बंद दरवाजों के पीछे सिसकता बुढ़ापा

विश्व वृद्धों के प्रति दुर्व्यवहार जागरूकता दिवस

बंद दरवाजों के पीछे सिसकता बुढ़ापा

  • बुजुर्गों के प्रति दुर्व्यवहार केवल एक सामाजिक समस्या नहीं, हमारी संवेदनाओं की सबसे बड़ी परीक्षा है

डॉ. रीटा अरोड़ा

“तुम्हारे बेटे का फोन आता है?” पार्क की बेंच पर बैठे एक बुजुर्ग ने दूसरे से पूछा।

दूसरे बुजुर्ग ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “हाँ, आता है… महीने में दो-तीन बार। पूछता है – पापा, दवा ले ली?”

पहले ने धीमे स्वर में कहा, “मेरे यहाँ तो घर में सब साथ रहते हैं, फिर भी कभी-कभी लगता है जैसे मैं अकेला किरायेदार हूँ।”

दोनों कुछ देर चुप रहे। सामने बच्चे खेल रहे थे, पीछे पेड़ों से पत्ते गिर रहे थे। उस चुप्पी में एक पूरी पीढ़ी का दर्द छिपा था।

हम अक्सर सोचते हैं कि बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार का मतलब मारपीट या हिंसा है। लेकिन सच इससे कहीं अधिक गहरा और दर्दनाक है। कई बार सबसे बड़ा दुर्व्यवहार वह होता है, जो दिखाई नहीं देता। किसी की बात न सुनना। उसे निर्णयों से दूर कर देना। उसकी उपस्थिति को महत्व न देना। उसके अकेलेपन को सामान्य मान लेना।

यही कारण है कि विशेषज्ञ आज इसे “मूक महामारी” कहने लगे हैं। एक ऐसी महामारी, जो बिना शोर किए लाखों बुजुर्गों के जीवन में फैल रही है।

कभी भारतीय परिवारों में बुजुर्ग घर की धुरी हुआ करते थे। उनके अनुभव को सम्मान मिलता था। शाम को बच्चे उनके पास बैठकर कहानियाँ सुनते थे। परिवार के बड़े फैसले उनकी सलाह से लिए जाते थे।

आज तस्वीर बदल रही है।

घर पहले से बड़े हो गए हैं, लेकिन बातचीत छोटी हो गई है। मोबाइल की स्क्रीन चमक रही है, लेकिन बुजुर्गों की आँखों की चमक धीरे-धीरे कम होती जा रही है।

सबसे दुखद बात यह है कि बुजुर्गों के साथ होने वाला अधिकांश दुर्व्यवहार घर के भीतर ही होता है। कई बार उनके अपने ही लोग उन्हें उपेक्षा, तिरस्कार या आर्थिक शोषण का शिकार बना देते हैं। बहुत से बुजुर्ग अपनी पेंशन, अपनी जमा-पूँजी या अपनी संपत्ति तक पर नियंत्रण खो देते हैं।

कई लोग दवाइयों, देखभाल और भावनात्मक सहारे से वंचित रह जाते हैं।

फिर भी वे शिकायत नहीं करते।

क्यों?

क्योंकि उन्हें अपने बच्चों की बदनामी का डर होता है। क्योंकि उन्हें लगता है कि शायद यही उनकी नियति है। क्योंकि वे अपने ही घर को अदालत या पुलिस तक नहीं ले जाना चाहते।

यह चुप्पी ही इस समस्या को और खतरनाक बना देती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दुनिया में हर छह बुजुर्गों में से एक किसी न किसी प्रकार के दुर्व्यवहार का सामना कर चुका है। लेकिन वास्तविक संख्या शायद इससे कहीं अधिक हो, क्योंकि अधिकांश मामले कभी सामने ही नहीं आते।

हमारी सबसे बड़ी भूल यह है कि हम बुढ़ापे को एक समस्या की तरह देखने लगे हैं।

जब कोई व्यक्ति बूढ़ा होता है तो उसकी जरूरतें बदलती हैं। उसे दवाइयों की जरूरत होती है। उसे सहारे की जरूरत होती है। लेकिन उससे भी अधिक उसे सम्मान और अपनापन चाहिए होता है।

आखिर जिसने पूरी जिंदगी परिवार के लिए संघर्ष किया, क्या उसे जीवन के अंतिम पड़ाव में केवल एक कमरा और कुछ दवाइयाँ चाहिए?

नहीं।

उसे चाहिए कोई उसकी बात सुने।

कोई उससे पूछे कि वह कैसा है।

कोई उसे यह महसूस कराए कि उसकी मौजूदगी आज भी महत्वपूर्ण है।

समस्या केवल परिवारों तक सीमित नहीं है। समाज भी धीरे-धीरे उम्र के आधार पर लोगों का मूल्यांकन करने लगा है। जैसे ही बाल सफेद होते हैं, कई लोग मान लेते हैं कि अब इस व्यक्ति की भूमिका समाप्त हो चुकी है।

लेकिन अनुभव की कोई उम्र नहीं होती।

एक बुजुर्ग के पास वह जीवन-ज्ञान होता है जो किसी विश्वविद्यालय में नहीं सिखाया जा सकता।

यही कारण है कि सभ्यता की असली पहचान उसकी इमारतों, सड़कों या तकनीक से नहीं होती। उसकी पहचान इस बात से होती है कि वह अपने सबसे कमजोर और सबसे अनुभवी लोगों के साथ कैसा व्यवहार करती है।

आज जरूरत केवल कानूनों की नहीं है।

जरूरत संवेदनाओं की है।

जरूरत है कि हम अपने घरों में संवाद वापस लाएँ।

बच्चे दादा-दादी के साथ समय बिताएँ।

युवा पीढ़ी उनकी कहानियाँ सुने।

परिवार के निर्णयों में उन्हें शामिल किया जाए।

और सबसे महत्वपूर्ण, उन्हें यह महसूस कराया जाए कि वे बोझ नहीं, विरासत हैं।

याद रखिए, बुढ़ापा कोई बीमारी नहीं है। यह जीवन की वह मंजिल है जहाँ एक दिन हम सभी को पहुँचना है।

आज जो व्यवहार हम अपने बुजुर्गों के साथ कर रहे हैं, कल वही व्यवहार हमारे लिए उदाहरण बनेगा।

इसलिए विश्व बुजुर्ग दुर्व्यवहार जागरूकता दिवस केवल एक तारीख नहीं, एक आईना है। एक ऐसा आईना जिसमें हमें अपने समाज का चेहरा देखने की जरूरत है।

कहीं ऐसा तो नहीं कि हम विकास की दौड़ में संवेदनाओं को पीछे छोड़ आए हैं?

कहीं ऐसा तो नहीं कि जिन हाथों ने हमें चलना सिखाया, आज वही सहारे के लिए तरस रहे हैं?

और कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारे घरों में सब कुछ है – सुविधा, साधन, समृद्धि – लेकिन बुजुर्गों के हिस्से का समय नहीं?

जब तक हर बुजुर्ग अपने घर में सुरक्षित, सम्मानित और अपनापन महसूस नहीं करेगा, तब तक हमारी प्रगति अधूरी रहेगी।

क्योंकि किसी समाज की महानता उसकी युवा पीढ़ी की ताकत से नहीं, बल्कि उसके बुजुर्गों की मुस्कान से मापी जाती है।

और शायद सबसे बड़ा धर्म भी यही है कि जिन हाथों ने हमें संभाला था, जीवन की सांझ में हम उनका हाथ थामे रहें।

डॉ. रीटा अरोड़ा

लेखिका सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *