गुरु पूर्णिमा: केवल उत्सव नहीं, आत्ममंथन का दिन

गुरु पूर्णिमा विशेष

गुरु पूर्णिमा: केवल उत्सव नहीं, आत्ममंथन का दिन

डॉ रीटा अरोड़ा

एक वृद्ध कुम्हार हर वर्ष गुरु पूर्णिमा पर अपने पुराने गुरु से मिलने जाता था। किसी ने पूछा, “अब भी उनसे क्या सीखते हो?”

वह मुस्कुराया, “कुछ नहीं… बस यह देखने जाता हूँ कि कहीं मेरी मिट्टी फिर से कठोर तो नहीं हो गई।”

यही उसकी सबसे बड़ी शिक्षा थी।

यह छोटी-सी घटना अपने भीतर एक बड़ा संदेश समेटे हुए है। गुरु हमें केवल ज्ञान नहीं देते, वे हमारे भीतर की कठोरता को पिघलाना सिखाते हैं। जब मन अहंकार, क्रोध, स्वार्थ या संवेदनहीनता से भरने लगे, तब स्वयं को टटोल लेना ही सच्चा आत्ममंथन है।

शायद इसलिए गुरु पूर्णिमा केवल उत्सव नहीं, आत्ममंथन का दिन है।

आज ज्ञान हमारी उँगलियों पर है। एक क्लिक में पूरी दुनिया की जानकारी हमारे सामने होती है। नई तकनीक हर प्रश्न का उत्तर खोज देती है।

लेकिन जीवन के सबसे कठिन प्रश्न-

कैसा इंसान बनना है,

रिश्तों को कैसे निभाना है, सफलता को सिर पर नहीं चढ़ने देना है और

असफलता में भी स्वयं को टूटने नहीं देना है-

इनका उत्तर कोई मशीन नहीं दे सकती।

क्योंकि जानकारी बुद्धिमान बना सकती है, लेकिन आत्ममंथन ही विवेकवान बनाता है।

हम दिनभर दूसरों का मूल्यांकन करते हैं।

कौन सही है,

कौन गलत,

किसने क्या कहा,

किसने क्या किया-

इस पर घंटों चर्चा कर लेते हैं।

लेकिन दिन समाप्त होने पर स्वयं से कितनी बार पूछते हैं- क्या आज मैंने किसी का मन दुखाया?

क्या मेरी वाणी से किसी को पीड़ा पहुँची?

क्या मैं कल से थोड़ा बेहतर इंसान बना हूँ?

शायद इन्हीं प्रश्नों से भीतर का आत्मगुरु जागता है।

भारतीय संस्कृति में गुरु को ईश्वर से भी पहले प्रणाम किया गया है। इसलिए नहीं कि वे चमत्कार करते हैं, बल्कि इसलिए कि वे हमें स्वयं से मिलाते हैं। वे हमारे भीतर छिपी संभावनाओं को पहचानते हैं और हमें अपने श्रेष्ठ स्वरूप तक पहुँचने की प्रेरणा देते हैं।

लेकिन एक समय ऐसा भी आता है, जब बाहरी गुरु पीछे खड़े हो जाते हैं और भीतर बैठा आत्मगुरु आगे आ जाता है। वही हर निर्णय से पहले धीमे से पूछता है-“क्या यह उचित है?” उसकी आवाज़ बहुत धीमी होती है, इसलिए उसे केवल वही सुन पाता है, जो स्वयं से संवाद करना जानता हो।

एक विद्यालय में गुरु पूर्णिमा का कार्यक्रम था। सभी विद्यार्थी अपने शिक्षकों के लिए फूल लेकर आए थे। कार्यक्रम शुरू होने से पहले प्रधानाचार्य ने प्रत्येक छात्र को एक खाली कागज़ दिया और कहा, “आज अपने शिक्षक की नहीं, अपनी समीक्षा लिखो। एक बुरी आदत जिसे छोड़ना है, एक अच्छा गुण जिसे अपनाना है और एक ऐसा संकल्प जिसे अगले गुरु पूर्णिमा तक निभाना है।”

उस दिन मंच पर कम तालियाँ बजीं, लेकिन कई बच्चों की आँखें नम थीं। उन्होंने पहली बार स्वयं को पढ़ा था। शायद शिक्षा का सबसे सुंदर क्षण वही होता है, जब मनुष्य दूसरों को बदलने के बजाय स्वयं को बदलने का निर्णय लेता है।

जीवन भी एक अद्भुत गुरु है। एक किसान धैर्य सिखा देता है,

एक मजदूर श्रम का सम्मान समझा देता है,

एक बच्चा सहजता का पाठ पढ़ा देता है और

एक असफलता विनम्रता का अर्थ समझा जाती है।

कभी-कभी हमारा अपना मौन भी वह सिखा देता है, जिसे वर्षों के प्रवचन नहीं सिखा पाते।

कभी-कभी मन में एक प्रश्न उठता है- यदि हमारे गुरु आज अचानक हमारे सामने आ जाएँ, तो क्या वे हमारी उपलब्धियों से अधिक हमारे व्यवहार पर गर्व करेंगे? शायद वे हमारी डिग्रियाँ नहीं पूछेंगे। वे केवल इतना जानना चाहेंगे कि

क्या हमने सच बोलना नहीं छोड़ा,

क्या सफलता ने हमें विनम्र बनाए रखा और

क्या किसी ज़रूरतमंद के लिए हमारे भीतर संवेदना अब भी जीवित है।

आख़िर गुरु की सबसे बड़ी सफलता शिष्य की प्रसिद्धि नहीं, उसका व्यक्तित्व होता है। जब शिष्य के व्यवहार में गुरु के संस्कार दिखाई देने लगते हैं, तभी शिक्षा सार्थक होती है। गुरु हमें ऊँचा उठना सिखाते हैं, लेकिन यह भी याद दिलाते हैं कि जितना ऊँचा वृक्ष होता है, उतना ही झुककर फल देता है।

आज की सबसे बड़ी विडंबना यह नहीं कि हमारे पास गुरु कम हैं, बल्कि यह है कि हमने सीखने की विनम्रता खोनी शुरू कर दी है। हम सफलता की सीढ़ियाँ तेज़ी से चढ़ना चाहते हैं, लेकिन चरित्र की नींव मजबूत करने के लिए रुकना नहीं चाहते। हम उपलब्धियाँ गिनते हैं, पर अपने भीतर आए परिवर्तन का हिसाब नहीं रखते। जबकि गुरु की सबसे बड़ी प्रसन्नता हमारे पुरस्कारों से नहीं, हमारे संस्कारों से होती है।

इसीलिए गुरु पूर्णिमा केवल श्रद्धा का पर्व नहीं, आत्मपरीक्षण का अवसर भी है। यह हमें याद दिलाती है कि सच्ची गुरु-दक्षिणा उपहारों में नहीं, बल्कि उनके दिए मूल्यों को जीवन में उतारने में है।

यदि उन्होंने सत्य सिखाया है, तो कठिन समय में भी सत्य का साथ देना ही उनका सम्मान है।

यदि उन्होंने ईमानदारी सिखाई है, तो सुविधा के लिए सिद्धांत न छोड़ना ही उनकी पूजा है।

यदि उन्होंने करुणा सिखाई है, तो किसी की पीड़ा को अपनी पीड़ा समझना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।

आज के समय में गुरु पूर्णिमा का सबसे बड़ा संदेश शायद बुद्ध के शब्दों *”आत्मदीपो भव”* में निहित है— *स्वयं अपना दीपक बनो।* इसका अर्थ गुरु की आवश्यकता को नकारना नहीं है, बल्कि यह है कि सच्चा गुरु वही है, जो अपने शिष्य के भीतर ऐसा विवेक जगा दे कि वह हर परिस्थिति में सही निर्णय लेने का साहस पा सके।

जब बाहरी गुरु का आशीर्वाद और भीतर के आत्मगुरु की जागृति साथ चलने लगती है, तब मनुष्य केवल सफल नहीं होता, बल्कि सार्थक भी बनता है। उसके निर्णय केवल बुद्धि से नहीं, विवेक से संचालित होते हैं। वही विवेक उसे भीड़ में भी सही राह चुनने का साहस देता है।

*फंडा यह है कि गुरु का सम्मान केवल उनके चरण स्पर्श करने में नहीं, बल्कि उनके दिए संस्कारों को अपने चरित्र का हिस्सा बनाने में है। इसलिए इस गुरु पूर्णिमा पर अपने गुरु को श्रद्धापूर्वक प्रणाम करें और अपने भीतर बसे आत्मगुरु का भी सम्मान करें। यही इस पर्व की सच्ची साधना है।*

 डॉ. रीटा अरोड़ा, सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, करनाल।

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