बच्चों को सफल नहीं, सक्षम बनाइए

परवरिश

बच्चों को सफल नहीं, सक्षम बनाइए

  • बेहतर परवरिश का असली मंत्र

डॉ. रीटा अरोड़ा

“पापा, मेरे पास सब कुछ है… फिर भी मैं खुश क्यों नहीं हूँ?”
बेटे का सवाल सुनकर पिता चुप हो गए।
कमरे में खिलौने थे, महंगा मोबाइल था, गेमिंग कंसोल था, लेकिन शायद वह चीज़ नहीं थी जिसकी बच्चे को सबसे ज्यादा जरूरत थी – समय, संवाद और साथ।

उसी दिन उन्हें एहसास हुआ कि बच्चों को चीज़ें देना आसान है, लेकिन जीवन जीना सिखाना कठिन।

शायद आधुनिक परवरिश की सबसे बड़ी चुनौती यही है।

आज के माता-पिता अपने बच्चों के लिए सबसे अच्छा स्कूल चाहते हैं, सबसे अच्छी कोचिंग, सबसे अच्छे कपड़े और सबसे अच्छे गैजेट्स। वे अपने बच्चों को वह सब देना चाहते हैं, जिसकी कमी उन्होंने अपने बचपन में महसूस की थी। लेकिन इसी प्रयास में एक महत्वपूर्ण सवाल पीछे छूट जाता है – क्या हम अपने बच्चों को जीवन की चुनौतियों का सामना करना भी सिखा रहे हैं?

आज का बच्चा सुविधाओं से घिरा हुआ है, लेकिन कई बार वह छोटी-सी असफलता से टूट जाता है। उसके पास जानकारी बहुत है, लेकिन धैर्य कम है। उसके पास विकल्प बहुत हैं, लेकिन संतोष कम है। यह स्थिति केवल बच्चों की नहीं, हमारी परवरिश की भी कहानी कहती है।

अच्छी परवरिश का अर्थ केवल बच्चों की जरूरतें पूरी करना नहीं है। अच्छी परवरिश का अर्थ है उन्हें ऐसा इंसान बनाना, जो जीवन के उतार-चढ़ाव में संतुलित रह सके।

दुर्भाग्य से आज हम बच्चों को हर कठिनाई से बचाने की कोशिश करते हैं। उन्हें गिरने नहीं देते, हारने नहीं देते, संघर्ष करने नहीं देते। हमें लगता है कि हम उनकी रक्षा कर रहे हैं, लेकिन कई बार हम उनकी मजबूती बनने की प्रक्रिया रोक देते हैं।

जीवन की सबसे बड़ी शिक्षा किताबों से नहीं, अनुभवों से मिलती है।

जिस बच्चे ने कभी हार नहीं देखी, वह जीत की कीमत नहीं समझ सकता।
जिस बच्चे ने कभी इंतजार नहीं किया, वह धैर्य नहीं सीख सकता।
जिस बच्चे ने कभी चुनौती का सामना नहीं किया, वह आत्मविश्वास विकसित नहीं कर सकता।

यही कारण है कि दुनिया भर में अब “स्लो पेरेंटिंग” की अवधारणा पर जोर दिया जा रहा है। इसका अर्थ बच्चों को धीमा बनाना नहीं, बल्कि उन्हें अपनी गति से विकसित होने देना है।
आज बच्चों का समय-सारिणी किसी बड़े अधिकारी से कम व्यस्त नहीं होती। स्कूल, ट्यूशन, खेल, संगीत, कोडिंग और न जाने कितनी गतिविधियाँ। माता-पिता का उद्देश्य अच्छा होता है, लेकिन कई बार इस दौड़ में बचपन कहीं खो जाता है।

बच्चों को हर समय व्यस्त रखना जरूरी नहीं है।

कुछ खाली समय भी जरूरी है। यही वह समय होता है जब बच्चे कल्पना करना सीखते हैं, सवाल पूछते हैं, नए विचारों के बारे में सोचते हैं और खुद को समझते हैं। बचपन का एक बड़ा हिस्सा खोज और जिज्ञासा से बनता है, न कि केवल उपलब्धियों से।

परवरिश का दूसरा महत्वपूर्ण स्तंभ है – संवाद।

आज एक ही घर में रहने वाले लोग कई बार एक-दूसरे से कम और स्क्रीन से ज्यादा बात करते हैं। माता-पिता बच्चों के लिए सब कुछ खरीद देते हैं, लेकिन उनके साथ बैठकर दस मिनट खुलकर बातचीत नहीं कर पाते।

बच्चों को हमेशा सलाह की जरूरत नहीं होती। कई बार उन्हें सिर्फ एक ऐसे व्यक्ति की जरूरत होती है जो उनकी बात सुने।
एक ऐसा व्यक्ति जो उनकी असफलताओं पर डांटे नहीं, बल्कि समझे।
एक ऐसा व्यक्ति जिसके सामने वे बिना डर के अपनी भावनाएँ व्यक्त कर सकें।

यही विश्वास बच्चों के व्यक्तित्व की सबसे मजबूत नींव बनता है।

आज की परवरिश का एक और बड़ा प्रश्न है – सफलता की परिभाषा। हम बच्चों से अक्सर पूछते हैं, “बड़े होकर क्या बनोगे?” लेकिन शायद हमें यह भी पूछना चाहिए, “बड़े होकर कैसे इंसान बनोगे?”

क्योंकि जीवन में केवल सफल होना पर्याप्त नहीं है।

संवेदनशील होना भी जरूरी है।
ईमानदार होना भी जरूरी है।
दूसरों के प्रति सम्मान रखना भी जरूरी है।

समाज को आज केवल प्रतिभाशाली लोगों की जरूरत नहीं है। उसे ऐसे लोगों की जरूरत है जो जिम्मेदार भी हों।

याद रखिए, बच्चे हमारे शब्दों से कम और हमारे व्यवहार से ज्यादा सीखते हैं।
यदि हम चाहते हैं कि वे ईमानदार बनें, तो हमें भी ईमानदार होना होगा।
यदि हम चाहते हैं कि वे सम्मान देना सीखें, तो हमें भी सम्मान देना होगा।
यदि हम चाहते हैं कि वे स्क्रीन से दूरी बनाएँ, तो हमें भी मोबाइल नीचे रखना होगा।

बच्चे हमारे उपदेश नहीं, हमारे उदाहरण याद रखते हैं।

एक दिन वे यह भूल सकते हैं कि हमने उन्हें कौन-सा खिलौना खरीदकर दिया था, लेकिन वे यह कभी नहीं भूलेंगे कि हमने उनके साथ कितना समय बिताया था। वे यह नहीं याद रखेंगे कि उनके पास कौन-सा मोबाइल था, लेकिन यह जरूर याद रखेंगे कि मुश्किल समय में उनके माता-पिता उनके साथ खड़े थे या नहीं।

अंततः सच्चाई यही है कि –
बच्चों को हर समस्या से बचाइए मत, उन्हें समस्याओं का सामना करना सिखाइए। हर इच्छा पूरी मत कीजिए, धैर्य सिखाइए। हर समय व्यस्त मत रखिए, उन्हें बचपन जीने दीजिए। क्योंकि अच्छी परवरिश का लक्ष्य सफल बच्चे नहीं, मजबूत, संवेदनशील और खुश इंसान तैयार करना है।

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