दुनिया से नहीं, अपनी भावनाओं से हार रहा है आज का युवा

सामाजिक सरोकार

दुनिया से नहीं, अपनी भावनाओं से हार रहा है आज का युवा

  • फोकस टूटते ही प्रतिभा भी बिखरने लगती है

डॉ. रीटा अरोड़ा

“मुझे लोगों की बातें बहुत परेशान करती हैं…” युवक ने थके हुए स्वर में अपने गुरु से कहा।

गुरु उसे नदी किनारे ले गए। कुछ बच्चों ने पानी में पत्थर फेंके। लहरें उठीं… फिर शांत हो गईं।

गुरु मुस्कुराए और बोले – “पत्थर तो लोग रोज़ फेंकेंगे बेटा… अगर तुम हर पत्थर पर रुक गए, तो बहना भूल जाओगे।”

आज का युवा शायद इसी सबसे बड़े संकट से गुजर रहा है। बाहरी दुनिया का शोर जितना नहीं थकाता, उससे कहीं ज्यादा इंसान अपने भीतर के शोर से हारने लगता है। सोशल मीडिया के इस दौर में तुलना, आलोचना, असफलता और दूसरों की राय ने युवाओं के मन को इतना अस्थिर कर दिया है कि उनका ध्यान लक्ष्य से ज्यादा भावनाओं में उलझने लगा है।

किसी ने कुछ कह दिया…

कोई आगे निकल गया…

किसी की पोस्ट पर ज्यादा लाइक्स आ गए…

और इंसान भीतर से टूटने लगता है।

सच्चाई यह है कि जीवन में सफलता केवल प्रतिभा से नहीं मिलती। उसके लिए भावनाओं पर नियंत्रण और लक्ष्य पर अडिग फोकस सबसे जरूरी होता है।

इतिहास गवाह है कि बड़े युद्ध केवल तलवारों से नहीं, मानसिक संतुलन से जीते गए हैं। छत्रपति शिवाजी महाराज और महाराणा प्रताप जैसे योद्धाओं की सबसे बड़ी शक्ति केवल साहस नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य बनाए रखने की क्षमता थी। महात्मा गांधी को भी अपमान, आलोचना और विरोध का सामना करना पड़ा। लेकिन उन्होंने हर प्रतिक्रिया का उत्तर क्रोध से नहीं, अपने संकल्प से दिया।

यही जीवन का सबसे बड़ा सबक है – हर लड़ाई लड़ना जरूरी नहीं होता। कई बार आगे बढ़ जाना ही सबसे बड़ी जीत होती है।

*“जो हर पत्थर का जवाब देने बैठ जाता है*,

*वह मंज़िल तक पहुँचने से पहले ही थक जाता है।”*

आज युवाओं की सबसे बड़ी समस्या “कंपैरिजन ट्रैप” बन चुकी है। लोग अपनी जिंदगी कम और दूसरों की जिंदगी ज्यादा देखने लगे हैं। दोस्त के अंक, किसी का पैकेज, किसी की नौकरी, किसी की दिखावटी खुशी – इन सबकी तुलना इंसान को धीरे-धीरे भीतर से कमजोर करती जाती है।

लेकिन सच्चाई यह है कि सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली हर मुस्कान सच्ची नहीं होती।

अखबारों और खेल जगत की अनेक कहानियाँ हमें यह सिखाती हैं कि केवल प्रतिभा सफलता की गारंटी नहीं होती। कई लोग अपार क्षमता होने के बावजूद भावनात्मक दबाव और मानसिक अस्थिरता के कारण अपनी दिशा खो बैठे, जबकि कुछ लोगों ने कठिन परिस्थितियों में भी अपने मन को स्थिर रखकर इतिहास रच दिया। खेल की दुनिया में भी इसका बड़ा उदाहरण देखने को मिलता है। सचिन तेंदुलकर और विनोद कांबली – दोनों प्रतिभाशाली थे। दोनों ने साथ शुरुआत की। लेकिन सचिन ने आलोचना, असफलता और दबाव को कभी अपने फोकस पर हावी नहीं होने दिया। उन्होंने हर जवाब अपने प्रदर्शन से दिया। यही भावनात्मक स्थिरता उन्हें महान बनाती है।

दरअसल, सफलता और असफलता के बीच की सबसे बड़ी रेखा प्रतिभा नहीं, मानसिक अनुशासन होता है। आज का युवा जल्दी टूट जाता है क्योंकि वह हर बात को दिल से लगा लेता है। जबकि जिंदगी में कई बातें केवल सुनकर छोड़ देने के लिए होती हैं।

एक पुरानी कहानी है –

गधा चीते से बहस कर रहा था कि घास नीली होती है। बहस शेर तक पहुँची। शेर ने चीते को सजा दी।

चीता हैरान था, क्योंकि सच तो वही बोल रहा था। शेर बोला – “सजा इसलिए नहीं कि तुम गलत थे…

सजा इसलिए कि तुमने एक मूर्ख से बहस में अपनी ऊर्जा बर्बाद की।”

आज का समय भी यही सिखाता है। हर प्रतिक्रिया जरूरी नहीं होती। हर आलोचना का उत्तर देना जरूरी नहीं होता।

*“कुछ लोग आपको गिराने नहीं,*

*बस रोकने आते हैं।*

*अगर आप हर आवाज़ पर रुकेंगे,*

*तो मंज़िल से दूर होते जाएंगे।”*

विद्यार्थियों और युवाओं के लिए सबसे जरूरी चीज है – वर्तमान में जीना। यदि आप पढ़ाई कर रहे हैं लेकिन मन किसी पुरानी बात, रिश्ते या असफलता में उलझा है तो आपका ध्यान कभी केंद्रित नहीं हो पाएगा। बूंद-बूंद गिरता पानी भी पत्थर को चीर देता है क्योंकि उसका वार कमजोर नहीं… लगातार होता है।

युवाओं को हर दिन खुद से तीन सवाल पूछने चाहिए –

• *अभी मैं कहाँ हूँ?*

• *मुझे जाना कहाँ है?*

• *वहाँ तक पहुँचने के लिए मुझे क्या करना होगा?*

जब इंसान इन सवालों पर फोकस करता है, तब वह दूसरों की आवाज़ों से कम प्रभावित होता है।

जीवन में भावनाएँ जरूरी हैं, लेकिन उनका नियंत्रण उससे भी ज्यादा जरूरी है क्योंकि जो इंसान अपनी भावनाओं का मालिक नहीं बन पाता, वह परिस्थितियों का गुलाम बन जाता है।

शायद इसलिए सच्चाई यही है –

*जिंदगी में सबसे मजबूत इंसान वह नहीं होता जो सबसे ज्यादा बोलता है, बल्कि वह होता है जो भीतर टूटकर भी अपने लक्ष्य से नहीं भटकता।