बेबी बूमर्स बनाम जेन-जी: अलग पीढ़ियां, एक ही चक्रव्यूह

समय समाज

बेबी बूमर्स बनाम जेन-जी: अलग पीढ़ियां, एक ही चक्रव्यूह

डॉ. रीटा अरोड़ा

“तकनीक जब हमारे श्रम को कम करने के बजाय हमारी सोच और सामाजिक संबंधों को प्रतिस्थापित करने लगे तो समझ लेना चाहिए कि सुविधा अब एक जाल बन चुकी है।”

मानव सभ्यता का पूरा इतिहास सुविधा और सहजता की खोज की एक निरंतर यात्रा रहा है। पहिए के आविष्कार से लेकर आधुनिक युग में इंटरनेट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के उदय तक, हर तकनीक ने हमारे जीवन को आसान बनाया है। लेकिन हर सुविधा अपने साथ एक अदृश्य और भारी कीमत भी लेकर आती है-कभी यह कीमत मानसिक होती है, तो कभी सामाजिक।

आज स्मार्टफोन और इंटरनेट ने जिस तरह हमारे जीवन को अपनी गिरफ्त में ले लिया है, वह केवल तकनीकी विकास की गाथा नहीं है, बल्कि यह इंसानी दिमाग की गहरी निर्भरता और बिखरते सामाजिक ताने-बाने की हकीकत है। इस संकट का सबसे दिलचस्प और चिंताजनक पहलू यह है कि इसने हमारी आबादी के दो सबसे विपरीत छोरों को एक ही कतार में लाकर खड़ा कर दिया है: बेबी बूमर्स (1964 से पहले पैदा हुए वरिष्ठ नागरिक) और जेन-जी (Generation Z) (1997 से 2012 के बीच जन्मे युवा)।

एक पीढ़ी वह है जिसने जीवन का एक बड़ा हिस्सा बिना इंटरनेट के पारंपरिक सामाजिक मेलजोल के बीच बिताया; जबकि दूसरी पीढ़ी वह है जिसने अपनी आँखें ही एक आभासी (Virtual) दुनिया में खोली हैं। फिर भी, आज इन दोनों ही समूहों में एक जैसी खतरनाक समानता उभर रही है-स्मार्टफोन पर अत्यधिक निर्भरता। किसी भी शहर के न्यूरोसर्जन या मनोवैज्ञानिक से बात करें तो वे आज एक ही चिंता जताते हैं कि लोगों का दिमाग अब लगातार सक्रिय होकर सोचने-समझने के बजाय केवल स्क्रीन के निर्देशों का गुलाम बनकर रह गया है।

पहली नजर में ऐसा लगता है कि तकनीक और सोशल मीडिया की लत केवल युवाओं की बीमारी है, लेकिन वर्तमान सामाजिक परिदृश्य इस धारणा को पूरी तरह खारिज करता है।

जेन-जी वह पीढ़ी है जो तकनीक के साथ ही बड़ी हुई है। आंकड़े बताते हैं कि जेन-जी के युवा दिन भर में औसतन 172 बार अपने फोन को चेक करते हैं। इस पीढ़ी में लत का मुख्य कारण पीयर प्रेशर और सोशल मीडिया वैलिडेशन (लाइक और कमेंट्स की भूख) के कारण तुरंत मिलने वाला आनंद है। इंस्टाग्राम, स्नैपचैट और शॉर्ट-फॉर्म कंटेंट (रील्स और शॉर्ट्स) ने उनके दिमाग को त्वरित उत्तेजनाओं का ऐसा आदी बना दिया है कि वे वास्तविक जीवन की धीमी और साधारण गतिविधियों में मन नहीं लगा पाते। वे वर्चुअल दुनिया में हजारों दोस्तों से घिरे हैं, लेकिन असल जिंदगी में अकेलेपन, घबराहट (Anxiety) और डिप्रेशन के सबसे बड़े शिकार हैं।

इसके विपरीत, बेबी बूमर्स पारंपरिक संवाद को प्राथमिकता देने वाले लोग हैं। लेकिन आज जब परिवार न्यूक्लियर हो रहे हैं और समाज का पारंपरिक ढांचा बिखर रहा है, तब इस खालीपन और अकेलेपन ने बुजुर्गों को भी स्क्रीन की शरण लेने पर मजबूर कर दिया है। वे घंटों व्हाट्सऐप फॉरवर्ड्स, फेसबुक और यूट्यूब वीडियो देखने में बिता देते हैं।

चूंकि वृद्ध लोगों द्वारा तकनीक का सक्रिय उपयोग (जैसे जीपीएस या रिमाइंडर) उनके दिमाग को सक्रिय रखता है और संज्ञानात्मक गिरावट (Cognitive Decline) को रोकता है। लेकिन जब यही उपयोग ‘निष्क्रिय’ (Passive) हो जाता है, जहाँ वे घंटों केवल वीडियो स्क्रॉल करते रहते हैं, तो यह उन्हें भी गंभीर रूप से भुलक्कड़ और समाज से पूरी तरह अलग-थलग बना देता है।

वैज्ञानिकों ने स्मार्टफोन के इस अत्यधिक उपयोग से होने वाले मानसिक पतन को  डिजिटल डिमेंशिया का नाम दिया है। इसके कारण हमारी बुनियादी संज्ञानात्मक क्षमताओं (Cognitive Skills) में भारी गिरावट आ रही है:

पहले इंसान को फोन नंबर, पते और तारीखें याद रखने के लिए दिमाग का उपयोग करना पड़ता था। अब सारी जानकारी मोबाइल में है। इसे ‘गूगल इफेक्ट’ या ‘डिजिटल एम्नेशिया’ कहा जाता है। चूंकि हमारा दिमाग जानता है कि हर जानकारी सिर्फ एक क्लिक की दूरी पर है, इसलिए वह उसे स्थायी स्मृति में दर्ज करना बंद कर देता है।

एक शोध के अनुसार, इंसानों की ध्यान केंद्रित करने की औसत क्षमता 12 सेकंड से घटकर अब केवल 8 सेकंड रह गई है-जो कि एक ‘गोल्डफिश’ से भी कम है। लगातार आने वाले नोटिफिकेशन्स और मल्टीटास्किंग के कारण दिमाग किसी एक कार्य पर लंबे समय तक टिक नहीं पाता।

स्मार्टफोन की लत मस्तिष्क के रसायनों को प्रभावित करती है। एमआरएस (MRS) स्कैन अध्ययनों से पता चला है कि स्मार्टफोन के आदी लोगों के मस्तिष्क रसायनों का नाजुक संतुलन बिगड़ जाता है, जिससे एंग्जायटी और डिप्रेशन बढ़ता है। इसके अलावा, स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी नींद के हार्मोन को दबा देती है, जिससे नींद की कमी होती है और मस्तिष्क में सूजन आने लगती है। हर लाइक पर मिलने वाले डोपामाइन के झटके मस्तिष्क के ‘रिवॉर्ड सिस्टम’ को सुन्न कर देते हैं जिससे वास्तविक जीवन की साधारण गतिविधियाँ नीरस लगने लगती हैं।

तकनीक ने हमें जो सबसे बड़ी सुविधा दी है, उसकी सामाजिक कीमत हमें सामाजिक अलगाव के रूप में चुकानी पड़ रही है। पहले पड़ोस की दुकानों पर जाना, शाम को लोगों का बाहर बैठकर बतियाना या बच्चों का मैदानों में खेलना समाज को आपस में जोड़ने वाले भावनात्मक सूत्र थे।

आज इस सुविधा ने मानवीय संपर्क को समाप्त कर दिया है। विडंबना देखिए कि जिस तकनीक को लोगों को जोड़ने के लिए बनाया गया था, उसी ने हमें हमारे बगल में बैठे इंसान से पूरी तरह काट दिया है। आज डाइनिंग टेबल पर पूरा परिवार साथ बैठता तो है, लेकिन हर किसी का चेहरा अपनी-अपनी स्क्रीन की रोशनी में डूबा रहता है।

राहत की बात यह है कि हमारा मस्तिष्क बेहद लचीला होता है। सही आदतें अपनाकर तकनीक से हुए इस नुकसान को पूरी तरह से ठीक (Reverse) किया जा सकता है। घर में डाइनिंग टेबल और बेडरूम को पूरी तरह स्क्रीन-मुक्त घोषित करें।  टाइपिंग के बजाय पेन से डायरी लिखना, स्क्रीन के बजाय कागजी किताबें पढ़ना या बागवानी करना मस्तिष्क को फिर से ‘रिवायर’ (Rewire) करता है। योग और व्यायाम से मस्तिष्क में नए न्यूरल कनेक्शन बनते हैं और डोपामाइन स्वाभाविक रूप से संतुलित होता है। दोनों पीढ़ियों को वर्चुअल दुनिया से बाहर निकलकर आपस में संवाद करना होगा। दादा-दादी बच्चों को कहानियां सुनाएं और बच्चे उन्हें तकनीक का सुरक्षित उपयोग सिखाएं।

सुविधा जीवन को आसान बनाने के लिए है, उसका गुलाम बनने के लिए नहीं। जब समाज की दो महत्वपूर्ण पीढ़ियाँ एक आभासी दुनिया के गुलाम बनकर अपनी याददाश्त, ध्यान और निर्णय लेने की क्षमता खोने लगें तो यह पूरे समाज के लिए खतरे की घंटी है। हमें अपनी स्क्रीन को कुछ देर के लिए नीचे रखना होगा और वास्तविक जिंदगी से आँखें मिलानी होंगी।

आखिरकार, जीवन को ‘लाइक्स’ में नहीं, बल्कि जिए गए पलों की गहराई में मापा जाता है।

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