गमनः कम बजट में भी बन सकती है प्रभावशाली फिल्म

सिनेमा

गमनः कम बजट में भी बन सकती है प्रभावशाली फिल्म

बालेंदुशेखर मंगलमूर्ति

 

फिल्म मुज़फ्फर अली की पहली फिल्म है। 1978 में रिलीज हुई इस फिल्म को देखते हुए एक ख्याल मन में आता है, अगर फिल्म भव्य दृश्यों से दर्शकों से चकाचौंध करने के उद्देश्य से न बनायी जाए, बल्कि कहानी कहने के लिए बनायी जाए, तो फिर कितने कम बजट में एक प्रभावशाली फिल्म बन सकती है।

बॉम्बे में कुछेक प्रदेशों से लोग आ कर बसे हैं। दक्षिण से। उत्तर में, उत्तर प्रदेश से। बहुत बड़ी संख्या है उत्तर प्रदेश से यहाँ आकर बसने वालों की। इनमें अधिकांश छोटे छोटे रोजगार में लगे बॉम्बे शहर को गति देते हैं। बॉम्बे सपनों की नगरी है, ये ख्याल इन लोगों को रोजगार की तलाश में यहाँ लेकर आता है।

फिल्म में दो पैरेलल प्लाट हैं। ये फिल्म की ताकत है कि दो पैरेलल प्लाट होने के बावजूद फिल्म बिखरी नहीं है, बल्कि एक दूसरे में गुत्थमगुत्था होकर मजबूत रस्सी बन गयी है।

पहली कहानी लल्लू तिवारी की है, जो अपने गाँव (लखनऊ ज़िले) लौटकर अपने साथियों के सामने एक बेहतर जीवन का भ्रम रचता है और उन्हें बॉम्बे आने के लिए प्रेरित करता है। दूसरी ओर उसका दोस्त गुलाम हसन है, जो शुरू में घर-परिवार छोड़कर जाने को तैयार नहीं होता, लेकिन परिस्थितियाँ उसे भी बॉम्बे खींच लाती हैं।

बॉम्बे में उसका सामना जीवन की चट्टानी हक़ीक़त से होता है। पर अपने परिवार के लिए वो जूझने के लिए तैयार है। लल्लू तिवारी, उसका दोस्त, जो यहाँ एक सड़ी गन्दी सी चौल में रहता है, उसकी मदद करता है और गुलाम हसन टैक्सी चलाने लगता है।

बॉम्बे आकर उसने हाथ में चार पैसे देखे हैं और वो मनी आर्डर भेजता है।

फिल्म में कठोर हक़ीक़त के बीच कुछ प्यार लम्हे भी हैं, जो दिखाते हैं कि लोग तमाम मुश्किल हालात के बीच हंसने खुश होने की कुछ वजह खोज लेते हैं। एक है लल्लू तिवारी की प्रेमिका जो यूपी से नहीं बल्कि महाराष्ट्र के तटीय इलाके से बॉम्बे में आयी है। यशोधरा जिसे लल्लू जशोधरा कहके पुकारा करता है। गुलाम हसन मजाक करता है, स्कूल में भी ये युधिष्ठिर को जुधिष्ठिर कहके बुलाता था।

यशोधरा बुरा मानती रहती है। जशोधरा क्यों कहता है? नाम ठीक से नहीं ले सकता?

दोनों के सपने हैं घर बसाने के। अपनी खोली हो, जीवन सुकून से बीते। पर बाधा है लल्लू की अपर्याप्त कमाई और यशोधरा के परिवार वाले जो उसे दुबई काम के लिए भेजना चाहते हैं, क्यूंकि वहां बहुत पैसा है और यशोधरा जाना नहीं चाहती।

गुलाम हसन का मन बॉम्बे में नहीं लग रहा। पर हर बार ख्याल आता है कि आने जाने में जो पैसे लगेंगे, अगर उन्हें मनी आर्डर कर दें तो घर के मुश्किल हालत में मदद होगी।

एक दिन बहुत बुरा होता है। समुंदर के किनारे लल्लू और यशोधरा अपने घर के सपने बुन रहे होते हैं, जब धोखे से उस पर हमला होता है और लल्लू की जान चली जाती है। एक जिंदादिल युवक मौत के आगोश में समां जाता है। गुलाम हसन टूट जाता है। वो घर लौटने का मन बना लेता है। लेकिन स्टेशन पर फिर वही सवाल: आने जाने में इतने पैसे लग जाएंगे, हाथ में रह क्या जाएगा? ट्रेन निकल जाती है, गुलाम हसन बॉम्बे में रह जाता है। सपनों के शहर बॉम्बे का कैदी गुलाम हसन।

इस फिल्म में तीन गाने हैं जो काफी मक़बूल हुए थे। नए शायर थे शहरयार, आगे चलकर इन्हे ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजा गया था, का कलाम है, सीने में जलन, आखों में तूफ़ान सा क्यों है, और हीरा देवी मिश्रा का क्लास्सिकल सांग है, आजा सांवरिया तोहे गरवा लगा लूँ, जो बेहद मधुर बन पड़ा है और दूर देस गए अपने पति से बिछड़े पत्नी के दर्द को बखूबी बयान करता है।

फिल्म ख़त्म होती है और एक टीस छोड़ जाती है दर्शकों के मन में। जैसे जीवन का कोई अधूरा हिसाब, जो कभी पूरा नहीं होगा।

बालेंदुशेखर मंगलमूर्ति के फेसबुक वॉल से साभार

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