर किसी हाथी का सिर लगा देना या प्रत्यारोपित करना किसी के भी वश में नही था और ऐसा हो सकना बिल्कुल ही नामुमकिन है। अतः ऐसे किस्से कथा कहानियों में ही चल सकते हैं। यह वर्तमान साइंस के नियमों के तहत किसी हिसाब से भी मुमकिन नही है। हमारे समाज की समस्या यह है कि हम इन कथाओं को आज भी सच माने बैठे हुए हैं और ये बातें हमारे जीवन का और सोच का अभिन्न हिस्सा बनी हुई हैं।

एक और समस्या हमारे समाज में घर किये बैठी है कि आदमी मरने के बाद फिर से जिंदा हो जाता है, मगर हमारी वैज्ञानिक जानकारी कहती है कि मरने के बाद या प्राण निकलने के बाद, कोई भी आदमी, जीव, जंतु या पेड पौधे जिंदा नही हो सकते, क्योंकि जब आदमी के प्राण निकल जाते हैं तो उसके शरीर की सारी कोशिकायें भी मर जाती हैं और मरने के बाद पुनर्जीवन के चांस नही रह जाते हैं।

हमारी पौराणिक कथाओं में यह भी आता है और यह हमारी मान्यता और सोच का अभिन्न हिस्सा भी है कि हमारी पृथ्वी शेषनाग के फन पर टिकी हुई है और वह सांप इसे आज भी उठाये हुए है। है ना कमाल की बात? दुनिया में ऐसा कौई सांप नही है कि जो धरती के बोझ को उठा सके। सारे सांप मिलकर भी ऐसा नही कर सकते। मगर हम हैं कि हम इसे सच माने जा रहे हैं कि हमारी पृथ्वी शेषनाग के फन पर टिकी हुई है।

और भी देखिये हमारी झूठी मूठी तर्कविहीन मान्यतायें आजादी के सत्तर साल बाद भी बदस्तूर जारी हैं। समाज की मान्यता है कि राहू और केतू अभी भी जिंदा हैं। जबकि किसी प्राणी या आदमी का सिर धड से अलग होने पर वह जिंदा नही रह सकता और तत्काल मर जायेगा.। हमारा विज्ञान कहता है कि आजतक के मानव ज्ञान में ऐसा कोई पेय पदार्थ नही है कि जिसे पीकर कोई आदमी जीवित रह सके। राहू और केतू में से एक के पास धड नही है और दूसरे के पास सिर नही है, मगर उन्हें जिंदा ही माना जाता रहा है। मगर हम कैसे माने कि वे आज भी जिंदा हैं। हम हैं कि अपनी बेसिरपैर की मान्यताओं से उन्हें जीवित माने बैठे हैं। हम किसी तर्क, विवेक या लोजिक को मानने को तैयार ही नही हैं, जग हंसाई होती है तो होती रहे।

और भी देखिये जैसे हमारी बुध्दि पर पत्थर ही पड गये हों। कोई भी आदमी जलने फुंकने के बाद जिंदा कैसे रह सकता है, पर हम हैं कि कूप्रथाओं को ढोये जा रहे हैं। यह सब जानने मानने के बाद कि जलने के बाद कोई कोई भी जीव जन्तु जीवित नही रह सकता, हम हर वर्ष रावण को, मेघनाथ और कुम्भकरण को जला देते हैं। मगर वे फिर फिर जिंदा हो जाते हैं। यही हाल होली का है, हम हर साल करोडों टन लकडी जला डालते हैं और पर्यावरण को भयंकर रूप से प्रदूषित कर देते हैं वह अलग, मगर कूप्रथायें और मानसिक विकृतियां आसानी से थोडे ही मरती है।

हमारे समाज में दोजख और जन्नत की भी बडी लंबी चौडी बातें होती हैं और लोग हैं कि इन बातों को लेकर बिल्कुल ही मुतमईन हैं और इन्हें सच ही माने बैठे हुए हैं। उनमें से सभी को पक्का यकीन है कि जन्न्त और स्वर्ग में हूरों और गिलमान व अपसराओं का रेला लगा हुआ है और वहां बस मजा ही मजा है, चारों जानिब आन्नद ही बिखरा पडा है। किसी को कुछ भी करने की जहमत नही उठानी पडती है, वहां सब कुछ बिना कुछ किये धरे ही फराहम हो जाता है, वहां दूध और घी की नदियां बहती हैं।

कमाल की बात यह भी है कि इस जन्नत और दोजख व स्वर्ग नरक को किसी ने देखा भी नही है, यह कहां है, कौनसी दुनिया में है, इसका हदोदरबा क्या है? इन सवालों पर कभी कोई बहस नही होती, बस हम हैं कि विश्वास किये जा रहे हैं बेसिर पैर की बातों पर। और भी कमाल देखिये कि इसे हासिल करने या इसमें प्रवेश पाने के लिए हमें धर्मांधों द्वारा ख्वाब दिखाये जा रहे हैं और हम ख्वाब देख रहे हैं। और भी गजब की मानसिकता देखिये कि इन्हें पाने के लिए या इनमें प्रवेश करने के लिए लोग कैसी भी हिंसा या अपराध करने पर आमादा हो रहे हैं, दुनिया के विभिन्न हिस्सों में इस महा विकृति को देखा जा सकता है, हिंदू,, मुस्लिम, इसाई, बौध्द, सिख धर्म के लोग कोई पीछे नही है। क्या पढा लिखा, क्या अनपढ सब के सब इस महामारी से गंभीर रूप से पीडित हैं।

हमारे अधिकांश लोग स्वर्ग नरक के होने में और उनकी मौजूदगी में पूरा विश्वास किये बैठे हैं। कहां स्थित हैं स्वर्ग नरक ? इनकी परिसीमा क्या है, इनके आसपडोस में कौन से नगर या बस्तियां हैं, पूरे ब्रह्मांड में ये कहां मौजूद हैं? किसी को नही पता। सबके सब झूठ बोल रहे हैं, इनको किसी ने नही देखा, हम में से कोई भी वहां नही गया और ना ही वहां से लौटकर कोई आया है आज तक, पर हम हैं कि हजारों साल से ऐसा ही मानते आ रहे है। हमारा विज्ञान कहता है कि अभी तक ब्रह्मांड में ऐसी कोई जगह नही है कि जहां मानव रहते, बसते हों या अन्य कोई मानवीय बस्ती हो।

आज भी हमारे देश में करोडों लोग हैं जो यह मानते हैं कि टोने टोटके करने से हमारी समस्यायें, हमारे दुख दर्द, रंज-ओ-गम दूर हो सकते हैं। हमारा विज्ञान कहता है कि टोने चोटकों से कुछ नही होने वाला है। यह सिर्फ मन का वहम है जो एक मानसिक बीमारी में तबदील हो गई है जिसका हकीकत से कुछ भी लेना देना नही है, इनके करने से किसी रोग के ठीक होने या किसी समस्या का समाधान होने या न होने से कोई वास्ता नही है।

हमारे समाज में आज भी ऐसी ही ढेरों सारी मान्यतायें, अंधविश्वास, निराधार बातें और सोच मौजूद हैं कि जिनका कोई आधार नही है, कोई वैग्यानिक तर्क नही है, मगर हम उन्हें दैवीय मानकर उनसे चिपके पडे हैं और ऊटपटांग काम किये जा रहे हैं। दरअसल हमारा लुटेरा शासक वर्ग चाहता ही नही कि हमारी धर्मभीरू जनता इन अंधविश्वासों, कुतर्कों, धर्मांधताओं और अविवेकशीलता व अवैज्ञानिक सोच से मुक्ति पाये, वह दिमागी रूप से अपने पैरों पर खडी हो, उसका नजरिया और संस्कृति वैज्ञानिक बनें।

वह चाहता है कि हमारी जनता इन्हीं टोने टोटकों और अंधविश्वासों में चिपकी रहे और मानती रहे कि उसके भाग्य में यही बदा है, यही लिखा है, यह सब ऐसे ही चलता रहे। हमारा शासक और शोषक वर्ग उन तमाम हालातों को और सोच व संस्कृति को बनाये रखना चाहता है जो अंधविश्वासों, अवैग्यानिकताओं को जन्म देते हैं।

पूरी दुनिया भगवान, ईश्वर, अल्लाह, गॉड, खुदा से भरी पड़ी है। दुनिया की अधिकांश जनता का मानना है कि यह दुनिया भगवान ने बनाई है, देवी देवताओं ने बनाई है। मगर यहीं पर यह सवाल करना भी सबसे ज्यादा जरूरी है कि भगवान, अल्लाह, खुदा गौड़ को किसने बनाया है? कब बनाया है? उनके मां-बाप कौन है? वह कहां रहते हैं? क्या करते हैं? यह बेहद आश्चर्य की बात है कि इस बारे में कोई कुछ बताने को तैयार नहीं है। वह इसलिए कि ये सब कोरी काल्पननायें हैं। भगवान और देवी देवताएं सिर्फ और सिर्फ कोरी काल्पनिक कल्पनाएं हैं। इनका इस पूरी दुनिया में कोई अस्तित्व नहीं है। दुनिया की शोषणकारी व्यवस्था ने इस कोरी कल्पना को जान पूछ कर गढा है ताकि जनता को अपने शोषण, जुल्म, अत्याचार और मनमानी का शिकार बना कर रखा जा सके।

उपरोक्त के आलोक में हम तो यही कहेंगे कि जो समाज, सरकार और शोषक लुटेरा वर्ग इन जनविरोधी इस सोच से लाभान्वित हो रहा है, वह कभी भी नही चाहेगा कि हमारी जनता इन अंधविश्वासों, धर्मांधताओं और भाग्यवादी मान्यताओं और सोच से बाहर निकले। यही कारण है कि आजादी प्राप्ति के उनासी साल बाद भी हमारे राष्ट्र और राज्य ने ऐसा कोई काम नही किया है कि हमारी जनता अंधविश्वासों और अज्ञानता की इस दलदल से बाहर निकले, उसका नजरिया और नजर वैज्ञानिक बने या वैज्ञानिक संस्कृति और धर्मनिरपेक्ष संस्कृति विकसित हो। वह ऐसा कुछ भी नही करेगी। वह यही चाहती है कि हमारी जनता अंधविश्वासों और अवैज्ञानिकता व धर्मांधताओं की भूलभुलैयाँ में बहकी रहे।

जनता के हमदर्दों, अब हम जनता के मित्रों और हमदर्दों की जिम्मेदारी बनती है कि इस काम को हम अपने हाथों में लें और इसे अपना ऐजेंडा बनायें। हम जनता को, उसके बेटे बेटियों को, इसके लिये तैयार करें और एक सर्वव्यापी अभियान चलायें, उसे अपने बुनियादी मुद्दों,,,,, रोटी, कपडा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा, रोजगार, तार्किकता, ग्यान विज्ञान, वैज्ञानिक संस्कृति और तर्कशील दृष्टिकोण व धर्मनिरपेक्षता,,,, पर सोचना सिखायें, अपनी हजारों सैंकडों सालों पुरानी समस्याओं का समाधान ढूंढना सिखायें। हम सरकारों कि जनविरोधी नीतियों का भंडाफोड़ करें। इसके लिए हमारे तौर तरीकें सोचे समझे हों। हम किसी भी मजहब या देवी देवता की खिल्ली ना उडायें, उनका मखौल न उडायें। उन्हें अपमानित या उनकी अवमानना ना करें। याद रखना यह बहुत जरूरी काम हमारे ऐजेंडे में शामिल होना ही चाहिए।

हमारे संविधान की अनुच्छेद 51अ में कहा भी गया है कि यह हरेक नागरिक की जिम्मेदारी बनती है कि वह वैज्ञानिक संस्कृति और तर्कशील दृष्टिकोण पैदा करे, समस्याओं पर तर्कशील दृष्टिकोण से सोचें और उसी के मुताबिक काम करें। मगर यह धारा एक शो पीस बनकर ही रह गयी है, सरकार या समाज के जागरूक नागरिकों द्वारा, इसे कभी जमीन पर नही उतारा गया यानि हमारी जनता की सोच और संस्कृति में नही रचा बसाया गया। इसी पिछडी सोच के कारण हमारी जनता अंधविश्वासों और अवैग्यानिकता के भंवर में फंस गयी है, जहां से निकलने का कोई रास्ता उसे नही सूझता।

हमारी दृढ और प्रबलतम मान्यता है कि वैग्यानिक, धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी शिक्षा, सोच, संस्कृति और ज्ञान विज्ञान के प्रचार प्रसार और अमल के बिना, हमारी जनता को हजारों साल पुराने अन्याय, भेदभाव, शोषण, जातिवाद, साम्प्रदायिकता, छल कपट और पिछडेपन से मुक्ति नही मिलेगी और वह अपनी नजर और नजरिये को पुख्ता और सही नही बना पायेगी। यहां यह भी याद रखियेगा कि यह काम किसी शुभ घडी से शुरू नही होगा, कोई देवी देवता भी हमारी कोई इमदाद करने नही आयेगा और इसमें कोई देवयोग भी हमारे काम नही आयेगा। जनता के सहयोग से यह काम हमें ही शुरू करना पडेगा।

जय ज्ञान, 

जय विज्ञान।

जय वैज्ञानिक संस्कृति

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *