अभी दो दिन पहले भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI ) सूर्यकांत ने एक वकील के मामले की सुनवाई के दौरान युवा वर्ग (कुछ युवा जिन्हें नौकरी नहीं मिलती वे वकील, पत्रकार, आरटीआई कार्यकर्ता, सोसल मीडिया पत्रकार बन जाते हैं)। ऐसे युवा कॉक्रोच, परजीवी…. होते हैं। न्यायमूर्ति की इस मौखिक टिप्पणी उर तीखी प्रतिक्रिया आई। इसके बाद सीजेआई ने सफाई दी है और कहा कि मीडिया के एक वर्ग ने उनकी टिप्पणी को गलत समझा, वह तो फर्जी डिग्री लेकर वकील बने युवाओं के बारे में कह रहे थे। न्यायमूर्ति सूर्यकांत की टिप्पणी पर आई दो टिप्पणियां दे रहा हूं ताकि लोगों का ग़ुस्सा समझ में आ सके। संपादक
सांसद मनोज झा को माननीय सीजीआई को खुला पत्र
मा. मुख्य न्यायाधीश महोदय,
सादर प्रणाम।
आपकी हालिया टिप्पणियों में प्रयुक्त “कॉकरोच” और “परजीवी” जैसे शब्दों ने देश के अनेक नागरिकों की तरह मुझे भी गहराई से विचलित किया है। चिंता केवल शब्दों के चयन की नहीं है, बल्कि उस दृष्टिकोण की है जिसकी झलक इन टिप्पणियों में दिखाई देती है। जब एक संवैधानिक लोकतंत्र के मुख्य न्यायाधीश बेरोज़गार युवाओं, आरटीआई कार्यकर्ताओं, मीडिया कर्मियों और असहमति व्यक्त करने वालों की तुलना “कॉकरोच” और “परजीवी” से करते हैं, तो यह केवल व्यक्तिगत आक्रोश का मामला नहीं रह जाता; यह लोकतंत्र की मूल आत्मा और उसकी बुनियादी संवैधानिक संस्कृति को आहत करने लगता है।
महोदय, किसी संवैधानिक पद की नैतिक शक्ति केवल उसके अधिकारों से नहीं आती, बल्कि उससे आती है उस संयम, संवेदनशीलता और संवैधानिक नैतिकता से, जिसका वह प्रतिनिधित्व करता है। हमारे न्यायिक इतिहास की यही सबसे सुंदर परंपरा रही है कि अदालतें शब्दों से भी लोकतंत्र को गरिमा प्रदान करती रही हैं। अमानवीकरण की भाषा—चाहे वह “कॉकरोच” हो या “परजीवी”, इतिहास में हमेशा असहिष्णुता की पहली शरणस्थली रही है। कभी लगता था कि इस तरह की भाषा न्यायपालिका की चौखट तक नहीं पहुँचेगी, लेकिन अब महसूस होता है कि शायद हम ही बहुत मासूम थे। मी लार्ड, लोकतंत्र इसलिए जीवित रहते हैं क्योंकि संस्थाएँ आलोचना को लोकतांत्रिक आवश्यकता मानती हैं, किसी प्रदूषण की तरह नहीं।
मैं उन करोड़ों भारतीयों में शामिल हूँ जिन्हें यह बेहद असहज और पीड़ादायक लगता है कि भारत के बेरोज़गार युवाओं को “कॉकरोच” कहा जा रहा है और वह भी ऐसे व्यक्ति द्वारा, जो इस कठिन और बेचैन समय में उम्मीद के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर आसीन है। क्या यह सच नहीं कि ये युवा एक गहरे आर्थिक और संस्थागत संकट के शिकार हैं, जिसका सामना स्वयं व्यवस्था को ईमानदारी से करना चाहिए? आज करोड़ों शिक्षित युवा घटते अवसरों, संविदा आधारित असुरक्षा, भर्ती में देरी, प्रश्नपत्र लीक और बढ़ती निराशा के बीच अपना जीवन जी रहे हैं। उनकी बेचैनी और आक्रोश को “परजीविता” कह देना उस पीढ़ी का उपहास करना है, जो पहले ही अनिश्चितताओं का भारी बोझ ढो रही है।
उतनी ही गंभीर चिंता आपकी उन टिप्पणियों से भी उत्पन्न होती है, जिनमें आरटीआई कार्यकर्ताओं और मीडिया के एक बड़े हिस्से को संदेह की दृष्टि से देखा गया। सूचना के अधिकार का आंदोलन उन साधारण नागरिकों के संघर्ष से निकला था, जिन्होंने सत्ता से पारदर्शिता की माँग की। अनेक आरटीआई कार्यकर्ताओं ने भ्रष्टाचार और प्रशासनिक विफलताओं को उजागर करने के लिए भारी व्यक्तिगत जोखिम उठाए हैं; कई लोगों ने तो अपनी जान तक गंवाई है। खोजी पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता, अपनी सीमाओं और अपूर्णताओं के बावजूद, लोकतांत्रिक जवाबदेही के आवश्यक स्तंभ हैं। क्या हर आलोचक को “व्यवस्था-विरोधी” तत्व के रूप में चित्रित करना उचित है? ऐसा दृष्टिकोण एक खतरनाक परिस्थिति निर्मित करता है, जहाँ “जी हाँ हुज़ूर” को देशभक्ति और प्रश्न पूछने को शत्रुता या राष्ट्र-विरोध में बदल दिया जाता है।
महोदय, न्यायपालिका का संवैधानिक स्थान इसलिए विशिष्ट है क्योंकि उससे अपेक्षा की जाती है कि वह असहमति की आवाज़ों की रक्षा करेगी, न कि उन्हें कलंकित करेगी। अदालतों ने ऐतिहासिक रूप से सरकारों को यह याद दिलाया है कि आलोचना देशद्रोह नहीं होती, असहमति राष्ट्र-विरोध नहीं होती और बेहतर जवाबदेही की माँग कोई विध्वंसक गतिविधि नहीं है। यदि नागरिकों को यह भय सताने लगे कि संस्थाओं की आलोचना करने पर उन्हें अपमान या प्रतिशोध का सामना करना पड़ सकता है और वह भी उन्हीं संस्थाओं से जो उनकी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए बनी हैं तो लोकतांत्रिक अनुबंध कमजोर पड़ने लगता है।
सोशल मीडिया पोस्टों को लेकर की गई टिप्पणियाँ और वकीलों की ऑनलाइन अभिव्यक्तियों की जाँच कराने के सुझाव भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संदर्भ में गंभीर प्रश्न खड़े करते हैं। पेशेगत अनुशासन निस्संदेह आवश्यक है और यदि फर्जी डिग्रियाँ हैं तो उनकी जाँच भी अवश्य होनी चाहिए। लेकिन आलोचना, असहमति या असहज प्रश्नों को संस्थागत संदेह का आधार नहीं बनाया जा सकता। अन्यथा जवाबदेही और भयादोहन के बीच की रेखा खतरनाक रूप से धुंधली हो जाती है।
मी लार्ड, सार्वजनिक संस्थाओं विशेषकर संवैधानिक अदालतों से यह अपेक्षा होती है कि वे ऐसी भाषा में संवाद करें जो सार्वजनिक विमर्श को ऊँचा उठाए, न कि उसे और अधिक कठोर और असभ्य बनाए। ऐसे समय में, जब देश पहले ही राजनीतिक संवाद में गिरती शालीनता का साक्षी बन रहा है, न्यायपालिका से यह उम्मीद थी कि वह संवैधानिक संयम और गरिमा की अंतिम शरणस्थली बनी रहेगी।
प्रश्न यह नहीं है कि न्यायाधीश को क्रोध आ सकता है या नहीं; आप भी मनुष्य हैं। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या संवैधानिक अधिकार और सार्वजनिक जीवन नागरिकों के प्रति तिरस्कार की भाषा वहन कर सकते हैं? लोकतंत्र आलोचना से कमजोर नहीं होते; वे तब कमजोर होते हैं जब शक्तिशाली संस्थाएँ आलोचकों को लोकतांत्रिक भागीदारों के बजाय “शत्रु” की तरह देखने लगती हैं।
अंत में केवल इतना कहना चाहता हूँ कि भारत के बेरोज़गार युवा, आरटीआई कार्यकर्ता, स्वतंत्र पत्रकार और असहमति रखने वाले नागरिक लोकतंत्र में रहने वाले कीड़े-मकोड़े नहीं हैं। वे उन अनेक स्वरों में शामिल हैं, जिनसे लोकतंत्र साँस लेता है और उम्मीद का दायरा विस्तृत होता है।
सादर,
एक चिंतित नागरिक
जय हिन्द।
