राजकुमार कुम्भज की दो कविताऍं

विश्व पुस्तक दिवस पर विशेष

राजकुमार कुम्भज की दो कविताऍं.

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1.

आत्मा का मोक्ष हैं पुस्तकें.

 

काॅंप रहा है आदमी

पुस्तकें हाॅंफ रही हैं विचारों से

एक आदमी फटी कमीज़ में सड़कों पर

कटोरा लिए हाथों में माॅंगता है अभय

हथियारबंदी का आग्रह है पुनः पुनः

संसारभर के शासनाध्यक्षों से

विनय है,विनम्र है,निवेदन है,अनुरोध है

कि भूलें सब संहार,सॅंवारें सारा संसार

सफ़र छोटा है,लंबा है,हैं मुसीबतें भी

पहले से ही जूझ रहे हैं कई-कई सवालों से

अब और नहीं,और नहीं हत्याऍं

खिलाऍं फूल खिलाऍं समूची पृथ्वी पर

भिन्न-भिन्न ख़ुशबुओं पर सवार हों हवाऍं

जल सारा जो खारा है अभी हारा है आदमी

उसी की चिंता में दुबली हुईं जाती हैं पुस्तकें

पुस्तकें देती हैं,पुस्तकों ने ही दिया है रास्ता

क्षितिज हैं पुस्तकालय,पार जिनके अंतरिक्ष

कोई बंधन नहीं,बाॅंधती हैं मुक्तिबोध से

पुस्तकें दिलातीं हैं हर अंधेरे से मुक्ति

आत्मा का मोक्ष हैं पुस्तकें.

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2

ईश्वर नहीं है कहीं भी नहीं

 

ईश्वर नहीं है कहीं भी नहीं

अगर है कहीं तो है यहीं पुस्तकों में

सपने हैं तो हैं यहीं,नींद है तो यहीं

मुक्ति यहीं,मुक्तिबोध यहीं,मुक्तिमार्ग यहीं

दु:ख और उदासी यहीं होते हैं असहाय

असहमतों को भी मिलती है जगह यहीं

भीड़ में आता है रास्ता पुस्तकों से ही

पुस्तकों से ही आता है जीवन में लोकतंत्र

लोकतंत्र से ही आता है पुस्तकों में जीवन

ख़तरा है सभी जगह ख़तरा है आजकल

बचाना है सभी को छोड़कर ईश्वर.

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