समय के सामने कवि और कविता-5

(न्याय हितेषी बहुजनकवि ओमसिंह अशफ़ाक की एक लोकप्रिय कविता है ‘जब इंसाफ कहीं ना होता हो'(अन्याय गाथा)। उक्त कविता के कुछ बंध प्रसंगवश कुछ लेखों में हमारे पाठकों तक पहुंचे तो कुछ ने पूरी कविता पढ़ने की जिज्ञासा प्रकट की है। पाठकों की सुविधा के लिए शेष बंध भी यहां किस्तों में दिए जा रहे हैं ताकि पाठक देख सकें कि उस वक्त के हालात और आज के हालात में कितनी आश्चर्यजनक समानता है! फिर सरकारों के बदलने से आख़िर क्या बदला है? -संपादक)

समय के सामने कवि और कविता-5

ओमसिंह अशफ़ाक

कविता: जब इंसाफ कहीं ना होता हो !

1.

सब फसलों के जब नोट बटैं !

तब कर्जे के सब फंदे कटैं !

फेर लूट के सब जंजाल हटैं !

मजदूर के दिन सावन से कटैं !

फेर बुढ्ढे-बुढ़िया भी दही पिएं !

और पी-पीकर सौ साल जिएं !

सौ-साल जिएं और स्वस्थ रहें !

इस धरती को ही वे स्वर्ग कहें !..

भई ! दिन बरजण के आन पड़े !

2.

परचम नारी का भी लाल बणै !

हर-हाल बणे, फिलहाल बणै !

फिर जनता की वो ढ़ाल बणै !

न्याय तो हम अब लेके रहेंगे !

विष की काली़ ये नाग दहेंगे !

बहुत सहा है, अब ना सहेंगे !

ज़ुल्मी से डटके ज़ोर करेंगे !

जतन नये-नये होर करेंगे !..

भई! दिन बरजण के आन पड़े !

3.

अपणी तो ये रीत रही है !

जनता अपणी मीत रही है !

सत्ता सदा भयभीत रही है !

ज़ुल्मी सदी अब बीत रही है !

आगे-से-आगे बढ़ते चलेंगे !

बढ़ते कदम ना पीछे हटेंगे !

ज़ुल्मी मिटेगा, हम ना मिटेंगे !

इतिहास की हमको सीख रही है !

भौर सुनहरी वो दीख रही है !..

भई! दिन बरजण के आन पड़े !

4.

लिक्खो तुम! अन्याय की गाथा,

कवि क्यों रोए ?

पीड़ा क्यों आंसू में धोए ?

जनता एक दिन मनन करेगी !

पूरण-मुक्ति का जतन करेगी !..

इतना-सा जो कहण पुगावैं !

मिल-बैठ के सोचैं और समझावैं !

जनता का वे (इ)कक्ठ बनावैं !

फेर दुर्दिन ना कभी लौट कै आवैं !..

*

अब ना जुल्म-अंधेर सहेंगे !

जिन्दा रहे तो हक से रहेंगे !

ज़ुल्मी से हम ना कभी डरेंगे !

पड़े मरना तो जूझ मरेंगे !..

भई ! दिन बरजण के आन पड़े !

(दिसंबर,2006)

————————-

नोट: कविता में प्रयुक्त ज्यादातर शब्द हिंदी के ही हैं बस, उनका लहजा़ (उच्चारण) हरियाणवी बोली का है। जिसे हिंदी के पाठक आसानी से समझ सकते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *