हरियाणा के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में तदर्थ नियु्क्तियों पर आरक्षण : एक जरूरी सुधार

हरियाणा के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में तदर्थ नियु्क्तियों पर आरक्षण : एक जरूरी सुधार

डा रामजीलाल

हरियाणा के महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में आज लगभग 40% पढ़ाई अतिथि अथवा तदर्थ अनुबंध आधार पर रखे गए शिक्षकों के भरोसे चल रही है. हरियाणा के कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय ,चौ.देवीलाल विश्वविद्यालय के आंकडे़ बताते हैं कि अकादमी सत्र 2024-2025 में 3200 से अधिक शिक्षक इसी व्यवस्था से पढ़ रहे थे . हरियाणा के 40% सरकारी कॉलेज बिना रेगुलर प्रिंसिपल के चल रहे हैं और 4,900 से ज़्यादा फैकल्टी की खाली जगहें हैं (https://indianexpress.com/…/haryana-govt-colleges…/). समस्या यह है कि इन पदों पर आरक्षण लागू नहीं होता .अनुसूचित जाति, पिछड़ा वर्ग और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के योग्य उम्मीदवार वर्षों तक बाहर रह जाते हैं.

12 जुलाई 1924 को ‘मदन सिंह बनाम हरियाणा राज्य’ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने नियमितीकरण की नीति को वैध माना था. साफ कहा था कि’’ बिना खुली प्रतियोगिता के बैक डोर एंट्री अवैध’’ है .सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण पर रोक नहीं लगाई ,अपितु प्रक्रिया – “बिना खुली प्रतियोगिता के बैक डोर एंट्री” पर गंभीर सवाल उठाया था. परन्तु इसका फायदा उठाकर आरक्षण विरोधी लोग यह प्रचार कर रहे है कि आरक्षण लागू नहीं हो सकता. यह व्याख्या गलत है. और भारत के संविधान में प्रदत ‘सामाजिक न्याय ‘के सिद्धांत के विरुद्ध है. पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने 27 मई 2026 को हरियाणा के सरकारी स्कूलों में 12700 ‘गेस्ट टीचर्स’ के नियमित करने के आदेश देते हुए कहा कि नियमितीकरण की नीति पर कोई विवाद नहीं हो सकताऔर याचिका कर्ता नीति की शर्तों को पर्याप्त रूप में पूरा करते हैं. जस्टिसहरियाणा के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में तदर्थ नियु्क्तियों पर आरक्षण :एक जरूरी सुधार संदीप मौदगिल की पीठ ने कहा कि शिक्षण’ स्टाप गैप अरेंजमेंट’ नहीं है बल्कि समाज और राष्ट्र की आधारशिला होते हैं .उन्हें मनमाने ढंग से ‘स्पेयर पार्ट’ की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता .(दैनिक ट्रिब्यून ,चंडीगढ़,28 मई 2026,पृ.1).

तदर्थ का खेल 11 महीने + 1 दिन का ब्रेक

वर्तमान व्यवस्था में सबसे बड़ी कमी ‘कृत्रिम ब्रेक’ है .महाविद्यालय11 महीने के लिए नियुक्ति पत्र देते हैं .गर्मी की छुट्टियों में यह एक या दो दिन का ब्रेक दिखाकर शिक्षक को फिर से 11 महीने के लिए रख लेते हैं .कागज पर बार बार नया ‘तदर्थ’लिखा होता है लेकिन हकीकत में वह सालों से निरंतर पढ़ रहा है. समाचार पत्रों में दिए गए विज्ञापनों में साफ़-साफ़ लिखा होता है कि सत्र 2026-2027 के लिए सिर्फ़ टेम्परेरी कॉन्ट्रैक्ट के आधार पर वैकेंसी हैं. विज्ञापनों में योग्यता की वही शर्ते हैं जो स्थायी टीचर्स के लिए होती हैं .परंतु कितना वेतन दिया जाएगा इसका वर्णन नहीं होता. यहीं से तदर्थ टीचर्स का शोषण प्रारंभ होता है. इन विज्ञापनों में आरक्षण का वर्णन भी नहीं होता.इसके दो महत्वपूर्ण नुकसान है .प्रथम ,आरक्षण रोस्टर लागू नहीं होता क्योंकि पद को अस्थायी बताया जाता है.प्राचार्य,विभागाध्यक्ष,प्रबंधक समितियां अपनी पसंद के लोगों को सालों तक पदों पर बनाए रखते हैं. द्वितीय, एससी,बीसी और ईडब्ल्यूएस वर्ग के युवा अभ्यार्थी को मौका ही नहीं मिलता .चाहे वह. नेट और पीएचडी की योग्यता क्यों ना रखता हो.

संवैधानिक स्थिति आरक्षण सिर्फ स्थायी पद तक सीमित नहीं

भारतीय संविधान का अनुच्छेद {16(4)}कहता है कि राज्य सेवाओं में प्रयाप्त प्रतिनिधित्व के लिए आरक्षण दे सकता है. संविधान में यह नहीं लिखा कि केवल “स्थाई पदों “पर लागू होगा .”पद “शब्द का मतलब है कोई भी जिम्मेदारी का पद जिसके लिए सरकार वेतन दे रही हो. सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा साहनी और अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया, 1992 केस में माना था कि आरक्षण का मकसद प्रशासन में सभी वर्गों हिस्सेदारी सुनिश्चित करना है .जब कोई पद 3-4 साल से तदर्थ से भरा जा रहा है तो वह कार्य स्थायी प्रकृति का है . उसे अस्थायी कहकर आरक्षण से वंचित करना व संविधान के सामाजिक न्याय की भावना के विरुद्ध है .पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट ने सीपीडब्ल्यू पी 15 234-2023 में कहा था कि आरक्षण स्वीकृत पदों पर लागू होता है लेकिन स्वीकृत पद की परिभाषा सरकार खुद तय कर सकती है .यदि राज्य मंत्रिमंडल नीतिगत निर्णय ले कि 11 महीने अधिक चलने वाला पद रोस्टर के लिए स्वीकृत माना जाएगा,तो यह पूरी तरह वैध माना जाएगा.

अन्य राज्यों की स्थिति

यह समस्या सिर्फ हरियाणा की नहीं है अपितु तमिलनाडु में 2019 में जीओ143 जारी किया .जिसके अनुसार 10 महीने से अधिक या 3 साल में कुल 10 महीने सेवा देने वाले अतिथि पद पर रोस्टर लागू होता है.90 दिन से निरंतरता तोड़ने वाला नहीं माना जाता.दिल्ली विश्वविद्यालय में दशकों से तदर्थ भर्तियों में एससी, एसटी व ओबीसी को आरक्षण दिया जाता है .केरल व कर्नाटक के राज्य विश्वविद्यालयों में भी कार्यकारी आदेशानुसार एससी, एसटी व ओबीसी के लिए आरक्षण की व्यवस्था है.

यूजीसी मसौदा 2019

यूजीसी ने मसौदा 2019 के दिशानिर्देशों में सिफारिश की थी कि एक सत्र से अधिक चलने वाले सभी शैक्षणिक पदों पर आरक्षण लागू हो. यानी राष्ट्रीय स्तर पर भी यह सोच है कि अस्थाई नाम पर सामाजिक न्याय को नकारा नहीं जा सकता.

समस्या का समाधान करने के लिए सुझाव

हरियाणा सरकार के उत्तर शिक्षा विभाग को तदर्थ नियु्क्तियों पर आरक्षण के सिद्धांत को स्वीकार करना चाहिए. इस संबंघ में अग्रलिखित सझाव हैं:

प्रथम स्वीकृत पद की परिभाषा: कोई भी शिक्षक या गैर शिक्षक पद11महीने से अधिक लगातार या 3 वर्षों में कुल 11 महीने तदर्थ ,अतिथि व अनुबंध के आधार पर भर गया है ,उसे रोस्टर के लिए स्वीकृत माना जाए ,90 दिन से कम का ब्रेक निरंतर नहीं तोड़ेगा .क्योंकि कृत्रिम नहीं था .यह साबित करने के लिए जिम्मेदारी महाविद्यालय में प्राचार्य और विश्वविद्यालय में वाइस चांसलर होनी चाहिए.

द्वितीय: अनिवार्य खुला विज्ञापन:सभी तदर्थ ,अतिथि व अनुबंध के आधार नियुक्तियां कॉलेज और विश्वविद्यालय की वेबसाइट और कम से कम एक राष्ट्रीय अखबार में विज्ञापन में देनी चाहिए व ताकि वॉक इन इंटरव्यू के नाम पर चोर दरवाजे से भर्ती बंद हो.

तृतीय, चयन समिति में विविधता:चयन समिति में विविधता हेतु विशेषज्ञ के साथ एससी -एसटी का नामित सदस्य भी होना चाहिए .इससे चयन समिति का दृष्टिकोण संतुलित रहेगा और भेदभाव की आशंका कम होगी.

चतुर्थ ,100 -प्वाइंट रोस्टर लागू करें :सीधी भर्ती वाला 100 प्वाइंट रोस्टर सब तदर्थ नियुक्तियों पर लागू होना चाहिए-यानी 20% एससी,11% बीसी (ए) ,6% बीसी(बी), 10% ईडब्ल्यूस व 4 %दिव्यांग – क्षैतिक आरक्षण मिलेगा .बैक लॉग 1 अप्रैल 2026 से गिना जाए और भविष्य में इन सब नियुक्तियों को भर जाए .

पंचम,अधिकतम अवधि और नियमित भर्ती की बाध्यता:कोई भी व्यक्ति लगातार दो शैक्षिक सत्र से अधिक तदर्थ नहीं रहना चाहिए . यह वास्तव में 12 जुलाई 2024 के फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने बिना प्रक्रिया केनियमितीकरण कोअवैध माना था परन्तु इसी निर्णय में पैरा 53 में कोर्ट ने खुद योग्य व्यक्तियों की नियुक्ति पर विचार हो सकता है बसरते कि खुला विज्ञापन ,मेरिट और रोस्टर पारदर्शी की प्रक्रिया के मुख्य बिंदूओं का पालन किया गया हो.इसलिए यह सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का उल्लंघन नहीं अपितु अनुपालन होगा.

छठा, पारदर्शिता सुनिश्चित करना:हरियाणा के उच्चतर शिक्षा विभाग को एक केंद्रीय पोर्टल बनाना चाहिए जहां हर कॉलेज और विश्वविद्यालय की हर तदर्थ नियुक्ति का विज्ञापन ,रोस्टर पॉइंट ,चयन सूची अपलोड करके पारदर्शिता सुनिश्चित करनी चाहिए.

संक्षेप में तदर्थ के नाम पर की जाने वाली हेरा फेरी समाप्त होनी चाहिए क्योंकि तदर्थ आरक्षण मुक्त नहीं होता.शिक्षा एक जनहित का काम है औरसंविधान का अनुच्छेद{16(4)} तदर्थ नियुक्तियों भी लागू होता है. हरियाणा में तदर्थ नियुक्तियों पर आरक्षण लागू करना एक ऐतिहासिक कदम होगा. हरियाणा के मंत्रिमंडल को निर्णय पारित करके इस दिशा में निर्देश जारी करने चाहिए ताकि सामाजिक न्याय के सिद्धांत को सअक्षर लागू किया जाए.

 

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